पाकिस्तान में अब मरना भी हुआ 'लक्जरी': कफन-दफन के लिए भी लेना पड़ रहा कर्ज, आसमान छू रहे हैं मौत के खर्चे
Published by : Abhishek Pandey Updated At : 15 May 2026 4:31 PM
सांकेतिक तस्वीर (फोटो : AI )
Pakistan Funeral Costs : पाकिस्तान में महंगाई का ऐसा खौफनाक मंजर कि अब सम्मान के साथ मरना भी हुआ महंगा. रावलपिंडी जैसे शहरों में अंतिम संस्कार के खर्च ने गरीबों को कर्जदार बना दिया है. पढ़ें एक टूटते समाज की कहानी.
Pakistan Funeral Costs : पाकिस्तान इस वक्त अपने इतिहास के सबसे बुरे आर्थिक दौर से गुजर रहा है. यहां महंगाई ने न केवल जीने की राह मुश्किल की है, बल्कि अब आखिरी सफर यानी ‘मौत’ को भी एक महंगा सौदा बना दिया है. रावलपिंडी जैसे बड़े शहरों से जो खबरें आ रही हैं, वे किसी का भी दिल दहला देने वाली हैं. एक गरीब इंसान के लिए अब अपने प्रियजन को गरिमा के साथ विदा करना भी मुमकिन नहीं रहा.
सेवा भाव खत्म, मौत बनी बिजनेस
एक दौर था जब पाकिस्तान के मोहल्लों में किसी की मौत होने पर लोग बिना किसी स्वार्थ के कब्र खोदने और मदद के लिए दौड़े चले आते थे. लेकिन आज की कंगाली ने उस सामाजिक भाईचारे को लील लिया है. अब हर रस्म की एक कीमत तय है और पुण्य (शवाब) कमाने का स्थान भारी-भरकम फीस ने ले लिया है.
कब्र से लेकर कफन तक का भारी बिल
पाकिस्तान में सुपुर्द-ए-खाक करने का पूरा प्रोसेस अब आम आदमी के बजट से बाहर हो चुका है.
- कब्र की खुदाई और जगह: कब्रिस्तानों में जगह की कमी और खुदाई का खर्च मिलाकर अब 40,000 से 45,000 पाकिस्तानी रुपये तक का बिल थमाया जा रहा है.
- गुस्ल और कफन: शव को नहलाने (गुस्ल) और कफन खरीदने का खर्च अलग है. जो कफन पहले सस्ता मिलता था, वह अब 3,000 से 4,000 रुपये का हो चुका है. गुलाब जल, अगरबत्ती और फूलों के लिए भी अलग से 2,000 रुपये देने पड़ रहे हैं.
- कब्र पक्की करने का खर्च: दफनाने के बाद अगर परिवार कब्र को पक्का करवाना चाहे, तो साधारण ईंट-सीमेंट के लिए 15,000 रुपये और मार्बल के लिए 30,000 रुपये से ज्यादा की जरूरत होती है.
भ्रष्टाचार और मानवीय संकट
हालात इतने बदतर हैं कि कब्रिस्तानों में भी भ्रष्टाचार पैर पसार चुका है. ऐसी खबरें हैं कि पैसों के लालच में पुरानी या लावारिस कब्रों को हटाकर वहां नई कब्रें बनाई जा रही हैं. जो परिवार दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष कर रहे हैं, उन्हें अपनों को दफनाने के लिए दूसरों के सामने हाथ फैलाना पड़ रहा है या कर्ज लेना पड़ रहा है.
टूटता सामाजिक ढांचा
सिटीजन्स एक्शन कमेटी ने इस पर गहरी चिंता जताते हुए लोगों से अपील की है कि वे शादियों और फिजूलखर्चों को रोककर उन गरीबों की मदद करें जो अपनों की आखिरी विदाई के लिए तड़प रहे हैं. यह स्थिति केवल आर्थिक मंदी नहीं, बल्कि पाकिस्तान के सामाजिक पतन की कहानी है, जहाँ एक इंसान की मौत पर संवेदना से ज्यादा उसकी ‘कीमत’ वसूली जा रही है.
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लेखक के बारे में
By Abhishek Pandey
अभिषेक पाण्डेय पिछले 2 वर्षों से प्रभात खबर (Prabhat Khabar) में डिजिटल जर्नलिस्ट के रूप में कार्यरत हैं। उन्होंने पत्रकारिता के प्रतिष्ठित संस्थान 'दादा माखनलाल की बगिया' यानी माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल (MCU) से मीडिया की बारीकियां सीखीं और अपनी शैक्षणिक योग्यता पूरी की है। अभिषेक को वित्तीय जगत (Financial Sector) और बाजार की गहरी समझ है। वे नियमित रूप से स्टॉक मार्केट (Stock Market), पर्सनल फाइनेंस, बजट और बैंकिंग जैसे जटिल विषयों पर गहन शोध के साथ विश्लेषणात्मक लेख लिखते हैं। इसके अतिरिक्त, इंडस्ट्री न्यूज, MSME सेक्टर, एग्रीकल्चर (कृषि) और केंद्र व राज्य सरकार की सरकारी योजनाओं (Sarkari Yojana) का प्रभावी विश्लेषण उनके लेखन के मुख्य क्षेत्र हैं। आम जनमानस से जुड़ी यूटिलिटी (Utility) खबरों और प्रेरणादायक सक्सेस स्टोरीज को पाठकों तक पहुँचाने में उनकी विशेष रुचि है। तथ्यों की सटीकता और सरल भाषा अभिषेक के लेखन की पहचान है, जिसका उद्देश्य पाठकों को हर महत्वपूर्ण बदलाव के प्रति जागरूक और सशक्त बनाना है।
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