"यह वो बांग्लादेश नहीं, जिसके लिए 30 लाख लोगों ने दी शहादत', वर्चुअल संबोधन में छलका शेख हसीना का दर्द
बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना (फोटो : X)
बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना बीते दो साल से दिल्ली में हैं. बांग्लादेश में हुई तख्ता पलट की घटना के बाद उन्हें अपना देश छोड़कर आना पड़ा था. बुधवार को उन्होंने दिल्ली से वर्चुअल माध्यम से मीडिया को संबोधित किया. इस दौरान उन्होंने कहा कि उन्हें देश छोड़ने पर मजबूर किया गया, लेकिन वह कभी अपने लोगों से दूर नहीं हुईं. अपने परिवार और 1975 की त्रासदी को याद करते हुए भावुक हो गई.
Sheikh Haseena : बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने करीब दो साल बाद सार्वजनिक रूप से मीडिया से बातचीत की. उन्होंने दिल्ली से फॉरेन कॉरेस्पॉन्डेंट्स क्लब ऑफ साउथ एशिया (FCC South Asia) के कार्यक्रम में वर्चुअल माध्यम से मीडिया से बातचीत की. इस दौरान उनका कैमरा बंद रहा. अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि उन्हें अपने देश से दूर जाने के लिए मजबूर किया गया, लेकिन वह कभी भी बांग्लादेश के लोगों से अलग नहीं हुईं.
शेख हसीना ने कहा, "मैं सिर्फ पांच बार बांग्लादेश की प्रधानमंत्री रहने वाली नेता के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्रपिता बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान की बेटी के रूप में भी आपसे बात कर रही हूं. मैंने अपना पूरा जीवन बांग्लादेश के लोगों के बीच बिताया है. मुझे देश छोड़ने पर मजबूर किया गया, लेकिन मैं कभी अपने लोगों से अलग नहीं हुई."
परिवार को याद कर हुईं भावुक
अपने संबोधन की शुरुआत में शेख हसीना ने राष्ट्रपिता बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान, स्वतंत्रता संग्राम के शहीदों और 15 अगस्त 1975 को मारे गए अपने परिवार के सदस्यों को याद किया. इस दौरान वह भावुक हो गईं.
उन्होंने कहा, "मुझे गहरे दुख के साथ अपने परिवार के उन सदस्यों की याद आती है, जिन्हें मैंने 15 अगस्त 1975 को खो दिया था. आज मेरे भाई का जन्मदिन भी है. वह मुझसे दो साल छोटा था और एक महान स्वतंत्रता सेनानी व युवा नेता था."
'संकट के समय सच सामने लाना पत्रकारों की जिम्मेदारी'
शेख हसीना ने अपने संबोधन में पत्रकारों की भूमिका का भी जिक्र किया. उन्होंने कहा कि पत्रकारिता का सबसे बड़ा दायित्व सच की तलाश करना है, खासकर तब जब सत्ता सच्चाई को छिपाने की कोशिश करे. उन्होंने उन पत्रकारों का भी धन्यवाद किया जो बांग्लादेश के घटनाक्रम पर गंभीरता और साहस के साथ नजर बनाए हुए हैं.
'शुरुआत से ही शांतिपूर्ण नहीं था आंदोलन'
दिल्ली में मीडिया से वर्चुअल बातचीत के दौरान बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने कहा, "पिछले दो वर्षों से मैं अपने प्रिय बांग्लादेश को पीड़ित होते देख रही हूं. यह वह बांग्लादेश नहीं है जिसे हमने बनाया था और न ही वह बांग्लादेश है जिसके लिए 1971 में 30 लाख लोगों ने अपनी जान कुर्बान की थी. जुलाई और अगस्त 2024 की सच्चाई यह है कि यह कोई शांतिपूर्ण छात्र आंदोलन नहीं था. शुरुआत से ही मेरी सरकार ने बातचीत, कानूनी प्रक्रिया और धैर्य के जरिए इस मुद्दे का समाधान निकालने की कोशिश की. लेकिन सुधार की मांग की आड़ में संगठित समूह छात्रों की मांग को हिंसक राजनीतिक हथियार में बदलने की कोशिश कर रहे थे."
बांग्लादेश छोड़कर भारत क्यों आई थीं शेख हसीना?
5 अगस्त 2024 को बांग्लादेश में सरकारी नौकरियों में आरक्षण (कोटा प्रणाली) के खिलाफ शुरू हुआ छात्र आंदोलन धीरे-धीरे हिंसक राष्ट्रव्यापी विरोध में बदल गया. हालात इतने बिगड़ गए कि प्रदर्शनकारियों ने प्रधानमंत्री आवास की ओर मार्च शुरू कर दिया. राजनीतिक और सुरक्षा संकट के बीच शेख हसीना ने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दिया और सुरक्षा कारणों से बांग्लादेश छोड़ना पड़ा.
इसके बाद वह भारत पहुंचीं, जहां उन्हें मानवीय आधार पर अस्थायी शरण दी गई. तब से वह नई दिल्ली में रह रही हैं. यह उनके जीवन का दूसरा ऐसा अवसर है जब उन्हें अपने देश से बाहर शरण लेनी पड़ी. इससे पहले 1975 में उनके पिता और बांग्लादेश के राष्ट्रपिता शेख मुजीबुर रहमान की हत्या के बाद भी उन्होंने भारत में शरण ली थी.
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By आलोक पाठक
आलोक पाठक वर्ष 2019 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अपने पत्रकारिता सफर के दौरान वे खबर मंत्र, गांडीव और नक्षत्र न्यूज़ जैसे संस्थानों के साथ जुड़े रहे हैं। वर्तमान में वे प्रभात खबर के डिजिटल विभाग में कंटेंट राइटर के रूप में कार्यरत हैं। हिंदी भाषा और लेखन के प्रति उनका विशेष लगाव है। उन्हें भू-राजनीति (Geopolitics) और राष्ट्रीय राजनीति से जुड़े विषयों पर लिखना पसंद है। निजी जीवन में कहानियां और कविताएं लिखना तथा कालजयी साहित्य का अध्ययन उनकी प्रमुख रुचियों में शामिल है। उनका प्रयास तथ्यों पर आधारित, सरल और प्रभावी लेखन के माध्यम से पाठकों तक सार्थक जानकारी पहुंचाना है।
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