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सोशल मीडिया में आपकी ये आदत बना रहा मानसिक रोगी, अभी सुधारें वरना फंसेंगे मुसीबत में- रिपोर्ट्स

Updated at : 02 Sep 2025 8:33 PM (IST)
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Passive Social Media Scrolling

सोशल मीडिया इस्तेमाल करता एक यूजर, Pic Credit- Chatgpt

Passive Social Media Scrolling: सोशल मीडिया की निष्क्रिय स्क्रॉलिंग आपके मानसिक स्वास्थ्य पर कैसे असर डाल रही है. पढ़ें रिपोर्ट्स और जानें कैसे बचें चिंता, अवसाद और अकेलेपन से

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Passive Social Media Scrolling: आज की डिजिटल दुनिया में सोशल मीडिया हमारे जीवन का अहम हिस्सा बन चुका है. फेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप और एक्स जैसे प्लेटफॉर्म्स हमें दुनिया से जोड़ने के साथ साथ हमारी ज्ञान को तो बढ़ाते हैं. लेकिन जरूरत से अधिक और बिना वजह के स्क्रॉल करते जाना मानसिक स्वास्थ्य के नजरिये से खतरनाक है. क्योंकि इसकी वजह से चिंता (Anxiety) और अकेलापन (Loneliness) जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं. ये बातें हम नहीं बल्कि साइ पोस्ट और वेस्टर्न यूनिवर्सिटी के अध्ययन से पता चली हैं.

निष्क्रिय स्क्रॉलिंग कैसे बढ़ा रहा है चिंता और अवसाद

सोशल मीडिया में निष्क्रिय स्क्रोलिंग कैसे चिंता और अवसाद का कारण बन रहा है उसको जानने से पहले हम यह जानेंगे कि निष्क्रिय स्क्रोलिंग क्या है. दरअसल यह वह प्रक्रिया है जिसमें यूजर्स केवल दूसरों के पोस्ट और अपडेट्स को देखते हैं, लेकिन किसी प्रकार की सक्रिय रूप से भागीदारी भागीदार नहीं बनते. वेस्टर्न यूनिवर्सिटी (Western University, 2025) और साइ पोस्ट 2025 के शोध के अनुसार किशोर और युवा जो दिन में 2 घंटे या उससे अधिक समय सोशल मीडिया पर बिताते हैं. उनमें अन्य बच्चों की तुलना में चिंता और अवसाद के लक्षण अधिक पाए गए हैं. साइ पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार निष्क्रिय सोशल मीडिया उपयोग करने वाले किशोरों में चिंता के लक्षण 30 फीसदी अधिक पाए गए हैं. वेस्टर्न यूनिवर्सिटी के 2025 के अध्ययन में पाया गया है कि लंबे समय तक स्क्रॉलिंग करने वाले किशोरों में अकेलेपन की भावना 25 फीसदी अधिक पाई गई है.

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अकेलेपन और सोशल मीडिया

सोशल मीडिया का उद्देश्य लोगों को जोड़ना है, लेकिन लगातार निष्क्रिय स्क्रॉलिंग से यूजर्स में अकेलेपन की भावना बढ़ सकती है. साइक्लोजी टूडे (2025) की रिपोर्ट के अनुसार, जो लोग सोशल मीडिया पर दूसरों के जीवन की तुलना करते हैं, उन्हें खुद को कमतर महसूस करने की संभावना अधिक होती है. यह अकेलेपन और सामाजिक चिंता दोनों को बढ़ावा देता है.

सामाजिक तुलना और मानसिक स्वास्थ्य

दरअसल इन अध्ययनों में यह दावा किया गया है कि सोशल मीडिया पर दिखाई जाने वाली ‘क्यूरेटेड’ और सजाई हुई तस्वीरें उपयोग करने वाले को दूसरों से तुलना करने के लिए मजबूर करती हैं. इससे आत्म-सम्मान कम होता है और मानसिक तनाव बढ़ता है. शोध में पाया गया कि निष्क्रिय यूजर्स में अवसाद और चिंता के लक्षण 20-35% अधिक दिखाई देते हैं. वहीं, कई एक्सपर्ट ने इससे बचाव के लिए सोशल मीडिया पर सक्रिय सहभागिता और समय की सीमाएं तय करने को मानसिक स्वास्थ्य के लिए जरूरी बताया है.”

क्या कर सकते हैं आप

  1. सहभागिता बढ़ाना जरूरी बेवजह स्क्रॉल करने के बजाय पोस्ट पर किसी तरह कमेंट कर, लोगों से संवाद बढ़ाएं.
  2. डिजिटल डिटॉक्स: समय-समय पर सोशल मीडिया से ब्रेक लें.
  3. हॉबी और एक्टिविटी: नई हॉबीज अपनाएं और ऑफलाइन गतिविधियों में शामिल हों.
  4. सामाजिक संपर्क: रियल जीवन में परिवार और मित्रों से जुड़ाव बढ़ाएं.

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Sameer Oraon

लेखक के बारे में

By Sameer Oraon

इंटरनेशनल स्कूल ऑफ बिजनेस एंड मीडिया से बीबीए मीडिया में ग्रेजुएट होने के बाद साल 2019 में भारतीय जनसंचार संस्थान दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा किया. 5 साल से अधिक समय से प्रभात खबर में डिजिटल पत्रकार के रूप में कार्यरत हूं. इससे पहले डेली हंट में बतौर प्रूफ रीडर एसोसिएट के रूप में काम किया. झारखंड के सभी समसामयिक मुद्दे खासकर राजनीति, लाइफ स्टाइल, हेल्थ से जुड़े विषयों पर लिखने और पढ़ने में गहरी रुचि है. तीन साल से अधिक समय से झारखंड डेस्क पर काम कर रहा हूं. फिर लंबे समय तक लाइफ स्टाइल के क्षेत्र में भी काम किया हूं. इसके अलावा स्पोर्ट्स में भी गहरी रुचि है.

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