गाय से EV और जलविद्युत तक: भारत-भूटान के रिश्ते में क्यों आया नया मोड़? डॉ. महीप से समझें
हिमालय में भारत-भूटान की नई कहानी: जलविद्युत से डिजिटल UPI तक (Image:AIR)
17 सितंबर 2026 को भूटान में भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर की यात्रा के दौरान 43 जर्सी गायों से लेकर 54 मेड-इन-इंडिया इलेक्ट्रिक वाहनों, अस्पताल, पुल और लुनाना जलविद्युत परियोजना तक कई पहल सामने आईं. ये घटनाएं बताती हैं कि भारत-भूटान संबंध अब केवल जलविद्युत और सुरक्षा का रिश्ता नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, कृषि, डिजिटल भुगतान, व्यापार और कनेक्टिविटी तक फैली साझेदारी बन चुका है.
17 सितंबर को भूटान के प्रधानमंत्री त्शेरिंग तोबगे से मुलाकात के दौरान विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने 54 मेड-इन-इंडिया इलेक्ट्रिक वाहन सौंपे. इससे एक दिन पहले बुमथांग के नेशनल कैटल ब्रीडिंग सेंटर में 43 प्योरलाइन जर्सी गायें दी गईं. इसी यात्रा में मोंगार में 65 बिस्तरों वाले ग्येल्सुएन जेटसुन पेमा मदर एंड चाइल्ड हॉस्पिटल का उद्घाटन हुआ, समद्रुप जोंगखार में जगन्नाथन पुल का लोकार्पण हुआ और गासा के लुनाना में 500 किलोवाट की जलविद्युत परियोजना की आधारशिला रखी गई.
दिखने में ये पहल अलग-अलग हैं. एक कृषि से जुड़ी है, दूसरी परिवहन से, तीसरी स्वास्थ्य से और चौथी ऊर्जा से. लेकिन इन्हें एक साथ देखें तो भारत-भूटान संबंधों में हो रहे बदलाव की तस्वीर साफ होती है.
यह रिश्ता अब बड़े रणनीतिक समझौतों के साथ-साथ उन परियोजनाओं में भी दिखाई दे रहा है, जिनका असर सीधे किसान, मरीज, यात्री, विद्यार्थी और बिजली उपभोक्ता पर पड़ता है.
गाय से अस्पताल तक, कूटनीति का बदलता चेहरा
विदेश नीति अक्सर शिखर बैठकों, संधियों और रणनीतिक बयानबाजी के जरिए समझी जाती है. लेकिन पड़ोसी देशों के बीच संबंधों की असली परीक्षा जमीन पर होती है.
बुमथांग में दी गई जर्सी गायों का उद्देश्य भूटान के डेयरी क्षेत्र में प्रजनन क्षमता और दुग्ध उत्पादन को बढ़ाना है. उपलब्ध जानकारी के अनुसार इस कार्यक्रम से करीब 40 हजार किसानों को लाभ पहुंचने की उम्मीद है.
इसी तरह मोंगार का मातृ एवं शिशु अस्पताल स्वास्थ्य सहयोग को स्थानीय स्तर तक ले जाता है. जगन्नाथन पुल पूर्वी भूटान में संपर्क को मजबूत करता है और लुनाना परियोजना देश के दुर्गम हिमालयी क्षेत्रों में ऊर्जा पहुंचाने की कोशिश का हिस्सा है.
इस तरह भारत-भूटान संबंधों को केवल रणनीतिक नक्शे पर देखने के बजाय रोजमर्रा के जीवन की परियोजनाओं के जरिए भी समझा जा सकता है.
यही इस साझेदारी की एक महत्वपूर्ण विशेषता है—बड़े भू-राजनीतिक हितों के साथ छोटे, दिखाई देने वाले विकास कार्यों का जुड़ना.
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जलविद्युत क्यों है भारत-भूटान रिश्ते का केंद्र?
भारत और भूटान के संबंधों में जलविद्युत लंबे समय से केंद्रीय भूमिका निभाती रही है. भूटान की नदियों से पैदा होने वाली बिजली का एक हिस्सा भारत को निर्यात होता है, जिससे भूटान को राजस्व मिलता है और भारत को स्वच्छ ऊर्जा.
पुनात्सांगछू-II इसका नया उदाहरण है. 1,020 मेगावाट की इस परियोजना का उद्घाटन नवंबर 2025 में हुआ और 2025 से ही इससे भारत को बिजली का निर्यात शुरू हो गया था. 2026 में दोनों देशों ने इसकी बिजली के लिए 5.10 रुपये प्रति यूनिट की शुरुआती टैरिफ दर तय की.
इसके साथ 1,200 मेगावाट की पुनात्सांगछू-I परियोजना पर काम भी फिर शुरू हुआ है.
इस मॉडल में दोनों देशों के हित अलग होते हुए भी एक-दूसरे से जुड़े हैं. भूटान के लिए जलविद्युत सरकारी राजस्व और आर्थिक विकास का महत्वपूर्ण स्रोत है. भारत के लिए यह पड़ोसी देश से मिलने वाली स्वच्छ ऊर्जा का स्रोत है.
लेकिन आने वाले वर्षों में जलविद्युत के सामने जलवायु परिवर्तन, हिमनदों के पिघलने, नदी प्रवाह में बदलाव और तलछट जैसी चुनौतियां भी रहेंगी. इसलिए भारत-भूटान ऊर्जा संबंध का अगला चरण केवल नए बांध बनाने तक सीमित नहीं रहेगा. इसमें ग्रिड कनेक्टिविटी, बिजली व्यापार, भंडारण और अन्य स्वच्छ ऊर्जा स्रोत भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं.

व्यापार: रिश्ते की दूसरी बड़ी धुरी
ऊर्जा के बाद व्यापार भारत-भूटान संबंधों का महत्वपूर्ण आधार है.
2016 का भारत-भूटान व्यापार, वाणिज्य और पारगमन समझौता दोनों देशों के बीच मुक्त व्यापार व्यवस्था को आधार देता है. इसके तहत भूटान को भारत के रास्ते तीसरे देशों के साथ व्यापार के लिए शुल्क-मुक्त पारगमन की सुविधा भी मिलती है.
भारत भूटान का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बना हुआ है. उपलब्ध आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 2024 में भूटान के कुल व्यापार में भारत की हिस्सेदारी करीब 80 प्रतिशत थी.
यह आंकड़ा रिश्ते की गहराई के साथ उसकी एक आर्थिक चुनौती को भी दिखाता है. भूटान के लिए भारत एक महत्वपूर्ण बाजार और आपूर्ति स्रोत है, लेकिन तीसरे देशों के साथ व्यापार और नए बाजारों तक पहुंच भी उसके आर्थिक विविधीकरण का हिस्सा है.
इसलिए आने वाले वर्षों में भारत-भूटान व्यापार संबंधों का सवाल केवल व्यापार बढ़ाने का नहीं होगा. सवाल यह भी होगा कि दोनों देश ऐसी व्यवस्था कैसे बनाते हैं जिसमें भारत प्रमुख साझेदार बना रहे और भूटान अपनी आर्थिक विविधता का विस्तार भी कर सके.
1949 से 2007 तक: रिश्ते की भाषा कैसे बदली?
भारत और भूटान के संबंधों की वर्तमान संरचना को समझने के लिए 2007 की मैत्री संधि महत्वपूर्ण है.
1949 की संधि में भूटान की विदेश नीति से जुड़े मामलों में भारत की सलाह लेने का प्रावधान था. 2007 में दोनों देशों ने संधि को अपडेट किया. नए पाठ में संप्रभुता, स्वतंत्रता और क्षेत्रीय अखंडता के सम्मान के साथ करीबी सहयोग और परामर्श पर जोर दिया गया.
यानी संबंधों की भाषा भी समय के साथ बदली.
इसीलिए भारत-भूटान संबंध को केवल 'छोटे-बड़े देश' के समीकरण के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है. वर्तमान ढांचा दोनों देशों की संप्रभुता और सहयोग को साथ रखता है.
भारत के विदेश मंत्रालय के अनुसार 2007 की संधि आज द्विपक्षीय संबंधों का मूल ढांचा है और दोनों देश सुरक्षा तथा सीमा प्रबंधन सहित कई क्षेत्रों में सहयोग करते हैं.
‘संप्रभु अन्योन्याश्रयता’ क्या है?
भारत-भूटान संबंधों को समझने के लिए ‘संप्रभु अन्योन्याश्रयता’ एक उपयोगी अवधारणा हो सकती है.
सरल शब्दों में इसका अर्थ है—दो देश एक-दूसरे पर निर्भर हों, लेकिन इस निर्भरता का अर्थ अपनी निर्णय लेने की क्षमता खो देना न हो.
भारत भूटान को बाजार, निवेश, विकास वित्त, अवसंरचना, शिक्षा, स्वास्थ्य और तकनीकी सहयोग देता है. दूसरी ओर भूटान भारत को जलविद्युत, रणनीतिक हिमालयी भूगोल, पर्यावरणीय संपदा और एक महत्वपूर्ण पड़ोसी के रूप में स्थिर साझेदारी प्रदान करता है.
यह निर्भरता एकतरफा नहीं है, बल्कि अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग प्रकार की है.
यही कारण है कि आज भारत-भूटान साझेदारी को केवल सहायता या लेन-देन की भाषा में समझना अधूरा होगा. इसमें साझा हित, संस्थागत सहयोग और पारस्परिक निर्भरता तीनों मौजूद हैं.
UPI से डिजिटल पड़ोस तक
भारत-भूटान संबंध का एक नया आयाम डिजिटल कनेक्टिविटी है.
भूटान ने भारत के रुपे नेटवर्क को अपनाया और बाद में UPI से जुड़ा. सितंबर 2026 की यात्रा के दौरान UPI के अंतरराष्ट्रीय संस्करण के दूसरे चरण की शुरुआत हुई, जिससे भारत आने वाले भूटानी नागरिकों के लिए दोतरफा डिजिटल भुगतान सुविधा का विस्तार हुआ.
यह बदलाव छोटा दिखाई दे सकता है, लेकिन डिजिटल भुगतान आज आर्थिक संपर्क का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है.
पहले सीमा पार व्यापार के लिए सड़क, पुल और बैंकिंग नेटवर्क जरूरी थे. अब इनके साथ डिजिटल भुगतान की परत भी जुड़ रही है.
यानी भारत-भूटान कनेक्टिविटी का स्वरूप सड़क से डिजिटल नेटवर्क तक फैल रहा है.
गेलेफू: हिमालय से पूर्वोत्तर तक नया गलियारा?
भारत-भूटान संबंधों की अगली बड़ी कहानी गेलेफू हो सकती है.
भूटान के राजा जिग्मे खेसर नामग्येल वांगचुक ने दिसंबर 2023 में गेलेफू माइंडफुलनेस सिटी की घोषणा की थी. करीब 2,500 वर्ग किलोमीटर में प्रस्तावित यह परियोजना भूटान की अर्थव्यवस्था को पर्यटन, स्वास्थ्य, तकनीक, वित्त और हरित विकास जैसे नए क्षेत्रों से जोड़ने की महत्वाकांक्षा रखती है.
इसकी भौगोलिक स्थिति इसे भारत के पूर्वोत्तर के लिए भी महत्वपूर्ण बनाती है.
कोकराझार-गेलेफू और बनरहाट-सामत्से रेल संपर्क की प्रस्तावित योजनाएं पूरी होने पर भूटान और भारत के बीच पहली रेल कड़ियों में बदल सकती हैं. इससे माल, लोगों और संभावित निवेश के आवागमन के नए रास्ते खुल सकते हैं.
इसका महत्व केवल भारत-भूटान द्विपक्षीय संबंध तक सीमित नहीं है. पूर्वोत्तर भारत, बांग्लादेश और दक्षिण-पूर्व एशिया के व्यापक संपर्क ढांचे से भी इसे जोड़ा जा सकता है.
हिमालय केवल सीमा नहीं, साझा पारिस्थितिकी है
भारत-भूटान संबंधों का एक महत्वपूर्ण, लेकिन अक्सर कम चर्चा में आने वाला पहलू पर्यावरण है.
भूटान का बड़ा हिस्सा वन क्षेत्र से ढका है और देश की विकास नीति में पर्यावरण संरक्षण को विशेष महत्व दिया जाता है. उसकी नदियां हिमालय से निकलकर भारत के पूर्वोत्तर और पूर्वी हिस्सों की नदी प्रणालियों से जुड़ती हैं.
इसलिए हिमालयी पारिस्थितिकी दोनों देशों के लिए साझा चिंता है.
हिमनदों में बदलाव, ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड, अचानक बाढ़, नदी प्रवाह में परिवर्तन और जलविद्युत परियोजनाओं की सुरक्षा जैसे मुद्दों पर वैज्ञानिक डेटा साझा करना भविष्य में और महत्वपूर्ण होगा.
सैटेलाइट डेटा, मौसम विज्ञान, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और शुरुआती चेतावनी प्रणालियां इस सहयोग को नई दिशा दे सकती हैं.
यहां पर्यावरण केवल संरक्षण का विषय नहीं रह जाता. यह जल, ऊर्जा, आपदा प्रबंधन और मानव सुरक्षा से जुड़ा रणनीतिक विषय बन जाता है.
चीन का कारक, लेकिन भूटान की अपनी रणनीतिक स्वायत्तता
भारत-भूटान संबंधों की चर्चा चीन के बिना पूरी नहीं हो सकती. भूटान और चीन के बीच सीमा विवाद को लेकर बातचीत जारी है. अक्टूबर 2023 में दोनों देशों के बीच सीमा वार्ता का 25वां दौर बीजिंग में हुआ था और संयुक्त तकनीकी दल के कामकाज से जुड़ा समझौता भी हुआ.
2026 में भी दोनों देशों के बीच विशेषज्ञ समूह की बैठकें जारी रहीं.
डोकलाम का 2017 का घटनाक्रम भारत, भूटान और चीन के त्रिकोणीय भूगोल की रणनीतिक संवेदनशीलता को सामने ला चुका है.
लेकिन इस पूरे समीकरण में एक बात महत्वपूर्ण है—भूटान को केवल भारत-चीन प्रतिस्पर्धा के बीच स्थित देश के रूप में देखना उसकी अपनी विदेश नीति और संप्रभु निर्णय क्षमता को कम करके आंकना होगा.
भूटान अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर विभिन्न देशों के साथ संबंध विकसित कर रहा है. भारत के लिए चुनौती भी यही है कि वह अपनी साझेदारी को ऐसे संस्थागत ढांचे में आगे बढ़ाए, जिसमें भूटान की स्वायत्तता और विकास प्राथमिकताएं केंद्र में रहें.
भारत-भूटान साझेदारी 2.0 कैसी होगी?
अगले चरण में सहयोग के कई नए क्षेत्र सामने आ सकते हैं.
जलविद्युत से आगे बढ़कर हरित हाइड्रोजन, सीमा-पार बिजली व्यापार और हरित वित्त महत्वपूर्ण हो सकते हैं. डिजिटल सार्वजनिक ढांचे को स्वास्थ्य और शिक्षा तक विस्तार दिया जा सकता है.
हिमनद झीलों से जुड़ी आपदाओं की पूर्व चेतावनी के लिए AI और सैटेलाइट आधारित प्रणालियां विकसित की जा सकती हैं. भूटानी युवाओं के लिए AI, डिजिटल कौशल और तकनीकी शिक्षा के कार्यक्रम बढ़ाए जा सकते हैं.
गेलेफू आर्थिक गलियारा, बौद्ध पर्यटन, कृषि-प्रौद्योगिकी और चक्रीय अर्थव्यवस्था भी सहयोग के नए क्षेत्र बन सकते हैं.
इन सभी पहलों में एक साझा तत्व है—कनेक्टिविटी.
पहले कनेक्टिविटी का मतलब सड़क और पुल था. फिर बिजली की ट्रांसमिशन लाइन जुड़ी. अब डिजिटल भुगतान, डेटा, शिक्षा, स्वास्थ्य और तकनीक भी उसी कनेक्टिविटी का हिस्सा बन रहे हैं.
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निष्कर्ष: हिमालयी विश्वास का अगला चरण
भारत और भूटान के रिश्ते की कहानी अब केवल राजधानियों में होने वाली बैठकों की कहानी नहीं है.
यह बुमथांग के डेयरी केंद्र में दिखाई देती है. मोंगार के अस्पताल में दिखाई देती है. समद्रुप जोंगखार के पुल में दिखाई देती है। लुनाना की जलविद्युत परियोजना में दिखाई देती है. थिम्फू में चलने वाले इलेक्ट्रिक वाहनों और भारत आने वाले भूटानी यात्रियों के UPI भुगतान में भी दिखाई देती है.
यही बदलाव भारत-भूटान संबंधों को एक नए चरण में ले जाता है.
जलविद्युत ने आर्थिक आधार बनाया, 2007 की संधि ने राजनीतिक ढांचा मजबूत किया, व्यापार ने बाजारों को जोड़ा और अब डिजिटल तथा भौतिक कनेक्टिविटी इस रिश्ते को अगली पीढ़ी की साझेदारी में बदल रही है.
भूटान की प्राथमिकता अपनी संप्रभुता, संस्कृति और पर्यावरण को बचाते हुए आर्थिक अवसर बढ़ाना है. भारत की प्राथमिकताओं में एक स्थिर, समृद्ध और सुरक्षित हिमालयी पड़ोस, स्वच्छ ऊर्जा, संपर्क और क्षेत्रीय सहयोग शामिल हैं.
इन दोनों प्राथमिकताओं के बीच जहां साझा जमीन बनती है, वहीं भारत-भूटान संबंधों का अगला अध्याय लिखा जाएगा.
हिमालय में साझेदारी की असली ताकत शायद किसी एक बड़े समझौते में नहीं, बल्कि उन छोटे-छोटे संस्थानों और परियोजनाओं में होगी जो दोनों देशों के लोगों के जीवन को रोज थोड़ा और जोड़ते हैं.
डॉ. महीप नई दिल्ली स्थित थिंक-टैंक ‘इंडियन पर्सपेक्टिव ऑन ग्लोबल अफेयर्स’ के निदेशक हैं.
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