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उम्मीद जगाता फैसला

Updated at : 07 Jun 2017 6:40 AM (IST)
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उम्मीद जगाता फैसला

कानून के हिसाब से कोई बात तात्कालिक तौर पर भले संगत जान पड़े, पर दूरगामी तौर पर देश के व्यापक हित में वह बाधक भी हो सकती है. ऐसी स्थिति में इंसाफ की कसौटी क्या हो? इस सवाल का उत्तर बहुत कठिन है और ऐसे मामले में सबसे पहले देश के सर्वोच्च अदालत की सुनी […]

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कानून के हिसाब से कोई बात तात्कालिक तौर पर भले संगत जान पड़े, पर दूरगामी तौर पर देश के व्यापक हित में वह बाधक भी हो सकती है. ऐसी स्थिति में इंसाफ की कसौटी क्या हो? इस सवाल का उत्तर बहुत कठिन है और ऐसे मामले में सबसे पहले देश के सर्वोच्च अदालत की सुनी जानी चाहिए, क्योंकि किसी कानून की मंशा और उसके सही मर्म के उद्घाटन का अंतिम अधिकार उसे ही है.

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा है कि न्यायपालिका को अपना निर्णय देते वक्त देश के व्यापक आर्थिक हित और रोजगार के अवसरों पर पड़नेवाले असर का ध्यान रखना चाहिए. अदालत ने यह बात कर्नाटक के दो चीनी मिलों के आपसी विवाद से जुड़े एक मामले में कही है. एक चीनी मिल की शिकायत थी कि प्रतिस्पर्धी चीनी मिल पर्याप्त दूरी पर नहीं बना, जबकि नियम के मुताबिक दो चीनी मिलों के बीच कम से कम 15 किलोमीटर की दूरी होनी चाहिए.

कर्नाटक उच्च न्यायालय ने फरियादी चीनी मिल के पक्ष में फैसला सुनाया था, पर सर्वोच्च न्यायालय ने इस फैसले को पलट दिया और कहा कि जिस चीनी मिल पर नियम के उल्लंघन का दोष जड़ा जा रहा है, उसे खड़ा करने में तीन अरब रुपये खर्च हुए हैं, 377 लोगों को इस मिल से प्रत्यक्ष और 7000 लोगों को अप्रत्यक्ष रोजगार हासिल है, सो लोकहित को ध्यान में रखते हुए इस फैक्ट्री को चालू रखा जाना चाहिए. फिलहाल देश की अदालतों में तकरीबन ढाई करोड़ मामले फैसले की बाट जोह रहे हैं और इनमें बहुत से मामले अरबों रुपये की व्यावसायिक परियोजनाओं से संबंधित हैं.

इस फैसले से उम्मीद बंधती है कि व्यावसायिक परियोजनाओं से संबंधित मामलों का जल्दी निबटारा हो सकेगा. इसमें साफ कहा गया है कि फैसला सुनाते वक्त रोजगार, बुनियादी ढांचे और अर्थव्यवस्था के विकास तथा सरकारी राजस्व की प्राप्ति का ध्यान रखा जाना चाहिए. क्षण भर को लग सकता है कि कोर्ट के आदेश में आर्थिक हितों को प्रधान मान कर फैसला सुनाने की बात कही गयी है और इससे व्यक्ति या समुदाय के नाते प्राप्त जीवन जीने के सहज अधिकारों की अवहेलना भी हो सकती है.

जल-जंगल और जमीन के व्यापक व्यावसायिक उपयोग पर टिकी परियोजनाओं के बारे में यह आशंका ज्यादा हो सकती है. लेकिन कोर्ट का कहना है कि ऐसे मामलों में फैसला सुनाते वक्त कोर्ट को संतुलित नजरिया अपनाना चाहिए. उम्मीद की जानी चाहिए कि देशभर की अदालतें सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय को समुचित तरीके से आत्मसात कर संबंधित मामलों का निपटारा करेंगी.

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