MAKE IN INDIA में बाधक साबित ना हो जाये मोदी का कोला-फ्रूट फार्मूला

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II अमलेश नंदन II नरेंद्र मोदी ने बुधवार को जिस प्रकार कोला कंपनियों से अपने उत्‍पादों में 5 प्रतिशत फलों का रस मिलाने की संभावनाएं तलाशने की बातें कहीं उससे इस क्षेत्र में काम करने वाली ज्‍यादातर कंपनियां सकते में हैं. कई कंपनियों ने तो इसे असंभव बताया है जबकि कुछ का कहना है कि […]

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II अमलेश नंदन II

नरेंद्र मोदी ने बुधवार को जिस प्रकार कोला कंपनियों से अपने उत्‍पादों में 5 प्रतिशत फलों का रस मिलाने की संभावनाएं तलाशने की बातें कहीं उससे इस क्षेत्र में काम करने वाली ज्‍यादातर कंपनियां सकते में हैं. कई कंपनियों ने तो इसे असंभव बताया है जबकि कुछ का कहना है कि यह ‘इसरो’ के ‘मंगल मिशन’ से भी बड़ी चुनौती है.

गौरतलब है कि मोदी सरकार बनने के बाद से ही भारतीय बाजारों में निवेश को लेकर विदेशी कंपनियों ने काफी सकारात्‍मक रुख दिखाया है. मोदी सरकार ने अपने शुरुआती दिनों से ही जिस प्रकार एफडीआइ (फॉरेन डायरेक्‍ट इंवेस्‍ट) को समर्थन करना शुरू किया है. इस दौरान जापान और चीन जैसे देशों ने भारत में निवेश की बड़ी घोषणाएं की हैं. अमेरिका यात्रा के दौरान भारत अमेरिका के सामने भी एफडीआइ की बात रख सकता है. यह प्रधानमंत्री के स्‍तर से होगा. जबकि विदेश मंत्री सुषमा स्‍वराज ने सार्क सम्‍मेलन के दौरान भारतीय बाजारों में अमेरिकन कंपनियों से निवेश की मांग की है. इस बीच कल मोदी के द्वारा बहुराष्‍ट्रीय कोला कंपनियों से अपने उत्‍पादों में फलों का जूस मिलाने की अपील ने उन्‍हें चौका दिया है. हालांकि मोदी ने इस बात को काफी प्रभावी ढंग से कहा है लेकिन कंपनियों के वरिष्‍ठ अधिकारी और कई विशेषज्ञों की राय में यह असंभव कार्य है.

क्‍या है मोदी का मेक इन इंडिया

मेक इन इंडिया कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री ने घरेलू और अंतरराष्ट्रीय कंपनियों का निवेश के लिए आह्वान करते हुए कहा कि उनकी सरकार न सिर्फ ‘पूर्व की ओर देखो’ की नीति बल्कि ‘पश्चिम को जोडो’ की नीति भी अपना रही है. मोदी ने कहा हम राजमार्ग चाहते हैं. हम डिजिटल इंडिया के लिए सूचना मार्ग भी चाहते हैं. मेक इन इंडिया नारा नहीं है, आमंत्रण नहीं है. कंपनियां देश से बाहर जाने पर विचार कर रही थीं. राजग की तीन महीने की सरकार ने देश में कारोबार की प्रक्रिया आसान बनाने पर ध्यान देकर इस रूझान को बदला है. मेक इन इंडिया के तहत मोदी ने एफडीआइ को ‘फर्स्‍ट डेवलप इंडिया’ के नाम से पुकारा. इस बीच मोदी के कल के के बयान को काफी गंभीरता से लिया जा रहा है, लेकिन कंपनियों ने भी मजबूरी दिखानी शुरू कर दी है.

24 घंटों में ही दो अलग-अलग बयान

नरेंद्र मोदी ने कल ही बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों से भारतीय किसानों के लिए नया बाजार बनाने की संभावनाएं तलाशने की बातें कही हैं, वहीं आज भारत ने मेक इन इंडिया कार्यक्रम में कंपनियों से भारतीय बाजारों में जमकर पूंजी लगाने की मांग की है. हालांकि सरकार संभालने के बाद से ही मोदी ने विभिन्‍न मुद्दों पर कठोर और अडिग रवैया अपनाया है और भारतीय मध्‍यम और छोटे किसानों सहित गरीबों के प्रति भी अपनी प्रतिबद्धता दुहरायी है. अब मोदी के दोनों कथनों से कई बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों के सामने बड़ी चुनौति खड़ी है. उसी प्रकार मोदी के सामने भी विकल्‍प को तलाशने की चुनौति है.

जो कहते हैं वह करते हैं पीएम मोदी

नरेंद्र मोदी एक मुख्‍यमंत्री के रूप में अपने फैसलों पर अडिग रहने के लिए जाने जाते हैं. यही उदाहरण उन्‍होंने प्रधानमंत्री के रूप में WTO समझौते के समय भी दिखाया था. उससे यह तो साफ जाहिर है कि मोदी भारतीय किसानों की अनदेखी कर कोई भी बड़ा फैसला नहीं लेना चाहते हैं. इससे अलावे मोदी ने कई स्‍थानों पर अपने संबोधन में किसानों के हितों की रक्षा की बात कही और किसानों को उचित हक दिलाने की वकालत की है. उन्‍होंने किसानों के लिए उनके उत्‍पाद संरक्षण से लेकर उनके उत्‍पादों के लिए नये बाजारों को तलाशने पर भी जोर दिया है. अब कोला में फ्रूट जूस मिलाने की बात पर मोदी कितना अडिग रह पाते हैं यह समय बतायेगा. हालांकि विश्‍लेषकों का कहना है कि मोदी अपने फैसले के प्रति काफी गंभीर और अडिग रहते हैं.

कोला के प्रति उपभोक्‍ताओं का रूझान ज्‍यादा

भारतीय उपभोक्‍ताओं का रूझान कोला कंपनी को लेकर पिछले कुछ दशकों में काफी बढ़ा है. हालांकि भारतीय उपभोक्‍ताओं की स्‍वदेशी उत्‍पादों को बाजार दिलाने की गरज से सरकार ने कई स्‍वदेशी कंपनियों को प्रोत्‍साहित करने का काम किया है. उदाहरण के तौर पर अमूल के माध्‍यम से सरकार डेयरी उत्‍पादों को एक वृहत बाजार मुहैया कराने की मुहिम लड़ रही है. लेकिन उसमें भी उतनी सफलता हाथ नहीं आयी. इसी प्रकार कई कंपनियों द्वारा भारतीय बाजारों में कोला के दामों में फ्रूट जूस को लाया है. इसके बावजूद भी उपभोक्‍ता में कोला के प्रति झुके हुए हैं. एक प्रकार से कहा जा सकता है कि भारतीय उपभोक्‍ताओं के लिए कोला एक महत्‍वपूर्ण चीज बन गयी है. ऐसे में मोदी द्वारा भारतीय फलों के लिए नया बाजार बनाने की बजाये कोला कंपनियों में ही फलों के बाजार की संभावनाएं तलाशना यहां के उपभोक्‍ताओं की वजह से लाचारी भी प्रदर्शित करता है.

कैसे सफल होगा ‘मेक इन इंडिया’?

इन दोनों विषयों को मिलाकर देखा जाये तो दोनों में विरोधाभास नजर आ रहा है. एक ओर मोदी का बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों से कोला में फलों का जूस मिलाने का आग्रह तो दूसरी ओर ‘मेक इन इंडिया’ के तहत घरेलू बाजारों में ज्‍यादा से ज्‍यादा एफडीआइ दोनों ही अपने जगह पर अलग-अलग मुद्दे हैं. लेकिन जैसा कि पूर्व से देखा गया है मोदी अपने फैसले पर कठोर रूख रखते हैं. अगर कोला वाले मामले में मोदी कोई कड़ा रूख अपनाते हैं और कंपनियों पर दबाव बनाने का काम करते हैं तो इससे विदेशी कंपनियों में एक भय व्‍याप्‍त हो सकता है, जो भारतीय बाजारों में एफडीआइ को प्रभावित कर सकता है. अगर बाजार में उनुमान के हिसाब से एफडीआइ नहीं आता है तो इससे आने वाली योजनाओं पर प्रतिकूल प्रभाव तो पड़ेगा ही अर्थव्‍यवस्‍था भी प्रभावित होगी.

फलों के लिए कोला के अलावे क्‍या हो सकता है विकल्‍प

फलों के लिए नये बाजारों की आवश्‍यकता पर बल देना प्रधानमंत्री का किसानों के प्रति हितकर सोंच को परिलक्षित करता है. लेकिन सवाल यह है कि क्‍या कोला कंपनियों के अलावे भारतीय फल उत्‍पादक किसानों के लिए नये बाजार को कोई और विकल्‍प नहीं हो सकता. जिस प्रकार मोदी जनता से सीधे संवाद करते हैं और उनके कथनों का असर भी होता है. उसी प्रकार युवाओं की सोंच को बदलने के लिए वे युवाओं से सीधा संवाद करेंगे? विशेषज्ञों के अनुसार कोला में फलों का रस मिलाना असंभव है. तो क्‍या युवाओं की पसंद को ध्‍यान में रखते हुए फलों के रस को नये अंदाज में पेश किया जा सकता?

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