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लापरवाही. एक वर्ष से अधिक लग रहे मामले को दर्ज करने में

Updated at : 26 Feb 2016 4:10 AM (IST)
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लापरवाही. एक वर्ष से अधिक लग रहे मामले को दर्ज करने में

परिवाद पत्र दायर मामले में पुलिस-प्रशासन निष्क्रिय शायद यह विश्वास नहीं होता है कि परिवाद पत्र के थाने में दर्ज करने के मामले में एसपी कार्यालय से स्थानीय थाने तक पहुंचने में परिवाद पत्रों को एक वर्ष से भी अधिक समय लग रहे हैं, लेकिन यही सच्चायी है. कई मामलों में दो से तीन वर्ष […]

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परिवाद पत्र दायर मामले में पुलिस-प्रशासन निष्क्रिय

शायद यह विश्वास नहीं होता है कि परिवाद पत्र के थाने में दर्ज करने के मामले में एसपी कार्यालय से स्थानीय थाने तक पहुंचने में परिवाद पत्रों को एक वर्ष से भी अधिक समय लग रहे हैं, लेकिन यही सच्चायी है. कई मामलों में दो से तीन वर्ष भी लग जाते हैं. इसे पुलिस प्रशासन की निष्क्रियता कहें या फिर कुछ और. कई ऐसे मामले हैं, जो चंद दिनों में दर्ज हो जाते हैं और दर्जनों ऐसे मामले हैं, जो आज भी एसपी कार्यालय में परिवाद पत्र धूल फांक रहे हैं.
कटिहार : सामान्तया न्यायालय में परिवाद पत्र दायर करने के बाद सीजेएम मामले की गंभीरता को देखते हुए उसे संबंधित थाने में दर्ज करने का आदेश देते हैं और एक निर्धारित अवधि में अंतिम प्रपत्र दाखिल करने का आदेश देते हैं. लेकिन न्यायिक आदेश के बावजूद एसपी कार्यालय से लेकर जिले के विभिन्न थानों तक पहुंचने में इसे वर्षों लग जाते हैं. यह कहना गलत नहीं होगा कि पुलिस ऐसे परिवाद पत्रों को संबंधित थाने में भेजने के मामले में पेपर वेट का इंतजार करते हैं.
किस प्रकार भेजा जाता है परिवाद पत्रों को थाने में
जब कोई मामला थाने में सूचक द्वारा पुलिस पदाधिकारी के समक्ष लाया जाता है तो उसके द्वारा टाल-मटोल या इंकार किये जाने पर सूचक उसे न्यायालय में परिवाद पत्र के रूप में मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी के समक्ष दायर करता है. मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी द्वारा ऐसे मामलों की गंभीरता को देखते हुए 156 (3) दप्रस के तहत संबंधित थाने में दर्ज करने का आदेश दिया जाता है. मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी ऐसे मामलों को दर्ज कर एक निर्धारित अवधि में अंतिम प्रपत्र दाखिल करने का भी आदेश जारी करते हैं.
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