Budget Demand: वित्त वर्ष 2026-27 के आम बजट से पहले तेल एवं गैस उद्योग ने सरकार के सामने बड़ी मांग रखी है. उद्योग संगठनों का कहना है कि कच्चे तेल पर लगाए जा रहे तेल उद्योग विकास (ओआईडी) उपकर को या तो पूरी तरह समाप्त किया जाए या फिर इसकी व्यापक समीक्षा की जाए. उनका तर्क है कि मौजूदा व्यवस्था घरेलू कच्चे तेल के उत्पादन, निवेश और परियोजनाओं की आर्थिक व्यवहार्यता पर नकारात्मक असर डाल रही है.
वित्त मंत्रालय को सौंपे गए सुझाव
भारतीय पेट्रोलियम उद्योग महासंघ (एफआईपीआई) ने वित्त मंत्रालय को भेजे अपने बजट सुझावों में कहा है कि ओआईडी उपकर अब पेट्रोलियम उद्योग के लिए अत्यधिक बोझ बन चुका है. संगठन के अनुसार, ऐतिहासिक रूप से यह उपकर कच्चे तेल की कीमत का केवल 8% से 10% हुआ करता था, लेकिन समय के साथ इसकी संरचना बदल गई है, जिससे घरेलू उत्पादकों पर कर का दबाव काफी बढ़ गया है. एफआईपीआई ने स्पष्ट किया कि वर्तमान स्वरूप में यह उपकर उद्योग के विकास में सहायक होने के बजाय निवेश के रास्ते में बाधा बन रहा है.
2016 में बदला गया था उपकर का ढांचा
तेल उद्योग (विकास) अधिनियम, 1974 के तहत लगाए जाने वाले ओआईडी उपकर को 1 मार्च 2016 को वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में तेज गिरावट के बाद संशोधित किया गया था. उस समय इसे विशिष्ट दर (फिक्स्ड अमाउंट) के बजाय 20% मूल्य-आधारित शुल्क में बदल दिया गया. उद्योग का कहना है कि जब अंतरराष्ट्रीय कीमतें बढ़ती हैं, तो यह मूल्य-आधारित उपकर घरेलू उत्पादकों पर असमान रूप से भारी पड़ता है, जिससे उनकी लागत बढ़ जाती है और लाभप्रदता घटती है.
किन तेल ब्लॉकों पर लागू होता है ओआईडी उपकर
एफआईपीआई ने बताया कि ओआईडी उपकर केवल उन्हीं तेल ब्लॉकों पर लागू होता है, जिनमें खोज एवं उत्पादन का अधिकार सरकार पहले ही नामित कंपनियों को दे चुकी थी या जो 1997 से पहले की पुरानी लाइसेंसिंग नीति (प्री-एनईएलपी) के तहत आते हैं. संगठन के अनुसार, ये अधिकांशतः पुराने तेल क्षेत्र हैं, जहां उत्पादन पहले ही गिरावट के दौर में है. ऐसे क्षेत्रों में उत्पादन बनाए रखने और बढ़ाने के लिए ज्यादा निवेश, उन्नत तकनीक और उच्च परिचालन लागत की जरूरत होती है.
पुराने क्षेत्रों में निवेश पर पड़ रहा असर
उद्योग निकाय का कहना है कि मुंबई हाई और बेसिन जैसे ओएनजीसी के बड़े क्षेत्र नामित ब्लॉक हैं, जबकि वेदांता केयर्न का राजस्थान क्षेत्र भी एनईएलपी-पूर्व ब्लॉक की श्रेणी में आता है. इन क्षेत्रों पर ओआईडी उपकर लागू होने से कंपनियों के लिए नई ड्रिलिंग, उन्नत रिकवरी तकनीक और उत्पादन बढ़ाने वाली परियोजनाओं में निवेश करना कठिन होता जा रहा है. इसके विपरीत, नवीन खोज लाइसेंस नीति (एनईएलपी), मुक्त क्षेत्र लाइसेंस नीति (ओएएलपी) और खोजे गए छोटे क्षेत्र (डीएसएफ) ब्लॉकों पर यह उपकर लागू नहीं है. इससे एक ही उद्योग के भीतर असमान कर संरचना बन गई है.
‘मेक इन इंडिया’ के खिलाफ बताया गया मौजूदा ढांचा
एफआईपीआई ने अपने सुझावों में कहा है कि ओआईडी उपकर केवल घरेलू कच्चे तेल पर लगाए जाने से स्थानीय उत्पादक आयातित तेल की तुलना में नुकसान की स्थिति में आ जाते हैं. इससे भारत में उत्पादन करने की लागत बढ़ती है, जबकि आयात अपेक्षाकृत सस्ता पड़ता है. उद्योग संगठन का मानना है कि यह व्यवस्था ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसे राष्ट्रीय उद्देश्यों के विपरीत है, क्योंकि इससे घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहन मिलने के बजाय हतोत्साहित किया जा रहा है.
चरणबद्ध उपकर का प्रस्ताव
ओआईडी उपकर को पूरी तरह समाप्त करने के साथ-साथ एफआईपीआई ने एक वैकल्पिक सुझाव भी रखा है. संगठन ने कच्चे तेल की कीमत से जुड़ा चरणबद्ध उपकर लागू करने का प्रस्ताव दिया है. इसके तहत 25 डॉलर प्रति बैरल तक शून्य उपकर, 25 से 50 डॉलर प्रति बैरल तक 5%, 50 से 70 डॉलर प्रति बैरल तक 10% और 70 डॉलर से ऊपर प्रति बैरल तक 20% उपकर लागू करने की मांग की गई है. उद्योग का कहना है कि इस मॉडल से कीमतों में उतार-चढ़ाव के अनुसार कर संरचना संतुलित रहेगी और कंपनियों पर अचानक अत्यधिक वित्तीय बोझ नहीं पड़ेगा.
दूसरे करों को हटाने की भी मांग
ओआईडी उपकर के अलावा, एफआईपीआई ने घरेलू कच्चे तेल पर लगाए जाने वाले ‘राष्ट्रीय आपदा आकस्मिक शुल्क’ (एनसीसीडी) और ‘बुनियादी उत्पाद शुल्क’ को भी समाप्त करने की मांग की है. संगठन का तर्क है कि कई स्तरों पर कर लगने से नियामकीय बोझ बढ़ता है और परियोजनाओं की लागत काफी ऊपर चली जाती है.
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निवेश और उत्पादन बढ़ाने की उम्मीद
उद्योग निकाय का कहना है कि यदि इन करों को हटाया जाता है या तर्कसंगत बनाया जाता है, तो इससे नियामकीय बोझ कम होगा, कारोबारी सुगमता बढ़ेगी और घरेलू तेल उत्पादन में निवेश को बढ़ावा मिलेगा. इससे न केवल ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी, बल्कि आयात पर निर्भरता घटाने में भी मदद मिलेगी.
भाषा इनपुट के साथ
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