स्टारडम के बंधन में फंसना नहीं चाहता : आर माधवन

Published at :22 Jan 2016 4:36 PM (IST)
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स्टारडम के बंधन में फंसना नहीं चाहता : आर माधवन

अभिनेता आर माधवन खुद को किसी स्टारडम के घेरे में कैद नहीं करना चाहते. उन्हें देख कर अगर किसी फैन के चेहरे पर मुस्कान आ जाती है तो उनके लिए इतना ही काफी है. वे अपनी बेफिक्री को ही अपना स्टाइल स्टेटमेंट मानते हैं. तनु वेड्स मनु रिटर्न्स के बाद एक अलग लीग की फिल्म […]

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अभिनेता आर माधवन खुद को किसी स्टारडम के घेरे में कैद नहीं करना चाहते. उन्हें देख कर अगर किसी फैन के चेहरे पर मुस्कान आ जाती है तो उनके लिए इतना ही काफी है. वे अपनी बेफिक्री को ही अपना स्टाइल स्टेटमेंट मानते हैं. तनु वेड्स मनु रिटर्न्स के बाद एक अलग लीग की फिल्म उन्होंने चुनी है. फिल्म साला खड़ूस में एक अलग ही तेवर नजर आ रहे हैं माधवन के. पेश है अनुप्रिया अनंत और उर्मिला कोरी से हुई बातचीत के मुख्य अंश…

1. ‘साला खड़ूस’ जैसे विषय का आइडिया कहां से आया?

– मेरी दोस्त हैं सुधा.उनकी ही कहानी है. ज्यादातर जब कोई नया निर्देशक फिल्म बनाने की चाहत रखता है या रखती है तो वह प्यार मोहब्बत वाले विषय लेकर आते हैं.तो मैं हैरान हो गया कि यह अलग तरह की कहानी लेकर कैसे आयी है. उन्होंने कहा कि मैं स्क्रिप्ट पढ़ लीजिए. और उन्होंने लेडीज बॉक्सर्स पर रिसर्च भी भेजा था.किस तरह के परिवार से ये लड़कियां होती हैं, क्यों बॉक्सिंग करने के लिए मजबूर होती हैं, जो उन्होंने रिसर्च किया था. वह देख कर मैं बौखला गया था. मुझे लगा कि यार ये तो बहुत अच्छी कहानी है. और स्क्रिप्ट पढ़ा तो और दिल को छू गयी.उस वक्त मैं प्यार मोहब्बत की ही फिल्म कर रहा था. तो मुझे लगा कि एक चेंज जरूरी है.इसलिए मैंने तय किया कि मैं यह फिल्म करूंगा.

2. राजू हिरानी का जुड़ना कैसे हुआ?

– दरअसल, मैं कई निर्माताओं से मिल चुका था. लेकिन सबने यही कहा कि मैडी आप नयी फिल्म बना रहे हो. रियल लेडी बॉक्सर है. निर्देशक नयी है. आप निर्देशक बदल लो…वगैरह वगैरह. कोई हीरोइन लेलो. हमें मार्केटिंग में आसानी होगी. लेकिन मुझे यकीन था इस कहानी पर कि इसे देख कर पब्लिक हैरान हो सकती है. मेरे साथ हमेशा ही यही होता रहा है. तनु वेड्स मनु भी सिर्फ मैं बनाना चाहता था और कोई तैयार ही नहीं था. बाद में फिल्म खरीदी स्टूडियो. लेकिन मेरा दिल बैठ चुका था. फिर मुझे लगा कि मैं ये तो पता कर लूं कि स्क्रिप्ट में दम है भी कि नहीं कि मैं ही अड़ियल की तरह लेकर घूम रहा हूं.

मैंने फिर राजू जी को मेसेज किया. रात के 11 बज रहे थे. राजू जी ने फौरन घर बुलाया.तो मैंने कहा कि स्क्रिप्ट है. 20 मिनट में मैंने सुनाया.और उनका रियेक् शन था कि भाई कहानी तो बहुत अच्छी है. उनकी आंखों में आंसू थे. और उन्होंने कहा कि बताओ मैं किस तरह जुड़ सकता. उनका यही रियेक् शन काफी था मेरे लिए. मैं कहूंगा कि इस फिल्म के लिए व ेमेरे साला खड़ूस( मेरे मेंटर) रहे हैं. हमारी दोस्ती थी. लेकिन मैं अब डिवोटी हो गया हूं उनका.साला खड़ूस में साला होने के बावजूद सेंसर बोर्ड ने हरी झंडी दिखा दी है.

हां, उनका बहुत शुक्रिया और दूसरी बात उन्होंने कहा कि उन्हें कभी साला शब्द से दिक्कत नहीं है. साला के बाद कौन सा शब्द आता है. उस पर सेंसर है. अगर साला गाली या अपशब्द के रूप में है तो फिर उस पर सेंसर तो होगा ही.

3. एक स्पोर्ट्स पर फिल्म बनाते हुए या किसी स्पोर्ट्स मैन की जिंदगी को जब परदे पर दर्शाया जाता है तो क्या सीखने को मिलता है बतौर एक्टर?

– हां, एक एक्टर के रूप में हमें लगता है ऐसा कि हम तो सबकुछ कर लेंगे. कुछ भी मुश्किल नहीं है. हम तो कर ही लेंगे. लेकिन जब आप रिंग में उतरते हो तो असलियत पता चलती है. इस फिल्म के लिए ही जब मैंने शुरुआत की तो मुझे पता चला कि 40 मिनट की बॉक्सिंग करने में 40 सेकेंड में मैं थक गया था. तब पता चला कि आपको कितना स्टेमिना और कितने तजुर्बे की जरूरत होती है. मैं तो खुद को बहुत तेज समझता था. लेकिन मुझसे हुआ ही नहीं शुरुआती दौर में. लेकिन अब इज्जत बढ़ जाती है, उन महिलाओं के लिए जो बॉक्सिंग के फील्ड से जुड़ी हैं. आप और अधिक अनुशासित हो जाते हैं और आपको वक्त की अहमियत समझा देते है.

4. आपकी जिंदगी में आपने किसी को मेंटर माना है?

– हां, मेरी जिंदगी के मेंटर कमल हसन साहब हैं,जिनके साथ मैंने एक फिल्म की थी और उस फिल्म में उन्होंने मुझे एक्टिंग के बारे में सबकुछ सिखाया, जिसकी वजह से मेरा रोल बहुत मजबूत हो गया था उस फिल्म में. खास बात यह थी कि उस फिल्म के लिए अवार्ड मुझे मिला. तो मेरा मानना है कि एक मेंटर ही यह काम कर सकता है.मेंटर को कभी-कभी सख्त भी होना पड़ा है. तो वह जबरदस्त तरीके से सख्त भी रहे हैं. लेकिन वह मेरी अच्छाई के लिए ही रहा है. आज मुझे थोड़ी बहुत जो एक्टिंग की समझ मिली है. उन्हीं से मिली है.

5. मैरी कॉम इस विषय पर पहले बन चुकी है. तो आपको लगता है कि तुलना होगी?

– दोनों फिल्म अलग है. ये मुझे लगता है कि यह लोगों की इनसेक्योरिटी है. लोग जान बूझ कर जोड़ते हैं. उन्हें लगता है कि हमारे पास तो कहानी है ही नहीं. हमारी फिल्म दो ऐसे लोगों की कहानी है, जिन्हें समाज से निकाल दिया गया है. और बॉक्सिंग ने उन्हें वह दिलाया, जिसके वह हकदार हैं. ऐसा तो नहीं है कि जब चक दे रिलीज हुई. उसके बाद मिलियन डॉलर बेबी रिलीज हुई तो लोगों ने तो उस वक्त नहीं कहा कि यह चकदे की कॉपी है. क्योंकि हॉलीवुड फिल्म है इसलिए.

6. बॉलीवुड के अब तक का सफर कैसा रहा है?

– मुझे लगता है कि काफी अच्छा रहा. इंडस्ट्री में वह स्टारडम मुझे नहीं मिला, जो लोगों को लगता है कि मुझे मिलना चाहिए. पर मैं ये कहना चाहता हूं कि मैं स्टारडम से जुड़ना भी नहीं चाहता. मेरे लोग हैं, जो मेरी कुछ आॅडियंस हैं जो मुझे बहुत पसंद करती हैं. जो मीडिया मेरी फिल्में पसंद करती हैं. उनके हिसाब से मैं बहुत बड़ा स्टार हूं. लेकिन मैं उन स्टार्स में से नहीं हूं कि डिजाइनर कपड़े पहन कर हर जगह जाने लगा, जहां मैं एंजॉय नहीं करता हूं. तो मैं अपना वजूद खो बैठूंगा. तो शायद मैं उस इंसान से दूर हो जाता, जो मैं दरअसल हूं. मुझे रोड पर चलना अच्छा लगता है. एयरपोर्ट पर मैं हूं और मेरे साथ 15 लोग होंगे तो मुझे अच्छा नहीं लगता. अकेले रहना पसंद है. अगर चार लोग मुझसे वहां मिलना चाहते हैं.तो मिलने दो.

हो सकता है कि मुझे देख कर वह थोड़ी देर के लिए ही खुश तो हो जायें. और मेरे साथ ऐसा हुआ है. मियां बीवी लड़ रह ेहैं और अचानक मुझे देख कर खुश हो गये हैं. मैं इस बंधन में फंसना ही नहीं चाहता. मुझे लगता है कि हां, मैं अगर शाहरुख खान नहीं हूं तो नहीं हूं यार…मैं बनना भी नहीं चाहता.मैं अपना मुकाम बनाना चाहता हूं. मैं वैसी जिंदगी नहीं जी सकता. मैं गार्ड से गार्ड नहीं हो सकता. मेरी सभ्यता ऐसी है कि मैं तो गार्ड को भी बैठने को बोल दूंगा. मैं खुश हूं कि मैं उस तरह का कलाकार हूं जिसको खुद को अदरक बोलवाना कि कहीं से भी बढ़ रहा है कि ताकत रखता हंूं. वरना, कौन सा स्टार खुद की ऐसी बेइज्जती किरदार के लिए करा सकता

7. किरदार को सरल कैसे बना देते हैं आप. तनु वेड्स मनु या आपकी किसी भी फिल्म में आप सहज दिखते हैं अभिनय करते हुए?

– मुझे लगता है कि आपको एहसास करना पड़ता है. आंखें हो, चेहरा हो. सबकुछ सिंक में होना जरूरी है. लोग इसलिए स्वीकारते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि आपका प्यार उन्हें भी दिख रहा है. आपका दर्द ऑडियंस तक पहुंचना चाहिए. आॅडियंस कहे नहीं फील करें कि हां उन्हें आपका काम पसंद आया. यह सबकुछ थियेटर और टेलीविजन एक्टिंग से मैंने काफी सीखा है. आनंद एल राय जैसे निर्देशक होते हैं. तो आप कर पाते हैं. जिस तरह की फिल्में मैं करता हूं. उनके लिए.

मैं इन बातों का भी ख्याल रखता हूं कि चेहरा मेरा एक ही है और फिल्में कई करनी है या की है. इस चेहरे में मुस्कुराहट और एंगर सब एक ही तरह का है. पर जिस माहौल के लिए रिलेवेंट है वह महत्वपूर्ण है. जैसे 3 इडियट्स में मैं तब हंस रहा हूं जब आमिर कोई जोक सुना रहा है. या फिर तनु वेड्स मनु में तब हंस रहा हूं.जब पप्पी मुझे कोई जोक सुना रहा है. ये सब हंसी के बारे में सोचता हूं तो लगता है कि मैं रियल हूं. और मैं इसलिए रियलिस्टिक फिल्में अधिक करता हूं.

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