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खराब मानसून अभी भी आर्थिक वृद्धि और मुद्रास्फीति के लिए खतरा : रघुराम राजन

Updated at : 27 Aug 2015 8:40 PM (IST)
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खराब मानसून अभी भी आर्थिक वृद्धि और मुद्रास्फीति के लिए खतरा : रघुराम राजन

मुंबई: रिजर्व बैंक ने आज कहा कि कृषि क्षेत्र के प्रदर्शन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले मानसून की प्रगति और वितरण में अनिश्चितता से आर्थिक वृद्धि और मुद्रास्फीति परिदृश्य दोनों के लिए ही लगातार जोखिम बना हुआ है.शीर्ष बैंक ने 2014-15 की अपनी सालाना रिपोर्ट में कहा है, मानसून की प्रगति से हालांकि (सूखे की) […]

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मुंबई: रिजर्व बैंक ने आज कहा कि कृषि क्षेत्र के प्रदर्शन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले मानसून की प्रगति और वितरण में अनिश्चितता से आर्थिक वृद्धि और मुद्रास्फीति परिदृश्य दोनों के लिए ही लगातार जोखिम बना हुआ है.शीर्ष बैंक ने 2014-15 की अपनी सालाना रिपोर्ट में कहा है, मानसून की प्रगति से हालांकि (सूखे की) शुरुआती आशंका दूर हुई है लेकिन इसकी प्रगति तथा वितरण को लेकर बनी अनिश्चितता से वृद्धि एवं मुद्रास्फीति दोनों के परिदृश्य को लेकर जोखिम बना हुआ है. रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि कमजोर मानसून से उत्पन्न स्थिति से निपटने के लिये एक व्यापक एवं पहले से ही तैयार खाद्य प्रबंधन रणनीति की जरुरत है.

इसमें कहा गया है कि वित्त वर्ष 2015-16 के पहले चार महीनों में वास्तविक गतिविधियों के संकेतक रिजर्व बैंक की इस साल की 7.6 प्रतिशत सकल वृद्धि के अनुमान के अनुरूप है. यह 2014-15 के 7.2 प्रतिशत से अधिक है.मानसून की संभावना तथा अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत समेत शुरूआती परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए रिजर्व बैंक ने इस साल अप्रैल में मुद्रास्फीति के अगले साल जनवरी तक 6 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया था.
केंद्रीय बैंक ने कहा कि अब तक मुद्रास्फीति के नतीजे इन अनुमानों के अनुरूप ही है. वृद्धि दर के लिये जो मौसम संबंधी अनिश्चितताओं से जोखिम था, वह कच्चे तेल के दाम की गिरावट से संतुलित हो गया.
रिपोर्ट में कहा गया है कि अर्थव्यवस्था का वृद्धि परिदृश्य धीरे-धीरे सुधर रहा है. कारोबारी विश्वास मजबूत बना हुआ है. बुनियादी ढांचे में निवेश को गति देने के लिये बजट में जिन पहलों की घोषणा की गयी है, उनके क्रियान्वयन से निजी निवेश आकर्षित होंगे और विशेषतौर पर जब मुद्रास्फीति नीचे आयेगी तो उपभोक्ता धारणा में सुधार आयेगा.
रिजर्व बैंक ने कहा कि सरकार ने राजकोषीय मजबूती का जो संकल्प लिया है, उससे 2015-16 के दौरान सकल राजकोषीय घाटे को 3.9 प्रतिशत पर रखने के लक्ष्य को हासिल करने के प्रयासों में मदद मिलेगी.राजस्व के बारे में रिपोर्ट में अप्रत्यक्ष कर संग्रह में आई उल्लेखनीय वृद्धि (जुलाई तक 38 प्रतिशत) को रेखांकित किया गया है और कहा गया है कि बजट लक्ष्य को हासिल करना विनिर्माण तथा सेवा क्षेत्रों में सुधार आने पर निर्भर करेगा.
रिजर्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, अनुकूल बाजार स्थिति का लाभ उठाने के लिये विनिवेश योजना को वर्ष के शुरूआती महीनों में बढाये जाने की जरूरत है ताकि घाटे के लक्ष्य को हासिल करने के लिये पूंजीगत व्यय में कटौती न करनी पड़े. इसमें कहा गया है कि राज्यों को केंद्र से मिलने वाली अधिक राशि से उत्पन्न राजकोषीय स्वायत्ता का लाभ उठाने तथा पूंजी एवं विकास खर्च की प्राथमिकतायें तय करने की जरुरत है ताकि राजकोषीय सुधार की गुणवत्ता बनायी रखी जा सके.
रिपोर्ट के अनुसार धन प्रेषण ने वैश्विक वृद्धि में आई नरमी की चुनौती का बखूबी सामना किया है और इसे भुगतान संतुलन बनाये रखने में अपना समर्थन जारी रखना चाहिये. रिजर्व बैंक रिपोर्ट के अनुसार पूर्व की तरह सेवा क्षेत्र में साफ्टवेयर निर्यात और सैलानियों से होने वाली कमाई से व्यापार के मामले में अधिशेष बने रहने की उम्मीद है और इससे वर्ष के दौरान चालू खाते का घाटा सकल घरेलू उत्पाद के 1.5 प्रतिशत से नीचे होना चाहिए.
रिजर्व बैंक ने कहा है कि पूंजी प्रवाह परिदृश्य काफी अनिश्चित है. अमेरिकी मौद्रिक नीति के इस साल के अंत तक ब्याज दर वृद्धि के साथ इसे सामान्य बनाने की दिशा में कदम उठाये जाने की उम्मीद है, इससे उभरते बाजारों से पूंजी बाहर निकलेगी और वित्तीय स्थिति कडी होगी.रिपोर्ट के अनुसार, इस स्थिति में 350 अरब डालर से अधिक का विदेशी मुद्रा भंडार जो कि नौ महीने के आयात मूल्य के बराबर होगा एक प्रतिरोधक का काम करेगा और इससे सामान्य आयात तथा ब्याज समेत कर्ज लौटाने की जरुरत को आसानी से पूरा किया जा सकेगा.
वित्त वर्ष 2015-16 तक वैश्विक मानकों का व्यापक दिवालिया संहिता पेश करने का प्रस्ताव तथा निवेश के लिये पहले से मौजूदा नियामकीय प्रणाली द्वारा मौजूदा बहु-पूर्व मंजूरी प्रक्रिया को बदलने से देश में कारोबारी माहौल में सुधार की उम्मीद है. रिपोर्ट में कहा गया है कि विनिर्माण क्षेत्र को नई उर्जा देने के रास्ते में कारोबार करने में मुश्किलें अब बाधा बन गयी है, जिसका व्यापक रुप से हवाला दिया जाता है.
जिन अन्य क्षेत्रों में उल्लेखनीय बदलाव की जरुरत है, उसमें कानूनी तथा नियामकीय माहौल, श्रम बाजार सुधार, कर व्यवस्था तथा प्रशासनिक माहौल शामिल है.रिपोर्ट में वितरण नेटवर्क में खामी तथा बिजली वितरण कंपनियों की बिगडती वित्तीय स्थिति का भी जिक्र किया गया है जिसका तेजी से समाधान किये जाने की जरुरत है.
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