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कोरोना वायरस का कहीं चीन ने जैविक हथियार के रूप में तो नहीं किया इस्तेमाल? अमेरिकी खुफिया दस्तावेज में किया गया दावा

By Prabhat Khabar Digital Desk
Updated Date
2015 से चीनी सैन्य वैज्ञानिक कर रहे थे जांच.
2015 से चीनी सैन्य वैज्ञानिक कर रहे थे जांच.
फाइल फोटो.

लंदन/मेलबर्न : कोरोना वायरस का प्रसार और उसके बढ़ते प्रकोप को लेकर दुनिया भर के देशों की भौंहें एक बार फिर चीन की ओर तन गई हैं. इस घातक वायरस को लेकर चीन के दावों को कोई भी देश मानने को तैयार नहीं है कि यह वुहान के जानवर मार्केट से पूरी दुनिया में फैला है. हर तरफ से एक ही आवाज उठ रही है कि जिस चीन से कोरोना वायरस पूरी दुनिया में फैला है, वह इतना सुरक्षित कैसे है? कैसे उसने महज 6 से 8 महीने के अंदर इस पर काबू पा लिया, जबकि भारत समेत दुनिया भर के देश पिछले डेढ़-दो साल से इससे जंग लड़ रहे हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि चीन ने इस जैविक हथियार बनाकर दुनिया पर हमला कर दिया हो?

अमेरिकी विदेश विभाग की खुफिया रिपोर्ट्स में किए गए खुलासे के बाद चीन के नापाक इरादे को लेकर दुनिया भर के देशों का शक और भी गहरा होता जा रहा है. विदेश विभाग की यह रिपोर्ट 2015 के उस घटनाक्रम से जुड़ा है, जब दुनिया भर के लोग कोरोना वायरस के घातक प्रभाव के बारे में नहीं जानते थे. चीन उसी समय कोरोना वायरस का जैविक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने को लेकर रिसर्च करा रहा था.

चीनी सैन्य वैज्ञानिकों ने की थी भविष्यवाणी

आशंका यह भी जाहिर की जा रही है कि चीन के सैन्य वैज्ञानिकों ने तीसरे विश्व युद्ध में जैविक हथियार के इस्तेमाल की भविष्यवाणी भी की थी. अमेरिकी विदेश विभाग को प्राप्त हुए खुफिया दस्तावेजों के हवाले से मीडिया की खबरों में इस बात का दावा किया जा रहा है. ब्रिटेन के अखबार 'द सन' ने ऑस्ट्रेलियाई न्यूज पेपर 'द ऑस्ट्रेलियन' के हवाले से खबर दी है कि अमेरिकी विदेश विभाग को हाथ लगे इस 'बॉम्बशेल' यानी कि विस्फोटक जानकारी के अनुसार चीनी सेना पीएलए के कमांडर इस तरह के कुटिल पूर्वानुमान लगा रहे थे.

चीन के वैज्ञानिकों ने कोरोना को माना था जेनेटिक हथियार

खबर के अनुसार, अमेरिकी अधिकारी को मिले ये कथित दस्तावेज साल 2015 में सैन्य वैज्ञानिकों और चीन के स्वास्थ्य अधिकारियों द्वारा लिखे गए थे, जो कि खुद कोरोना वायरस के बारे में जांच कर रहे थे. चीनी वैज्ञानिकों ने सार्स कोरोना वायरस की चर्चा 'जेनेटिक हथियार के नए युग' के तौर पर की है. कोविड इसका एक उदाहरण है. पीएलए के दस्तावेजों में इस बात की चर्चा है कि एक जैविक हमले से शत्रु की स्वास्थ्य व्यवस्था को ध्वस्त किया जा सकता है.

2003 में चीन पर हुआ था सार्स का अटैक

पीएलए के इस दस्तावेज में अमेरिकी वायुसेना के कर्नल माइकल जे के अध्ययन का भी जिक्र है, जिन्होंने भविष्यवाणी की थी कि तीसरा विश्वयुद्ध जैविक हथियारों से लड़ा जाएगा. इस रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि 2003 में जिस सार्स का चीन पर अटैक हुआ था, वह हो सकता है कि एक जैविक हथियार हो, जिसे आतंकियों ने तैयार किया हो.

कोरोना वायरस में किया जा सकता है कृत्रिम बदलाव

इन कथित दस्तावेजों में इस बात का भी जिक्र किया गया है कि इस वायरस को कृ्त्रिम रूप से बदला जा सकता है और इसे आदमी में बीमारी पैदा करने वाले वायरस में बदला जा सकता है. इसके बाद इसका इस्तेमाल एक ऐसे हथियार के रूप में किया जा सकता है, जिसे दुनिया ने पहली बार कभी नहीं देखा होगा. इस दस्तावेज में चीन के वरिष्ठ स्वास्थ्य अधिकारियों का लेख भी शामिल है.

चीन की छवि को किया जा रहा खराब : ग्लोबल टाइम्स

गौरतलब है कि कोविड-19 के पहले केस का पता साल 2019 में चला था. इसके बाद यह बीमारी वैश्विक महामारी के रूप में तब्दील हो गई. मीडिया रिपोर्ट्स में इस खुलासे के बाद ऑस्ट्रेलियाई राजनेता जेम्स पेटरसन ने कहा कि इन दस्तावेजों ने कोरोना वायरस की उत्पत्ति के बारे में चीन की पारदर्शिता को लेकर संदेह और चिंता पैदा कर दी है. हालांकि, चीन के सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स ने इस लेख को प्रकाशित करने के लिए 'द ऑस्ट्रेलियन' की आलोचना की है और इसे चीन की छवि खराब करने की मुहिम करार दिया है.

Posted by : Vishwat Sen

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Published Date

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