फिक्सड डिपोजिट की ओर बढ़ा ग्राहकों का रुझान, महिलाएं गोल्ड लोन लेने में अव्वल

19 मई, 2023 तक बैंकों की जमा राशि 183.74 लाख करोड़ रुपये थी, जो 18 लाख करोड़ रुपये की वृद्धि दिखा रहा हैं और यह पिछले साल से 10.9 प्रतिशत अधिक था. फिक्सड डिपोजिट में 11.4 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि सेविंग में 6.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई.
क्या फिक्सड डिपोजिट की ओर बैंक ग्राहकों का रुझान बढ़ रहा है? आज यह सवाल इसलिए किया जा रहा है क्योंकि पिछले कुछ साल में आम ग्राहकों का रुझान 1-3 साल की अवधि के फिक्सड डिपोजिट में काफी बढ़ा है. इसकी वजह यह है कि पिछले छह साल के बाद आम बचतकर्ताओं और पेंशनभोगियों को अपने बचत खाते में इंटरेस्ट रेट ज्यादा आता हुआ दिख रहा है. कारण साफ है,भारतीय रिजर्व बैंक ने रेपो रेट में वृद्धि की है जिसका असर जमा रकम पर ब्याज दरों में दिख रहा है.
19 मई, 2023 तक बैंकों की जमा राशि 183.74 लाख करोड़ रुपये थी, जो 18 लाख करोड़ रुपये की वृद्धि दिखा रहा हैं और यह पिछले साल से 10.9 प्रतिशत अधिक था. फिक्सड डिपोजिट में 11.4 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि सेविंग में 6.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई.
बैंकों में कुल जमा राशि में मार्च 2023 तक के आंकड़ों के अनुसार महिलाओं का योगदान 20.5 प्रतिशत बढ़कर 36.99 लाख करोड़ रुपये हो गया, एक साल पहले यह 19.8 प्रतिशत था. सबसे अधिक राशि जमा करने वालों में महाराष्ट्र की महिलाएं हैं जिन्होंने 5.17 लाख करोड़ रुपये किये हैं.
लोन लेने में भी महिलाएं काफी बढ़-चढ़कर आगे आ रही हैं. भारत में जो महिलाएं लोन ले रही हैं, उनमें सबसे ज्यादा गोल्ड लोन लेने वाली महिलाएं हैं, उसके बाद एजुकेशन लोन 35 प्रतिशत और होम लोन लेने वाली 32 प्रतिशत महिलाएं हैं.
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By रजनीश आनंद
रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.
राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.
रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.
आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.
रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.
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