सुप्रीम कोर्ट ने कहा, पीड़िता के आक्रोश, बदले की भावना को दहेज कानून का फायदा नहीं मिलना चाहिए
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 15 Sep 2018 12:33 PM
नयी दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी पीड़िता के ‘आक्रोश’ और ‘बदले’ की भावना को दहेज उत्पीड़न पर कानूनी प्रावधान का फायदा नहीं मिलना चाहिए और सहानुभूति का सहारा लेकर दूसरे पक्ष को प्रताड़ित नहीं करना चाहिए. न्यायालय ने शुक्रवार को अपने एक पुराने आदेश में संशोधन करते हुए भारतीय दंड संहिता की […]
नयी दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी पीड़िता के ‘आक्रोश’ और ‘बदले’ की भावना को दहेज उत्पीड़न पर कानूनी प्रावधान का फायदा नहीं मिलना चाहिए और सहानुभूति का सहारा लेकर दूसरे पक्ष को प्रताड़ित नहीं करना चाहिए. न्यायालय ने शुक्रवार को अपने एक पुराने आदेश में संशोधन करते हुए भारतीय दंड संहिता की धारा 498 ए के तहत दर्ज मामलों में तुरंत गिरफ्तारी से संरक्षण को खत्म करते हुए यह टिप्पणी की.
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शीर्ष अदालत ने अपने उस पुराने आदेश में पति और ससुराल पक्ष के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई करने से पहले विवाहित महिलाओं की शिकायत की जांच के लिए एक समिति का गठन करने को कहा था. न्यायालय ने कहा, ‘अदालतें हमेशा इस बात को लेकर सजग रहती है कि ऐसी कोई स्थिति नहीं आए कि किसी पीड़ित वर्ग को न तो कोई आक्रोश हो तथा न ही बदले की भावना को किसी कानूनी प्रावधान का फायदा मिले. वह सहानुभूति के सहारे या अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर दूसरे पक्ष को प्रताड़ित नहीं कर पाये.’ शीर्ष अदालत ने कहा कि हर जिले में परिवार कल्याण समितियां गठित करने और उन्हें शक्ति प्रदान करने का निर्देश ‘‘कानूनी ढांचे के अनुरूप नहीं” था.
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प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्र, न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर और न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ की पीठ ने कहा कि अदालतों के पास अग्रिम जमानत नाम से प्रसिद्ध गिरफ्तारी पूर्व जमानत देने और यहां तक कि कानूनी संतुलन बनाने के लिए आपराधिक कार्यवाही को पूरी तरह से निरस्त करने की पर्याप्त शक्ति है क्योंकि कोई भी अदालत दोनों लिंगों के बीच टकराव के बारे में नहीं सोच सकती.
पीठ ने अपने उस पिछले फैसले के निर्देश में भी संशोधन किया जिसमें यह निर्देश दिया गया कि अगर किसी वैवाहिक विवाद के पक्षों के बीच समझौता होता है तो निचली अदालत के न्यायाधीश आपराधिक मामले को बंद कर सकते हैं. अदालत ने पिछले साल जुलाई में हर जिले में उस परिवार कल्याण समितियों के गठन का निर्देश दिया था जो पुलिस या मजिस्ट्रेट द्वारा प्राप्त दहेज उत्पीड़न के आरोपेां का सत्यापन करेगी. अदालत ने तब कहा था कि समिति की रिपोर्ट आने पर ही किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी होगी.
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