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कच्चे तेल के दाम बढ़ने से 2018 में भी परेशान कर सकती है महंगाई

Updated at : 25 Dec 2017 9:32 PM (IST)
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कच्चे तेल के दाम बढ़ने से 2018 में भी परेशान कर सकती है महंगाई

नयी दिल्ली : वैश्विक बाजार में कच्चे तेल के दाम बढ़ने से खुदरा मुद्रास्फीति पर असर पड़ सकता है. महंगाई दर जून में न्यूनतम 1.46 फीसदी पर पहुंचने के बाद अब बढ़ रही है और इसको देखते हुए रिजर्व बैंक नीतिगत दर को 2018 में कम-से-कम कुछ समय के लिए यथावत रुख सकता है. इसे […]

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नयी दिल्ली : वैश्विक बाजार में कच्चे तेल के दाम बढ़ने से खुदरा मुद्रास्फीति पर असर पड़ सकता है. महंगाई दर जून में न्यूनतम 1.46 फीसदी पर पहुंचने के बाद अब बढ़ रही है और इसको देखते हुए रिजर्व बैंक नीतिगत दर को 2018 में कम-से-कम कुछ समय के लिए यथावत रुख सकता है.

इसे भी पढ़ें : सब्जियों की आसमान छूती कीमतों ने महंगार्इ में लगाया तड़का, थोक मुद्रास्फीति में 0.99 फीसदी इजाफा

वैश्विक तेल कीमत के अलावा आवास भत्ता समेत सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों के पूरी तरह अमल में आने से भी कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है. उद्योग विशेषज्ञों और अर्थशास्त्रियों का मानना है कि खुदरा मुद्रास्फीति अगले साल औसतन 4 से 4.5 फीसदी रह सकती है. वर्ष 2017 में यह 1.46 से 4.88 फीसदी के बीच रही.

खुदरा मुद्रास्फीति का आम लोगों पर सीधा प्रभाव पड़ता है और रिजर्व बैंक मौद्रिक नीति समीक्षा में इसे मुख्य आधार बनाता है. उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित खुदरा मुद्रास्फीति जून में न्यूनतम 1.46 फीसदी पर पहुंच गयी, जो नवंबर में आठ महीने के उच्च स्तर 4.88 फीसदी पर थी.

वैश्विक तेल कीमतों में मजबूती तथा खरीफ फसल उत्पादन की अनिश्चितता को देखते हुए रिजर्व बैंक ने भी मार्च 2018 तक मुद्रास्फीति के अनुमान को बढ़ाकर 4.2 से 4.6 फीसदी कर दिया है. केंद्रीय बैंक ने दो फीसदी घट-बढ़ के साथ खुदरा मुद्रास्फीति 4 फीसदी रहने का लक्ष्य रखा है. थोक मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई दर को देखा जाये, तो यह वर्ष 2017 में 0.90 से 6.55 फीसदी के दायरे में रही.

थोक महंगाई दर पहले तीन महीने में 5.25 से 6.55 फीसदी के बीच रही और साल के मध्य में 0.90 से 1.88 फीसदी पर आ गयी. वहीं, अक्टूबर में यह 3.93 फीसदी रही. महंगाई दर की इस प्रवृत्ति से सरकार को इस साल थोडी राहत मिली. हालांकि, अगले साल इसमें वृद्धि हो सकती है, क्योंकि कच्चे तेल की खरीद से आयात बिल में वृद्धि की आशंका है.

एसबीआई रिसर्च के मुख्य अर्थशास्त्री सौम्य कांति घोष ने कहा कि मुद्रास्फीति अब इस स्तर से ऊपर बढ़ रही है, लेकिन 5 फीसदी के दायरे में रहेगी. उन्होंने कहा कि मुद्रास्फीति आंकड़ा अगले एक-दो महीनों में 4 से 4.5 फीसदी रह सकता है. हालांकि, चालू वित्त वर्ष में यह 3.5 से 3.7 फीसदी रही, लेकिन अगले साल महंगाई 4.5 फीसदी तक जा सकती है.

घोष ने कहा कि यह कोई बडा मुद्दा नहीं है. यह अगर 5 फीसदी भी होता है, तो यह रिजर्व बैंक के मुद्रास्फीति लक्ष्य 4 से 6 फीसदी के दायरे में होगा. कच्चे तेल का दाम 65 डालर प्रति बैरल है और महंगाई में वृद्धि का यह एक प्रमुख कारण हो सकता है.

इंडिया रेटिंग्स के प्रधान अर्थशास्त्री सुनील सिन्हा ने कहा कि तुलनात्मक आधार कमजोर होने से अगले साल महंगाई दर में तेजी से वृद्धि हो सकती है. उन्होंने कहा कि साथ ही पिछले साल के विपरीत इस साल सब्जी जैसे खाद्य वस्तुओं के दाम कम नहीं रहे. अगर यह स्थिति बनी रही और खाने-पीने के सामान के दाम बढ़ते रहे, तो महंगाई दर बढ़ेगी.

इसके अलावा, कच्चे तेल की कीमतों से भी कीमतों पर दबाव रह सकता है. इसे देखते हुए विशेषज्ञ यह मान रहे हैं कि रिजर्व बैंक अगले साल कम-से-कम कुछ समय के लिए नीतिगत दर को यथावत रख सकता है.

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