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Article 15 Movie Review: बेबाक और साहसिक है आयुष्मान खुराना की यह फिल्म

Updated at : 27 Jun 2019 4:02 PM (IST)
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Article 15 Movie Review: बेबाक और साहसिक है आयुष्मान खुराना की यह फिल्म

फिल्म : आर्टिकल १५ निर्माता-निर्देशक : अनुभव सिन्हा कलाकार : आयुष्मान खुराना, मनोज पाहवा, कुमुद मिश्रा, सयोनी गुप्ता, जीशान अयूब और अन्य रेटिंग : चार स्टार उर्मिला कोरी हिंदी सिनेमा दलित जीवन और उससे जुड़ी चिंताओं को प्रतिनिधित्व करने में असमर्थ रहा है. दलित मुद्दों, उनकी परेशानी उनकी जिंदगी सिनेमा के लिए भी अछूत ही […]

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  • फिल्म : आर्टिकल १५
  • निर्माता-निर्देशक : अनुभव सिन्हा
  • कलाकार : आयुष्मान खुराना, मनोज पाहवा, कुमुद मिश्रा, सयोनी गुप्ता, जीशान अयूब और अन्य
  • रेटिंग : चार स्टार

उर्मिला कोरी

हिंदी सिनेमा दलित जीवन और उससे जुड़ी चिंताओं को प्रतिनिधित्व करने में असमर्थ रहा है. दलित मुद्दों, उनकी परेशानी उनकी जिंदगी सिनेमा के लिए भी अछूत ही रहे हैं. 100 साल के सिनेमा के इतिहास में गिनी चुनी फिल्में दलितों की जिंदगी के दर्द को उकेर पायी है. निर्माता-निर्देशक अनुभव सिन्हा की हालिया रिलीज फिल्म इस मामले में अलहदा है. ‘आर्टिकल 15’ संवेदनशील मुद्दे जातिवाद को जिस बेबाकी से पेश करती है, वो साहस काबिलेतारीफ है.

फिल्म की कहानी उत्तर प्रदेश के लालगांव की है. वहां पर आईपीएस आॅफिसर अयान रंजन (आयुष्मान खुराना) की नयी-नयी पोस्टिंग हुई है. पुलिस स्टेशन में जश्न का माहौल है लेकिन लालगंज के दलित टोला की तीन लड़कियां गायब हैं, पुलिस लीपापोती में लगी है. दो दिन बाद दो लड़कियों की लाश पेड़ पर मिलती है. पुलिस इसे आॅनर किलिंग का नाम देती है लेकिन अयान को मालूम पड़ता है कि हकीकत कुछ और ही है.

सामाजिक विषमता का मामला है. तीन रुपये ज्यादा दिहाड़ी मजदूरी की मांग करने पर लड़कियों का गैंगरेप कर मार दिया जाता है. एक खास तबके का खुद को श्रेष्ठ दिखाने का यह जरिया है और उनलोगों (दलित) को उनकी औकात बताने का. जो उन्होंने तय की है. क्या अयान और भारतीय संविधान खुद को श्रेष्ठ तबका बताने वाले उस तबके को उसकी असली औकात बता पाएगा? संविधान की नजर में सभी बराबर है ये साबित कर पाएगा? यह जानने के लिए आपको फिल्म देखनी होगी.

अनुभव सिन्हा ने फिल्म को थ्रिलर अंदाज में प्रस्तुत किया है. परत दर परत कहानी खुलती है, जो आपको न सिर्फ चौंकाती है बल्कि झकझोर देती है. फिल्म का फर्स्ट हाफ थोड़ा लंबा खिंच गया है. छोटी-मोटी खामियों को नजरअंदाज करें, तो फिल्म ‘आर्टिकल १५’ एक साहसिक फिल्म है.

लेखक गौरव सोलंकी की लेखनी की तारीफ करनी होगी. जो किसी को बख्शती नहीं है. सब पर सवाल उठाती है. हिंदुत्ववादी राजनेताओं पर उंगली उठाता है तो दलित नेताओं को भी कटघरे में खड़ा में करता है. जो राजनीति में ऊपर उठने के लिए अपने समुदाय का इस्तेमाल करते हैं लेकिन जब सत्ता में आते हैं.

समुदाय के लोगों की मदद करने के बजाय मूर्ति बनाने में जुट जाते हैं. मीडिया पर भी सवाल उठाया गया है कि दिल्ली गैंगरेप की खबर वह फ्रंट पेज पर छापते हैं. घंटों उस पर बहस भी करते हैं लेकिन लाल गांव जैसे भारत के गांवों में दलित महिलाओं और बच्चियों के साथ गैंगरेप को वह खबरों में प्रमुखता नहीं देते हैं, जबकि ऐसी खबरें फ्रंट पेज पर जीडीपी विकास दर के खबर के साथ छपनी चाहिए.

जातिवाद के मुद्दे पर जो लोग न्यूट्रल खुद को बताते हैं फिल्म उनको भी तमाचा जड़ती है कि आप न्यूट्रल रहकर जो लोग शोषण कर रहे हैं. उनको सपोर्ट करते हैं. जातिवाद असमानता का अंत विरोध से होगा लेकिन विरोध हिंसक नहीं होना चाहिए. क्यों नहीं होना चाहिए. फिल्म इसका भी संदेश दलित समुदाय को देती है. फिल्म का विषय जितना सशक्त है.

फिल्म के दृश्य भी उतने प्रभावी बन पड़े हैं. जब सभी लोग अपने वोटिंग पैटर्न का जिक्र करते हैं. वो बेहतरीन दृश्य है. गंदे नाले में सफाईकर्मी का पूरा दृश्य हो या फांसी देकर पेड़ पर लटकायी गयी लड़कियों का दृश्य या फिर मरी हुई लड़कियों के पिता का संवाद कि चाहे और कुछ दिन रख लेते लेकिन मारा क्यों (अपनी बेटियों के साथ गैंगरेप का वो दर्द झेल लेते थे) आपको झकझोरता है. असहज करता है. फिल्म का हर फ्रेम रियलिस्टिक है.

फिल्म के संवाद कहानी के साथ न सिर्फ न्याय करते हैं बल्कि फिल्म को दमदार बना देते हैं. पावर की एक अलग ही जाति होती है. हमें हीरो नहीं चाहिए. बस ऐसे लोग चाहिए जो हीरो का इंतजार न करें. हम कभी हरिजन हैं, कभी बहुजन, बस जन नहीं बन पाते हैं.

अभिनय की बात करें, तो फिल्म की यह यूएसपी है. फिल्म में समर्थ कलाकारों की टीम है जो पूरी तरह से अपने किरदार में रचे-बसे हैं. अब तक कॉमिक किरदारों में वाहवाही बटोरने वाले आयुष्मान ने सीरियस पुलिस आॅफिसर के तौर पर भी बेहतरीन काम किया है. कुमुद मिश्रा, मनोज पाहवा, सयोनी सहित सभी कलाकार अपनी भूमिका के साथ बखूबी न्याय करते हैं. जीशान अयूब का किरदार छोटा जरूर है, लेकिन प्रभावी है. फिल्म के एक अहम नायक वो भी हैं. फिल्म का गीत संगीत कहानी के अनुरूप है. कुल मिलाकर रियलिस्टिक सिनेमा का प्रतिनिधित्व करती यह फिल्म झकझोरती है. असहज करती है. लेकिन जरूर देखी जानी चाहिए.

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