पाकिस्तानी तालिबान : महिलाओं को जिहादी बनाने की साहित्यिक मुहिम
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :27 Aug 2017 8:44 AM (IST)
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सिद्धार्थ भदौरिया पाकिस्तानी तालिबान ने महिलाओं के लिए एक पत्रिका निकाली है. इस पत्रिका का लक्ष्य महिलाओं को जिहादी बनने के लिए प्रोत्साहित करना है. पत्रिका का नाम सुन्न्त-ए-खौला है. सुन्नत-ए-खौला का मतलब होता है खौला का रास्ता. खौला एक मुस्लिम कवयित्री से संबंधित है, जो सातवीं शताब्दी में सक्रिय थीं. पत्रिका के संपादकीय में […]
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सिद्धार्थ भदौरिया
पाकिस्तानी तालिबान ने महिलाओं के लिए एक पत्रिका निकाली है. इस पत्रिका का लक्ष्य महिलाओं को जिहादी बनने के लिए प्रोत्साहित करना है. पत्रिका का नाम सुन्न्त-ए-खौला है. सुन्नत-ए-खौला का मतलब होता है खौला का रास्ता. खौला एक मुस्लिम कवयित्री से संबंधित है, जो सातवीं शताब्दी में सक्रिय थीं. पत्रिका के संपादकीय में ही इसका मकसद साफ है.
इसकी शुरुआत में लिखा गया है कि हम महिलाओं को मुहाजिदीन बनने के लिए आगे आने को उसकाना चाहते हैं. महिलाएं अपने घरों में गुप्त बैठकें करें और इसमें अपनी तरह की अन्य जिहादी बहनों को शामिल करें. संपादकीय में आगे लिखा है कि बैठक के अलावा ऐसे साहित्य भी आपस में बांटें, जिसे पढ़कर उन्हें जिहादी बनने की प्रेरणा मिल सके. इसके अलावा जिहादी बहनों के लिए साधारण हथियार चलाने ट्रेनिंग और शारीरिक प्रशिक्षण का आयोजन करें.
45 पेज की यह पत्रिका अंगरेजी में है और इसे ऑनलाइन जारी किया गया है. पत्रिका को तहरीक-ए-तालिबान ने प्रकाशित किया है. तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान का सबसे खतरनाक इस्लामिक संगठन है और इसे ही पाकिस्तानी तालिबान के नाम से जाना जाता है.
खतरनाक है मकसद
पत्रिका का मकसद पढ़ी-लिखी महिलाओं व छात्राओं को जिहादी बनने के लिए प्रोत्साहित करना है. पत्रिका ने अपने मकसद को पूरा करने के लिए अजग-गजब तर्क दिया है. पत्रिका में तहरीक-ए-तालिबान के प्रमुख फैजुल्लाह खोरसानी की बीबी का इंटरव्यू भी है. उसने दलील दी है कि बाल विवाह गलत नहीं है.
उसने दावा किया है कि खुद उसका निकाह खोरसानी से 14 साल की उम्र में हुआ था. खोरसानी की बीबी के मुताबिक अगर परिपक्व युवक-युवतियों को ज्यादा दिन तक बिना शादी के छोड़ दिया जाये, तो उनका नैतिक पतन शुरू हो जाता है. इसलिए नैतिक रूप से मजबूत रहने के लिए कम उम्र में शादी जरूरी है. हालांकि खोरासानी की बीबी के इस बयान का पढ़े-लिखे लोग मजाक उड़ा रहे हैं. लाहौर के एक ब्लॉगर अहसान रिजवी ने इसे हास्यास्पद बताया है.
दूसरा लेख माय जरनी फ्रॉम इग्नोरेंस टू गाइडेंस है. यह एक पाकिस्तानी महिला डॉक्टर का लेख है. उसने इसमें अपनी पश्चिमी शिक्षा को छोड़ने और जिहाद को गले लगाने की कहानी बयां की है.
तीसरा लेख एक चिट्ठी है. यह चिट्ठी एक छह साल के बच्चे की है, जो एक मदरसे में पढ़ता है और पाकिस्तानी तालिबान के ट्रेनिंग कैंप में जाता है.
लड़के ने लिखा है कि उसका भाई पाकिस्तान में एक आत्मघाती हमले के दौरान मारा गया. इसके बाद उसने अपनी मां की मदद की. जब वह खिलौनेवाली बंदूक से खेलता है, तो उसे उस वक्त का इंतजार रहता है, जब वह भी एक दिन सच्चा जिहादी बनेगा.
इस पत्रिका के मकसद को लेकर बहस छिड़ी हुई है. कुछ लोग इसे आइएस से मुकाबले की रणनीति के तौर पर देख रहे हैं. विशेषज्ञों की राय में एक रणनीति के तहत महिलाआें काे जिहादी बनने की मुहीम आतंकी संगठन चलाते हैं. वुडरो विल्सन में साउथ एशिया के विशेषज्ञ माइकल कुगलमैन का कहना है कि एक महिला जिहादी असानी से अपने बच्चों को जिहादी बना सकती हैं,.
पाक तालिबान निकाल रहा पत्रिका
डेली टाइम्स के अनुसार, पाकिस्तान में पाकिस्तानी तालिबान ने 2010-11 में महिला सुसाइड बॉम्बर का इस्तेमाल किया था. हालांकि महिलाओं का इस्तेमाल करने में आइएस की तुलना में पाकिस्तानी तालिबान काफी पीछे है.
इसलिए सुन्नत-ए-खौला प्रकाशित करने के पीछे पाकिस्तानी तालिबान की मंशा आइएस की नकल करना है, ताकि ज्यादा-से-ज्यादा महिलाएं तालिबान से जुड़ सकें. मिलिटेंट इस्लामिज्म पर शोध करने वाले टोर हम्मिंग का कहना है कि पाकिस्तानी तालिबान की इस पत्रिका को आइएस की पहल से भी आगे जाकर देखा जा रहा है, क्योंकि आइएस कभी भी अंग्रेजी में महिला प्रधान ऑनलाइन पत्रिका प्रकाशित नहीं करता है. आइएस सिर्फ महिला विशेष सप्लीमेंट प्रकाशित करता है और सिर्फ आइएस के नियंत्रण वाले इलाकों में उसका वितरण करवाया जाता है.
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