H-1B Visa: लॉटरी में चयन की दर 75% के रिकॉर्ड स्तर पर, ट्रंप की ‘महंगी’ पॉलिसी ने ऐसे बदली किस्मत

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सांकेतिक तस्वीर (फोटो: Canva)

H-1B Visa: अमेरिका में H-1B वीजा पाना अब पहले से आसान हो गया है! ट्रंप प्रशासन की नई नीतियों के कारण चयन दर 75% तक पहुंच गई है. जानिए क्या हैं इसके पीछे के बड़े कारण.

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H-1B Visa: अमेरिका में काम करने का सपना देख रहे कुशल पेशेवरों के लिए साल 2026 एक बड़ा बदलाव लेकर आया है. जहां पिछले कई सालों से H-1B वीजा की लॉटरी निकलना ‘असंभव’ सा होता जा रहा था, वहीं इस साल चयन दर (Selection Rate) ने पुराने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं. कुछ मामलों में तो सफलता की दर 75% तक पहुंच गई है.

इतनी बड़ी बढ़त कैसे हुई?

हैरानी की बात यह है कि वीजा की संख्या (85,000) नहीं बढ़ी है, बल्कि आवेदकों की भीड़ कम हो गई है. इसके पीछे ट्रंप प्रशासन की कुछ सख्त नीतियां हैं:

  • $100,000 की भारी फीस: व्हाइट हाउस ने अमेरिका के बाहर से बुलाए जाने वाले हर नए H-1B कर्मचारी पर $100,000 (करीब ₹83 लाख) की फीस लगा दी है.
  • एप्लीकेशन पूल में गिरावट: इतनी भारी फीस के कारण यूनिवर्सिटी, अस्पताल और कई टेक कंपनियों ने विदेश से नए लोग बुलाना कम कर दिया है. इस साल आवेदनों की संख्या पिछले साल के मुकाबले 43% तक गिर गई है.
  • नया वेटेज सिस्टम: पुरानी ‘रैंडम’ लॉटरी की जगह अब एक नया सिस्टम लागू किया गया है, जो ज्यादा सैलरी और अनुभवी (Senior) कर्मचारियों को प्राथमिकता देता है.

पहले और अब

  • पहले: चयन की संभावना 3 में से 1 (करीब 33%) रहती थी.
  • अब: बड़ी लॉ फर्म्स जैसे BAL और Ogletree Deakins ने 50% से 71% तक की सफलता दर दर्ज की है.
  • खास वर्ग: मास्टर डिग्री और अधिक सैलरी वाले आवेदकों के लिए यह दर 75% के पार पहुंच गई है.

किसे हुआ सबसे ज्यादा फायदा?

इस नई नीति का सबसे बड़ा फायदा उन लोगों को हुआ है जो पहले से ही अमेरिका में मौजूद हैं (जैसे छात्र या अन्य वीजा धारक). उनके नियोक्ताओं को $100,000 की एक्स्ट्रा फीस नहीं देनी पड़ती, जिससे उनके चयन की उम्मीदें काफी बढ़ गई हैं.

टेक सेक्टर और AI का असर

रिपोर्ट्स के मुताबिक, टेक कंपनियों ने भी इस साल कम आवेदन किए हैं. इसकी दो मुख्य वजहें हैं:

  • AI में निवेश: कंपनियां अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर ज्यादा खर्च कर रही हैं और कम अनुभवी ‘फ्रेशर्स’ के बजाय गिने-चुने ‘सीनियर’ टैलेंट को ही मौका दे रही हैं.
  • कानूनी पेच: $100,000 की फीस को कई अदालतों में चुनौती दी गई है. कई कंपनियां “रुको और देखो” (Wait and See) की नीति अपना रही हैं.

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Abhishek Pandey

लेखक के बारे में

By Abhishek Pandey

अभिषेक पाण्डेय पिछले तीन वर्षों से प्रभात खबर में डिजिटल जर्नलिस्ट के तौर पर काम कर रहे हैं। वे बिजनेस और अर्थव्यवस्था से जुड़ी खबरों को आसान भाषा में पाठकों तक पहुंचाने का काम करते हैं। शेयर बाजार, पर्सनल फाइनेंस, बैंकिंग, बजट, सरकारी योजनाएं, MSME, कृषि और इंडस्ट्री जैसे विषयों पर उनकी अच्छी पकड़ है। वे रिसर्च के साथ ऐसी खबरें और एक्सप्लेनर तैयार करते हैं, जिन्हें आम लोग भी आसानी से समझ सकें। इसके अलावा यूटिलिटी न्यूज और सक्सेस स्टोरीज लिखने में भी उनकी खास रुचि है।

पत्रकारिता अनुभव

अभिषेक ने पत्रकारिता की पढ़ाई माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय (MCU), भोपाल से की है, जिसे पत्रकारिता की दुनिया में 'दादा माखनलाल की बगिया' भी कहा जाता है।

करियर की शुरुआत उन्होंने राजस्थान पत्रिका के साथ की, जहां उन्होंने डिजिटल पत्रकारिता की बारीकियों को करीब से समझा। इसके बाद वे प्रभात खबर से जुड़े और पिछले तीन वर्षों से डिजिटल जर्नलिस्ट के रूप में काम कर रहे हैं।

इस दौरान उन्होंने बिजनेस, शेयर बाजार, पर्सनल फाइनेंस, बैंकिंग, बजट, सरकारी योजनाएं, कृषि, MSME और अर्थव्यवस्था से जुड़े कई अहम विषयों पर रिपोर्टिंग और रिसर्च आधारित लेख लिखे हैं। इसके अलावा वे वीडियो स्क्रिप्टिंग, एक्सप्लेनर स्टोरी, डेटा स्टोरी और डिजिटल कंटेंट पर भी लगातार काम करते हैं। उनकी कोशिश रहती है कि जटिल आर्थिक और वित्तीय विषयों को आसान और भरोसेमंद भाषा में पाठकों और दर्शकों तक पहुंचाया जाए।

शिक्षा

अभिषेक पाण्डेय ने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय (MCU), भोपाल से पत्रकारिता एवं जनसंचार की पढ़ाई की है। यहां उन्होंने रिपोर्टिंग, डिजिटल मीडिया, न्यूज़ राइटिंग, वीडियो प्रोडक्शन और मल्टीमीडिया जर्नलिज्म की बारीकियां सीखीं, जिनका इस्तेमाल वे आज अपनी पत्रकारिता में कर रहे हैं।

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