स्टील कंपनियों की बिजली टेंशन खत्म, रिन्यूएबल एनर्जी से खर्च में 34% तक कटौती
रिन्यूएबल एनर्जी से स्टील MSMEs की बिजली लागत 34% तक घट सकती है. जानिए ग्रुप कैप्टिव मॉडल से कंपनियां सालाना ₹2.4 करोड़ तक कैसे बचा सकती हैं.
भारत की छोटी और मझोली स्टील इकाइयों यानी सेकेंडरी स्टील MSMEs के लिए बिजली का खर्च कम करने का रास्ता सामने आया है. एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, नवीकरणीय ऊर्जा का इस्तेमाल करने से इन इकाइयों की बिजली लागत 34% तक घट सकती है. इससे क्लस्टर और यूनिट के आकार के हिसाब से सालाना करीब ₹2.2 करोड़ से ₹2.4 करोड़ तक की बचत संभव है. रिपोर्ट 12 अगस्त 2026 को रायपुर में CII के ग्रीन स्टील समिट में जारी की गई.
बिजली खर्च इतना अहम क्यों है?
सेकेंडरी स्टील इकाइयों में बिजली परिचालन लागत का 40% तक हिस्सा हो सकती है. फिलहाल कई राज्यों में नवीकरणीय बिजली की दर करीब ₹4.5 से ₹6 प्रति यूनिट है, जबकि ग्रिड टैरिफ ₹7 से ₹8 प्रति यूनिट तक है. इसी अंतर से कंपनियों के लिए लागत घटाने की गुंजाइश बनती है. सेकेंडरी स्टील में बड़े ब्लास्ट फर्नेस के बजाय इलेक्ट्रिक आर्क और इंडक्शन फर्नेस से बनने वाला स्टील शामिल है. इसके अलावा री-रोलिंग मिल, फोर्जिंग और फाउंड्री इकाइयां भी इस क्षेत्र का हिस्सा हैं.
किन स्टील क्लस्टरों में दिखी ज्यादा संभावना?
रिपोर्ट में 22 सेकेंडरी स्टील क्लस्टरों को रिन्यूएबल एनर्जी अट्रैक्टिवनेस इंडेक्स पर परखा गया. इसमें राज्य की नीति, लागत बचत की संभावना, बिजली खपत, नवीकरणीय ऊर्जा की उपलब्ध संभावना और जमीन की उपलब्धता जैसे पहलुओं को देखा गया. इस इंडेक्स में रायपुर, बेलगाम, शिमोगा, राजकोट और भावनगर शीर्ष पांच क्लस्टर रहे. इनमें रायपुर और राजकोट को केस स्टडी के तौर पर लेकर यह आकलन किया गया कि वहां की प्रतिनिधि इकाइयों को नवीकरणीय बिजली अपनाने पर कितना निवेश करना होगा और कितनी बचत हो सकती है.
ग्रुप कैप्टिव मॉडल क्यों फायदेमंद है?
रिपोर्ट ने नवीकरणीय बिजली खरीदने के तीन तरीकों का आकलन किया. इसमें ग्रुप कैप्टिव मॉडल को MSMEs के लिए सबसे कारगर बताया गया है.
| मॉडल | क्या खास है |
| फुल केपेक्स | सबसे ज्यादा बचत, लेकिन शुरुआती निवेश, जमीन और रखरखाव की जरूरत |
| ग्रुप कैप्टिव | कई इकाइयां मिलकर प्लांट लगाती हैं और अपनी हिस्सेदारी के हिसाब से बिजली लेती हैं |
| थर्ड-पार्टी ओपन एक्सेस | शुरुआती पूंजीगत खर्च नहीं, लेकिन सरचार्ज से बचत सीमित |
ग्रुप कैप्टिव मॉडल में कई स्टील इकाइयां मिलकर नवीकरणीय ऊर्जा प्लांट की मालिक बनती हैं. मांग को एक साथ जोड़ने से परियोजना का आकार बढ़ता है और किसी एक MSME पर पूरा निवेश भार नहीं आता. रिपोर्ट के मुताबिक, इस मॉडल में शुरुआती निवेश एक से दो साल में वसूल हो सकता है.
रायपुर और राजकोट में कितनी बचत का अनुमान?
राजकोट में एक फाउंड्री को ग्रुप कैप्टिव सोलर प्रोजेक्ट में 5 MW की हिस्सेदारी लेने के लिए करीब ₹1.4 करोड़ की इक्विटी लगानी होगी. इससे उसका बिजली टैरिफ लगभग 20% कम हो सकता है. वहीं रायपुर में 10 MW की हिस्सेदारी लेने वाली एक इकाई को करीब ₹2.7 करोड़ निवेश करना होगा. इससे उसका बिजली शुल्क लगभग 34% तक कम हो सकता है. दोनों मामलों में शुरुआती निवेश एक से दो साल में वसूल होने का अनुमान है.
आगे क्या करने की जरूरत है?
रिपोर्ट में ग्रुप कैप्टिव मॉडल को बड़े स्तर पर लागू करने के लिए राज्य नियामकों, DISCOMs और सार्वजनिक वित्तीय संस्थानों से सहयोग की जरूरत बताई गई है. इसके लिए स्टील क्लस्टरों को समयबद्ध ओपन एक्सेस रियायतें देने, SIDBI या IREDA के जरिए पोर्टफोलियो-स्तरीय लोन गारंटी उपलब्ध कराने और राज्यों में ग्रुप कैप्टिव के लिए एक समान ढांचा तैयार करने की सिफारिश की गई है.
इसका फायदा सिर्फ बिजली खर्च घटाने तक सीमित नहीं रहेगा. रिपोर्ट के मुताबिक, भारत का सेकेंडरी स्टील क्षेत्र देश के कच्चे इस्पात उत्पादन का करीब 44% हिस्सा है. 1,000 से ज्यादा MSME इकाइयां सालाना अनुमानित 50 से 60 मिलियन टन CO2e उत्सर्जन करती हैं.
फिलहाल सेकेंडरी स्टील MSMEs में नवीकरणीय ऊर्जा का इस्तेमाल करीब 11% है, जबकि देश के कुल बिजली मिश्रण में नवीकरणीय ऊर्जा की हिस्सेदारी 22% है. ऐसे में ग्रुप कैप्टिव जैसे मॉडल बिजली की लागत घटाने के साथ स्टील इकाइयों के उत्सर्जन को कम करने में भी मदद कर सकते हैं.
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By सौम्या शाहदेव
सौम्या शाहदेव प्रभात खबर डिजिटल में बिजनेस कंटेंट राइटर हैं. वह शेयर बाजार, पर्सनल फाइनेंस, टैक्स, सरकारी योजनाओं, बैंकिंग और रोजमर्रा की आर्थिक खबरों को सरल और सटीक भाषा में पाठकों तक पहुंचाती हैं. उनका फोकस ऐसी खबरें लिखने पर रहता है जो सीधे आम लोगों की जिंदगी और जेब पर असर डालती हैं.
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