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Helmet Movie Review : सशक्त विषय पर बनी कमजोर फिल्म, यहां पढ़ें रिव्यू

टैबू विषयों पर बनी फिल्मों के नायक के तौर पर अभिनेता आयुष्मान खुराना की खास पहचान रही है. अपने भाई के नक्शेकदम पर चलते हुए अपारशक्ति खुराना कंडोम के विषय पर बनी फिल्म हेलमेट के लीड हीरो बनकर नज़र आ रहे हैं. जिस देश में कंडोम खरीदना राष्ट्रीय समस्या है.

By उर्मिला कोरी
Updated Date
Helmet Movie Review
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Helmet Movie Review

फ़िल्म- हेलमेट

निर्माता- डिनो मोरिया

प्लेटफार्म- ज़ी 5

निर्देशक- सतराम

कलाकार- अपारशक्ति खुराना, प्रनुतन बहल, अभिषेक बनर्जी,आशीष वर्मा और अन्य

रेटिंग- दो

टैबू विषयों पर बनी फिल्मों के नायक के तौर पर अभिनेता आयुष्मान खुराना की खास पहचान रही है. अपने भाई के नक्शेकदम पर चलते हुए अपारशक्ति खुराना कंडोम के विषय पर बनी फिल्म हेलमेट के लीड हीरो बनकर नज़र आ रहे हैं. जिस देश में कंडोम खरीदना राष्ट्रीय समस्या है. ऐसे में फ़िल्म के विषय में भरपूर संभावनाएं थी कि समाज की सोच पर व्यंग करने के साथ साथ कंडोम के लिए लोगों को जागरूक कर पाती थी. प्रभावशील विषय वाली इस फ़िल्म का ट्रेलर मनोरजंक लग रहा था लेकिन फ़िल्म के तौर पर जो भी कुछ सामने आया है. वह प्रभावहीन है. यह सोशल कॉमेडी फिल्म एंटरटेनमेंट भी टुकड़ों में ही कर पाती है.

कहानी अनाथ लकी (अपारशक्ति खुराना) की है जो एक शादी के बैंड में बतौर सिंगर काम करता है. अपने बैंड कम्पनी के मालिक की बेटी रुपाली ( प्रनुतन) से उसे प्यार है. हर प्रेमी जोड़े की तरह इनके भी प्यार और शादी में परिवार तो विलेन है ही लेकिन साथ में लकी की आर्थिक स्थिति भी बहुत बड़ा रोड़ा है.

आर्थिक स्थिति को ठीक करने और रुपाली से शादी के लिए वह उस ट्रक को लूटने का फैसला करता है जिसमें मोबाइल फ़ोन हो. अपने दोस्त सुल्तान (अभिषेक बनर्जी) और माइनस (आशीष वर्मा) की मदद से वह ट्रक को लूट भी लेता है लेकिन ट्रक से लूटे गए डिब्बों में मिलते हैं कंडोम के पैकेट्स।वे कंडोम को बेचने का फैसला करते हैं लेकिन यह इतना आसान नहीं है . जिस समाज में कंडोम शब्द बोलने में लोग झिझकते हैं वहां लोग कैसे कंडोम खरीदेंगे.

मुंह पर हेलमेट लगाकर ये तीनों साथी कंडोम बेचने निकल पड़ते हैं. फ़िल्म इसके बाद कंडोम खरीदने की झिझक और उसके बेचने पर पूरी तरह से फोकस हो जाती है. फ़िल्म के आखिरी 20 मिनट में एक ट्विस्ट आता है। लकी की चोरी पकड़ी गयी? लकी और रुपाली के प्यार का क्या अंजाम होगा।यही फ़िल्म की आगे की कहानी है.

फ़िल्म का लेखन बेहद कमजोर है. दो लाइन की कहानी पर सवा दो घंटे की फ़िल्म बना दी गयी है. पूरा राज नगर हेलमेट पहनकर कंडोम बेचने को राजी हो जाता है. यह बात समझ नहीं आती है. सबसे बड़ी खामी फ़िल्म की स्क्रिप्ट में ह्यूमर की रही जबकि ह्यूमर इस फ़िल्म की सबसे बड़ी जरूरत थी . ह्यूमर तो कम है ही सेकेंड हाफ में फ़िल्म संदेशप्रद भी बन जाती है.

किरदारों की सोच कहानी के विषय के बीच झूलती नज़र आयी है. लकी ने ट्रक को पैसों के लिए लूटा था. शुरुआत से यही लग रहा था लेकिन आखिर के 20 मिनट में जब उसे जेल होती है तो वो लकी का धर्मात्मा वाला एंगल दिखने लगता है. हमने चोरी की है तो सजा मिलेगी ही. अनाथ वाले एंगल पर जो भाषण बाज़ी जोड़ी गयी है वो और किरदार की सोच पर सवाल खड़े करता है कि लकी का मकसद पैसे बनाना था या समाज सेवा करना. लकी और रुपाली की लव स्टोरी का ट्रैक भी अपीलिंग नहीं है.

अभिनय की बात करें तो अपारशक्ति खुराना इससे पहले कई फिल्मों में अपने अभिनय से प्रभावित कर चुके हैं लेकिन लीड एक्टर की बड़ी जिम्मेदारी को वो इस फ़िल्म में पूरी तरह से नहीं निभा पाते है. वे कमज़ोर रह गए हैं. अभिषेक बनर्जी एक मात्र एक्टर हैं कमज़ोर स्क्रिप्ट के बावजूद जिनका अभिनय अपील करता है. जिस एक दृश्य में वह बच्चन साहब को कॉपी करते नज़र आए हैं. वहां वे कमाल के रहे हैं.

आशीष वर्मा के किरदार को फ़िल्म में करने को कुछ खास नहीं था. उन्हें फ़िल्म में कॉमेडी के लिए रखा गया था लेकिन कमज़ोर स्क्रिप्ट उसमें उनकी मदद नहीं कर पायी है. प्रनुतन बहल फ़िल्म में खूबसूरत नजर आयी हैं लेकिन उन्हें अपने अभिनय पर काम करने की ज़रूरत है. आशीष विद्यार्थी को पूरी तरह से वेस्ट किया गया है.वो मुश्किल से दो से तीन दृश्यों में नज़र आए हैं. शारिब हाशमी,सानंद वर्मा,जमील खान अपने सीमित स्कीन स्पेस में किरदार के साथ न्याय कर जाते हैं. फ़िल्म का गीत संगीत स्क्रिप्ट की तरह की कमज़ोर रह गया है तो संवाद भी फीके हैं.

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