बिकने, गुलाम होने और लुटने के दस्तावेज

-हरिवंश- नंदन नीलकेणि की पुस्तक ‘इमेजिनिंग इंडिया’ (आइडियाज फॉर द न्यू सेंचुरी) के बाद निक राबिंस की पुस्तक ‘ द कारपोरेशन दैट चेंज्ड द वर्ल्ड’ (हाउ द इस्ट इंडिया कंपनी शेप्ड द माडर्न मल्टीनेशनल) का अध्ययन. दोनों दो ध्रुव. एक आनेवाली शताब्दी में भारत के उदय की संभावना तलाशती है. दूसरी, बीती शताब्दियों में भारत […]
-हरिवंश-
वह षड्यंत्र और ट्रेजडी से जुड़े दबे-ढंके-छुपाये इतिहास को अत्यंत रोचक ढंग से कहते हैं. इसमें युद्ध, अकाल, स्टाक मार्केट के बिखराव, कंपनी के टॉप आफिशियल्स के बीच तनातनी-गुपचुप एक-दूसरे की जड़ उखाड़ने की मुहिम के वृतांत हैं. एक तरफ यह किताब इस ग्लोबल दुनिया में बड़ी होती कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण सबक है. दूसरी ओर दुनिया को सावधान भी करती है कि भीमकाय कंपनियां या मल्टीनेशनल-ट्रांसनेशनल कंपनियां सीमा में नहीं रहीं, तो वे समाज, देश और दुनिया के लिए खतरनाक हो सकती हैं? भारत के संदर्भ में इस पुस्तक का खास महत्व है. यह भारत की गुलामी की दास्तान भी है. हमारी कमजोरियों का आईना, पर भविष्य के प्रति सजग-सावधान रहने का पाठ पढ़ाती या सबक देती किताब.
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पलासी की पराजय की जड़ें सामाजिक इतिहास में हैं. ‘बाबरनामा’ में हैं. बाबर ने कहा है, हम मुट्ठी भर सिपाही फतह करते हैं, लाखों भारतीय मूकदर्शक बन कर देखते हैं. यही हाल बक्सर की लड़ाई में हुआ. ऐसी ही स्थिति में नालंदा को खिलजी ने जलाया. जलानेवालों की फौज 250 के आसपास. पर नालंदा विश्वविद्यालय के भिक्षुओं की संख्या 10,000 से ऊपर. पलासी की पराजय ने भारत को गुलामी की सुरंग में धकेला. वहां बंगाल के नवाब के पास 50,000 की फौज थी. अंगरेजों के पास 3000. खुद अंगरेज महज 1000 के आसपास. पर भारत हारा, गुलाम बना.
यही 1764 में बक्सर की लड़ाई में दोहराया गया. कोलकाता में जब अंगरेजों का राज हुआ, तब बमुश्किल 300 गोरे थे. पूरे कोलकाता में 1.25 लाख से ऊपर थे, भारतीय. पर 1.25 लाख हारे, 300 अंगरेजों से. यह पस्ती, कायरता और देश था, हमारा. उधर जयचंद से शुरू परंपरा भी थी. मीरजाफरों, अमीरचंदों और जगत सेठों की संस्कृति. ‘देश बेचो, घर भरो’ दर्शन में यकीन करनेवाली. यह परंपरा अब भी है. भारतीय राजनीति में दिल्ली से गांवों तक जो दलाल, आज अहम भूमिका में हैं, वे इसी ‘देशबेचू संस्कृति’ के उत्तराधिकारी हैं. दुनिया के दूसरे बैंकों (स्विस बैंक समेत) में जिन भारतीयों ने अरबों-अरबों जमा कर रखे हैं, वे क्या हैं?
भारत लूट पर किताबें लिखीं. भारतीय धन ने ब्रिटेन को धनी बनाया. भारतीय लूट से गये धन ने ब्रिटेन का भाग्य पलटा. औद्योगिक क्रांति का ईंधन, भारतीय धन (ड्रेन आफ वेल्थ) ही था. बाद में अंगरेज ब्रुक एडम ने कहा, भारतीय लूट से औद्योगिक क्रांति हुई. यह प्रमाणित करने के लिए निक ने पुस्तक में एक चार्ट दिया है. 1600 से 1780 ई. के बीच दुनिया समेत प्रमुख देशों का जीडीपी (कुल घरेलू उत्पाद).
1796 से 1799 के बीच ईस्ट इंडिया कंपनी के लोगों ने लंदन में एक भव्य भवन बनाया. भारत फतह के बाद. वहां एक पेंटिंग लगायी गयी. ब्रिटेन के बादशाह जार्ज (तृतीय) भी दिखाये गये. ब्रितानिया हुकूमत शेर पर सवार थी, यूरोप घोड़े पर सवार था, एशिया काफी पीछे ऊंट पर रेंग रहा था. यह पेंटिंग, इसके भाव, दृश्य बहुत कुछ कहते-बताते हैं.
भारत की इस लूट पर गालिब की एक पंक्ति का भी उल्लेख है, ‘जख्म गर दब गया, लहू ना थमा’ जख्म तो दबा, पर लहू रिसता रहा. निक ने यह किताब लिखी कि पलासी (1757) के 250 वर्ष हो रहे हैं, इतिहास के इस घाव पर चर्चा हो. शायद उनका मानस यह रहा कि इतिहास फिर न दोहराया जाये, इसलिए इस पर बात हो. 2007 में पलासी पराजय के 250 वर्ष हो गये, पर इसे देश में अपनी पराजय, दुर्गति और गुलामी के अध्याय पर चर्चा नहीं हुई. लगता है, हम न सीखनेवाले देशों में से हैं. लेकिन इस पुस्तक में एडमंड बर्क, रिचर्ड क्लार्क से लेकर इस पुस्तक के लेखक निक राबिंस की भी एक परंपरा है, जो सच के साथ खड़ी रहती है. बिना किसी प्रत्याशा के.
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By Prabhat Khabar Digital Desk
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