आज का दर्शन : गंगा-जमुनी तहजीब की पहचान बनी मंदिर-मजार की एकता

Nawada : पटना-रांची मुख्य मार्ग पर स्थित नवादा में सांप्रदायिक सौहार्द की अनूठी मिसाल देखने को मिलती है.
Nawada : नवादा से मनोज मिश्रा की रिपोर्ट. पटना-रांची मुख्य मार्ग पर स्थित नवादा में सांप्रदायिक सौहार्द की अनूठी मिसाल देखने को मिलती है. यहां संकटमोचन मंदिर और हजरत सैयद शाह जलालुद्दीन बुखारी की मजार एक-दूसरे से सटी हुई हैं. गंगा-जमुनी परंपरा के प्रतीक इन दोनों धार्मिक स्थलों के प्रति लोगों की आस्था लगातार बढ़ती जा रही है.
आस्था का केंद्र: संकटमोचन मंदिर
संकटमोचन मंदिर दशकों से लाखों लोगों की आस्था का केंद्र बना हुआ है. जिले के अलावा आसपास के क्षेत्रों से भी श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं. कोई शुभ कार्य हो, नई गाड़ी खरीदनी हो या चुनाव में नामांकन हो, लोग मंदिर में माथा टेकना नहीं भूलते. मंगलवार और शनिवार के अलावा रामनवमी पर यहां भक्तों का सैलाब उमड़ता है. महंत बाबा नकुल देव उदासीन तथा पुजारी नारायण देव उदासीन के अनुसार, हनुमान जी की प्रतिमा करीब 42 साल पहले स्थापित की गई थी. तब यह स्थान सुनसान और खाईनुमा था. लंबे समय तक प्रतिमा खुले में विराजमान रही. वर्तमान में हर सप्ताह यहां 10 हजार से अधिक लोग दर्शन करने आते हैं. मंदिर परिसर में ही लक्ष्मी-नारायण मंदिर भी स्थित है.
लोक आस्था और मजार की ख्यातिसंकटमोचन मंदिर से सटी हजरत सैयद शाह जलालुद्दीन बुखारी की मजार की ख्याति दूर-दूर तक है. जुमेरात और जुम्मा के दिन यहां मुस्लिमों के साथ-साथ हिंदू धर्मावलंबी भी मन्नतें लेकर पहुंचते हैं और चादर चढ़ाते हैं. अजमेर शरीफ के उर्स के तुरंत बाद बाबा के मजार पर विशाल उर्स का आयोजन होता है. जिले की अन्य मजारों पर उर्स का सिलसिला इसी आयोजन के बाद शुरू होता है. यह दोनों धार्मिक स्थल न सिर्फ एकता की मिसाल हैं, बल्कि नवादा को एक विशिष्ट पहचान भी देते हैं. यहां की प्रेरणा से नवादा के लोग हमेशा मिलजुल कर रहते हैं. यह स्थान साबित करता है कि आस्था के रास्ते अलग हो सकते हैं, लेकिन गंतव्य मानवता और शांति ही है.
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