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फिल्‍म रिव्‍यू: अमिताभ बच्‍चन की शानदार एक्टिंग के बावजूद ''सरकार 3'' में दम नहीं है...!

Updated at : 12 May 2017 1:56 PM (IST)
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फिल्‍म रिव्‍यू: अमिताभ बच्‍चन की शानदार एक्टिंग के बावजूद ''सरकार 3'' में दम नहीं है...!

II उर्मिला कोरी II फिल्म- सरकार 3 निर्माता- इरोज निर्देशक- राम गोपाल वर्मा कलाकार- अमिताभ बच्चन,अमित साध ,जैकी श्रॉफ ,यामी गौतम और अन्य रेटिंग- एक ‘सरकार 3’ निर्देशक राम गोपाल वर्मा की सफल फ्रेंचाइज फिल्म सरकार की तीसरी कड़ी है मगर फिल्म देखते हुए यह आपको सरकार यानि पहले भाग का कमज़ोर रीमेक फिल्म प्रतीत […]

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II उर्मिला कोरी II

फिल्म- सरकार 3
निर्माता- इरोज
निर्देशक- राम गोपाल वर्मा
कलाकार- अमिताभ बच्चन,अमित साध ,जैकी श्रॉफ ,यामी गौतम और अन्य
रेटिंग- एक

‘सरकार 3’ निर्देशक राम गोपाल वर्मा की सफल फ्रेंचाइज फिल्म सरकार की तीसरी कड़ी है मगर फिल्म देखते हुए यह आपको सरकार यानि पहले भाग का कमज़ोर रीमेक फिल्म प्रतीत होती है. अब इस रीमेक कहानी की बात करें तो फिल्म के पहले दृश्य की शुरुआत इसी से होती है कि सुभाष नगरे उर्फ ​​सरकार (अमिताभ बच्चन) अभी भी महाराष्ट्र के राजनीतिक परिदृश्य में शासन कर रहे हैं. अपने दोनों बेटों शंकर (अभिषेक बच्चन) और विष्णु (के के मेनन) को खोने के बाद. अब उन्हें गोकुल (रोनीत रॉय) में भरोसेमंद सहयोगी मिला है. जिस पर सरकार का अटूट विश्वास है.

फिर कहानी में शिवाजी (अमित साध) विष्णु के बेटे की एंट्री होती है. उसके इरादे अस्पष्ट से लगते हैं. कहानी का एक एंगल अनु (यमी गौतम) भी है जो शिवाजी से प्यार करने का नाटक करती है ताकि अपने पिता की हत्या के लिए सरकार से बदला ले सके. कहानी इतने तक की खत्म नहीं होती एक सिरा और भी है वाल्या (जैकी श्रॉफ) जो दुबई से चीजों को नियंत्रित कर रहा है. जिसमें उसने पॉलिटिशियन से लेकर गुंडे तक सभी को शामिल कर लिया है, बस उसका एक ही मकसद है सरकार को खत्म करना ताकि वह बिना रोक टोक अपना बिजनेस कर सके.

इसके लिए वह शिवाजी और गोकुल को भी अपने प्लान में शामिल करने से पीछे नहीं हटता है क्या वाल्या सफल होगा. क्या सरकार खत्म होगा. इसी का जवाब आगे की फिल्म देती है. कहानी की बात करें तो सरकार सीरीज की पिछली फिल्मों में हमने जो देखा है, वह पर्दे पर फिर रिपीट हो रहा है. नयापन कहानी में कुछ भी नहीं है. पहले पार्ट में भी बिज़नेस डील नहीं होने की वजह से कुछ लोग सरकार के खिलाफ हो जाते हैं. यहाँ भी वही है. डबल-क्रॉसिंग और विश्वासघात यह सब पहलु फिल्म में जिस तरह से दिखाए गए हैं. वह पहले से पता होते हैं. सरकार की कहानी बेहद कमज़ोर है. फिल्म के बहुत सारे सीन्स काफी लम्बे जान पड़ते है.

सरकार का बैकग्राउंड स्कोर अपनी कमज़ोर कहानी की तरह ही इस बार प्रभावित करने में नाकामयाब रहा. एक समय बाद वह सिर्फ वह शोर करता सा लगता है. फिल्म के संवाद में भी नयापन नहीं है. ये खेल उन्होंने शुरू किया खत्म मैं करूँगा राजनीति उतनी भी बुरी नहीं जितना लोग समझते है. अब तक कई बार सुने जा चुके हैं. जैकी श्रॉफ और उनकी प्रेमिका के बीच के संवाद सुनकर हंसी आती है. फिल्म का कैमरा एंगल भी कई बार अटपटा सा लगता है.

अभिनय की बात करें तो फिल्म में काफी बड़े नाम जुड़े हैं. सबसे पहले बात सरकार यानी अमिताभ बच्चन की. एक बार फिर उन्होंने अपने शानदार अभिनय से सरकार के किरदार को खास बना दिया है. किरदार की भाषा हो या बॉडी लेंग्वेज सभी पर उनकी पकड़ शानदार है. इस फिल्म का एकमात्र कोई अच्छा पहलु है तो वह उनका अभिनय ही है.

अमित साध को मौक़ा फिल्म में अच्छा मिला है लेकिन वह मौके को भुना नही पाए मनोज वाजपेयी ने गोविंद देशपांडे के किरदार में प्रभावशाली प्रदर्शन किया है लेकिन उन्हें कम स्क्रीन स्पेस मिला है. रोनित रॉय अपने काम को बखूबी निभाना जानते हैं. यामी गौतम निराश करती हैं. रोहिणी हतंगडी और सुप्रिया पाठक कुछ समय के लिए ही पर्दे पर दिखी हैं. बाकी के किरदार औसत हैं. कुलमिलाकर सरकार थ्री निराश करती है. एक बार फिर राम गोपाल वर्मा चूक गए हैं.

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