इटली के फिल्म महोत्सव में भारतीय फिल्मों की धूम

नयी दिल्ली : भारतीय सिनेमा के 1950 के दशक की क्लासिक फिल्में और दुर्लभ न्यूजरील इन दिनों इटली में चल रहे एक अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव का हिस्सा हैं. इनमें से एक न्यूजरील में महात्मा गांधी और चार्ली चैपलिन के बीच लंदन में हुई मुलाकात भी दिखाई गई है. इटली के बोलोगना शहर में चल रहे […]
नयी दिल्ली : भारतीय सिनेमा के 1950 के दशक की क्लासिक फिल्में और दुर्लभ न्यूजरील इन दिनों इटली में चल रहे एक अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव का हिस्सा हैं. इनमें से एक न्यूजरील में महात्मा गांधी और चार्ली चैपलिन के बीच लंदन में हुई मुलाकात भी दिखाई गई है.
इटली के बोलोगना शहर में चल रहे ‘दूसरे सिनेमा रित्रोवातो’ महोत्सव में हिंदी फिल्म जगत की कुछ मशहूर श्वेत श्याम क्लासिक जैसे ‘आवारा’, ‘प्यासा’, ‘मदर इंडिया’ और एस एस वासन की तमिल भाषा की ‘चंद्रलेखा’ को स्थान मिला है. भारतीय सिनेमा के इतिहास को समर्पित इस समारोह में ‘द गोल्डन फिफ्टीज (इंडियाज) एन्डेंजर्ड क्लासिक्स’ शीर्षक के तहत पहली बार भारतीय सिनेमा के गुजरे दौर पर नजर डाली गई है.
फिल्म समारोह के समन्वय की जिम्मेदारी फिल्मकार शिवेंद्र सिंह डुंगरपुर पर है, जो अपने वृत्तचित्र ‘सेल्यूलॉइड मेन’ के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार हासिल करने के लिए चर्चित हैं. इस वृत्तचित्र ने दुर्लभ मूक फिल्मों समेत भारतीय सिनेमाई विरासत के नुकसान को प्रमुखता से दिखाया था.

डुंगरपुर ने बताया, ‘‘भारत में लगभग 1700 मूक फिल्में बनी थीं और उनमें से महज पांच या छह फिल्में ही आज सलामत बची हैं. यह दुर्भाग्य है कि 1931 में आई हमारी पहली बोलती फिल्म ‘आलम आरा’ भी नष्ट हो चुकी है. वर्ष 1950 तक भारत अपनी फिल्मों में से 70 से 80 प्रतिशत फिल्में खो चुका था और यह व्यापक तौर पर फैली इस गलत धारणा का नतीजा है, जो मानती है कि फिल्में हमेशा रहेंगी.’’
उन्होंने कहा, ‘‘अब हमें लगता है कि यदि संरक्षण और पुर्नसंग्रहण के लिए जरुरी कदम नहीं उठाए गए तो ये आठ क्लासिक फिल्में भी बच नहीं पाएंगी. इन फिल्मों का प्रदर्शन हमारी अदभुत सिनेमाई विरासत की याद ही नहीं दिलाता, बल्कि यह हमें उन फिल्मों की याद भी दिलाता है, जो खतरे के कगार पर हैं और जिन्हें बचाया जाना चाहिए.’’
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