Explainer: भारत से बांग्लादेश जा रही हिलसा मछली, क्यों बदली दशकों पुरानी ट्रेड की दिशा?
हिलसा मछली, फोटो ICAR
बांग्लादेश को भारत से हिलसा मछली का निर्यात चौंकाने वाला है, खासकर जब देश खुद हिलसा का बड़ा उत्पादक है. घरेलू उत्पादन में कमी और बढ़ती कीमतों के बीच गुजरात की सस्ती हिलसा अब बांग्लादेश की मांग पूरी कर रही है. जानें इस बदलती व्यापार दिशा के पीछे की कहानी.
Bangladesh Hilsa Import: बांग्लादेश की हिलसा मछली की मांग भारत में बहुत अधिक है. खासकर दुर्गा पूजा के समय मछली की मांग और बढ़ जाती है. लेकिन इस बार मामला कुछ उल्टा पड़ गया. बांग्लादेश से भारत आने वाली हिलसा अब भारत से बांग्लादेश भेजी जा रही है. यह सुनकर आपको शायद यकीन न हो, लेकिन ICAR-CIFRIके मुताबिक, पिछले दो महीनों में भारत ने बांग्लादेश को करीब 500 टन हिलसा का निर्यात किया है. तो आइए जानते हैं, आखिर ऐसा क्या हो गया कि हिलसा मछली के बड़े निर्यातक देश बांग्लादेश को अब भारत से हिलसा क्यों मंगानी पड़ रही है.
ICAR के अनुसार, भारत ने पिछले दो महीनों में बांग्लादेश को लगभग 500 टन हिलसा मछली का निर्यात किया है. खेप का एक बड़ा हिस्सा गुजरात, विशेषकर भरूच क्षेत्र से आया है, जबकि कुछ आपूर्ति पश्चिम बंगाल के हावड़ा थोक मछली बाजार के माध्यम से भी हुई है. चटगांव और सिलहट में अधिक अंडे वाली हिलसा मछली की काफी मांग है, जबकि अंडों को फिर से निर्यात के लिए प्रसंस्कृत भी किया जा रहा है. कुछ मछलियों का उपयोग सूखे और नमकीन उत्पादों के लिए भी किया जा रहा है.
बांग्लादेश भारत से क्यों खरीद रहा है हिलसा मछली?
बांग्लादेश में पद्मा और मेघना की हिलसा को सबसे ज्यादा पसंद किया जाता है, लेकिन घरेलू उत्पादन में कमी और बढ़ती कीमतों के बीच गुजरात की हिलसा वहां एक सस्ता विकल्प बन रही है. India Today ने बांग्लादेशी अकादमिक और कार्यकर्ता रेजाउर रहमान लेनिन के हवाले से बताया है कि गुजरात की हिलसा का इस्तेमाल स्थानीय आपूर्ति की कमी को पूरा करने के साथ-साथ औद्योगिक प्रोसेसिंग के लिए भी किया जाता है. रिपोर्ट के मुताबिक, 2026 के शुरुआती साढ़े नौ महीनों में भारत से करीब 4.27 लाख किलो हिलसा बांग्लादेश पहुंची. इसमें बड़ी मात्रा गुजरात के भरूच और नर्मदा क्षेत्र की मछली की बताई गई है.
कीमत में भी बड़ा अंतर
बांग्लादेश में नदी से मिलने वाली प्रीमियम हिलसा की कीमत काफी ज्यादा है. रिपोर्ट में बताया गया है कि पद्मा और मेघना की करीब एक किलो हिलसा की कीमत 2,200 से 2,800 टका तक हो सकती है.
इसके मुकाबले गुजरात से आने वाली हिलसा बांग्लादेश के लैंड पोर्ट पर करीब 500 से 700 टका प्रति किलो की कीमत पर पहुंच सकती है. रिपोर्ट के अनुसार, खुदरा बाजार में इसकी कीमत करीब 1,500 से 1,800 टका प्रति किलो तक हो सकती है.
भारत से बांग्लादेश तक कैसे पहुंचती है गुजरात की हिलसा?
गुजरात के नर्मदा और भरूच क्षेत्र से आने वाली हिलसा पश्चिम बंगाल के रास्ते बांग्लादेश पहुंचती है. रिपोर्ट के मुताबिक, बड़ी मात्रा में यह मछली पेट्रापोल सीमा के जरिए बांग्लादेश जाती है. पेट्रापोल इस व्यापार में ट्रांजिट और कोल्ड-स्टोरेज हब के रूप में काम करता है.
बांग्लादेश से भी आती है हिलसा
हावड़ा होलसेल फिश मार्केट एसोसिएशन के सचिव सैयद अनवर मकसूद ने कहा कि हर वर्ष दुर्गा पूजा से पहले भारत में बांग्लादेश और म्यांमार से बड़ी मात्रा में हिलसा आती है. बांग्लादेश सरकार की ओर से भी कोलकाता के लोगों के लिए पूजा के उपहार के तौर पर हिलसा भेजी जाती है. हालांकि, इस वर्ष बांग्लादेश से पद्मा नदी की हिलसा मछली भारत कब पहुंचेगी, इसे लेकर अभी स्थिति स्पष्ट नहीं है. उन्होंने बताया कि राज्य के मछली व्यवसायियों ने बांग्लादेश के मत्स्य विभाग से हिलसा भेजने के लिए आवेदन किया है. अब व्यवसायियों की नजर इस बात पर है कि बांग्लादेश सरकार इस संबंध में क्या फैसला लेती है.
पश्चिम बंगाल के लिए बड़ा बाजार अवसर
ICAR के अनुसार, पश्चिम बंगाल इस उभरते व्यापार से लाभ उठा सकता है. राज्य में हिलसा से जुड़ा मजबूत मछली बाजार, नदी और मुहाना आधारित पारिस्थितिकी तंत्र तथा कोलकाता-हावड़ा का स्थापित मछली व्यापार नेटवर्क मौजूद है.
संस्थान का कहना है कि मौजूदा व्यापार से उत्पादन, कोल्ड चेन, प्रसंस्करण, मूल्यवर्धन, ब्रांडिंग और निर्यात आधारित मत्स्य कारोबार को मजबूत करने का अवसर मिल सकता है.
ICAR-CIFRI के निदेशक डॉ. प्रदीप डे ने कहा कि बांग्लादेश को भारतीय हिलसा का निर्यात केवल व्यापार की घटना नहीं है, बल्कि यह इस मछली की क्षेत्रीय मांग और आर्थिक मूल्य का संकेत देता है. उनके मुताबिक, पश्चिम बंगाल के लिए यह उपभोग आधारित मत्स्य कारोबार से आगे बढ़कर ज्ञान आधारित, टिकाऊ और मूल्यवर्धित हिलसा अर्थव्यवस्था विकसित करने का अवसर है.
निर्यात के साथ संरक्षण की चुनौती
ICAR ने साफ किया है कि बढ़ती मांग के साथ हिलसा के प्राकृतिक भंडार पर अतिरिक्त दबाव नहीं पड़ना चाहिए. इसलिए व्यापार बढ़ाने के साथ संरक्षण और टिकाऊ उत्पादन पर भी ध्यान देना जरूरी है.
संस्थान के मुताबिक, किशोर हिलसा को पकड़ने से रोकना और वयस्क तथा प्रजनन करने वाली मछलियों की सुरक्षा महत्वपूर्ण है. पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से निर्धारित संरक्षण उपायों को प्रभावी ढंग से लागू करने पर भी जोर दिया गया है.
90 मिमी से छोटे जाल पर रोक क्यों जरूरी?
ICAR-CIFRI के अनुसार, हुगली नदी में मार्च से मई के दौरान मछली पकड़ने के नियमों को सख्ती से लागू करने की जरूरत है. हिलसा पकड़ने वाले जाल का आकार 90 मिमी से अधिक रखने की सलाह दी गई है, ताकि करीब 500 ग्राम से कम वजन वाली छोटी मछलियां जाल में न फंसें.
इसका उद्देश्य छोटी हिलसा को पकड़ने से बचाना है, ताकि उन्हें बड़े होने और प्रजनन करने का मौका मिल सके.
प्रजनन के समय हिलसा की सुरक्षा पर जोर
ICAR ने हिलसा के प्रजनन और प्रवास के दौरान संरक्षण को भी महत्वपूर्ण बताया है. संस्थान के मुताबिक, महालया से काली पूजा के आसपास हिलसा का प्रमुख अपस्ट्रीम प्रवास होता है, जबकि होली के आसपास एक अन्य महत्वपूर्ण प्रवास देखा जाता है.
इन अवधियों में उचित मौसमी प्रतिबंध लगाने से हिलसा के प्राकृतिक प्रजनन और भविष्य के स्टॉक को मजबूत करने में मदद मिल सकती है.
स्वस्थ नदियां ही हिलसा कारोबार का आधार
ICAR-CIFRI के मुताबिक, हिलसा के लिए उपयुक्त मीठे पानी और खारे पानी का संतुलन, गहरे पानी के प्रवास मार्ग और अबाधित प्रजनन मार्ग जरूरी हैं.
संस्थान के विभागाध्यक्ष डॉ. रंजन कुमार मन्ना ने कहा कि हिलसा संरक्षण को मत्स्य क्षेत्र के भविष्य में निवेश के तौर पर देखना चाहिए. उनके मुताबिक, हिलसा के सुरक्षित प्रवास के लिए महत्वपूर्ण गहरे जल क्षेत्रों को मछली पकड़ने के जाल से सुरक्षित रखना और नदी के मुहाने के पास रणनीतिक मछली पकड़ने-मुक्त क्षेत्र बनाना उपयोगी हो सकता है.
सुंदरबन की नदियों में भी चुनौती
ICAR के अनुसार, सुंदरबन की सप्तमुखी, मातला, ठाकुरान और हेरोभंगा नदियों में हिलसा की संख्या अपेक्षाकृत कम है. इसके पीछे मीठे पानी के प्रवाह में कमी और खारेपन में बदलाव जैसे कारण बताए गए हैं.
संस्थान का कहना है कि जहां पर्यावरणीय रूप से संभव हो, वहां वैज्ञानिक तरीके से जल संपर्क और नदी आवास को बहाल करने के उपाय हिलसा के लिए बेहतर पर्यावास बनाने में मदद कर सकते हैं.
हिलसा के लिए नई तकनीक पर भी काम
ICAR-CIFRI और दूसरे ICAR संस्थान हिलसा पर अनुसंधान भी कर रहे हैं. संस्थान के मुताबिक, इसमें अल्ट्रासोनोग्राफी के जरिए मछली की परिपक्वता का गैर-आक्रामक आकलन और क्रायो-प्रिजर्व्ड स्पर्म की मदद से हिलसा बीज उत्पादन जैसे शोध शामिल हैं.
ICAR का मानना है कि भविष्य में ये तकनीकें हिलसा के प्रजनन और स्टॉक संवर्धन के कार्यक्रमों में मदद कर सकती हैं और पूरी तरह प्राकृतिक भंडार पर निर्भरता कम करने की दिशा में उपयोगी हो सकती हैं.
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