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‘भालो मानुष’ वाले राज्य में ‘बंगाली प्राइड’ पर खामोशी, सभी दलों ने बिगाड़ दी ‘भद्रलोक’ की छवि...

Updated at : 26 Apr 2021 6:47 AM (IST)
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‘भालो मानुष’ वाले राज्य में ‘बंगाली प्राइड’ पर खामोशी, सभी दलों ने बिगाड़ दी ‘भद्रलोक’ की छवि...

Bengal Election 2021: हमने और आपने भी कई किताबों में, कई राजनीतिक रैलियों में और कई सिनेमा में भी पश्चिम बंगाल को ‘भद्रलोक’ पढ़ा, सुना और देखा होगा. आज भी बंगाल के लोगों को ‘भालो मानुष’ माना और बोला जाता है. वक्त का पहिया घूमा और राजनीति के रास्ते भद्रलोक के भालो मानुष माने जाने वाले पश्चिम बंगाल के लोगों की सभ्यता-संस्कृति पर बड़ा सा आघात हुआ. इस विधानसभा चुनाव के प्रचार में भद्रलोक वाले पश्चिम बंगाल के भालो मानुषों को वो सब देखना, सुनना पड़ा, जिसकी कल्पना इस धरती के लिए शायद कभी नहीं की गई होगी.

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Bengal Election 2021: हमने और आपने भी कई किताबों में, कई राजनीतिक रैलियों में और कई सिनेमा में भी पश्चिम बंगाल को भद्रलोक पढ़ा, सुना और देखा होगा. आज भी बंगाल के लोगों को भालो मानुष माना और बोला जाता है. वक्त का पहिया घूमा और राजनीति के रास्ते भद्रलोक के भालो मानुष माने जाने वाले पश्चिम बंगाल के लोगों की सभ्यता-संस्कृति पर बड़ा सा आघात हुआ. इस विधानसभा चुनाव के प्रचार में भद्रलोक वाले पश्चिम बंगाल के भालो मानुषों को वो सब देखना, सुनना पड़ा, जिसकी कल्पना इस धरती के लिए शायद कभी नहीं की गई होगी.

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राजनीतिक दलों के नाम बड़े और दर्शन दिखे छोटे

पश्चिम बंगाल की धरती को आजादी के पहले और उसके बाद कला, संस्कृति, साहित्य, सिनेमा की शानदार शख्सियतों के लिए वक्त के आखिरी सेकेंड तक याद रखा जाएगा. कवि गुरु रविंद्र नाथ टैगोर, बंकिमचंद्र चटर्जी, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, विधानचंद्र राय, ज्योति बसु, प्रणब मुखर्जी, अमर्त्य सेन, मृणाल सेन, सत्यजीत रे, नाम याद करते जाइए और आपको बंगाल की धरती की अलौकिक और अद्भुत छटा दिखेगी. लेकिन, सबकुछ बिसरा दिया गया. इस बार के विधानसभा चुनाव प्रचार में सारी मर्यादाएं ताक पर रखकर नेताओं ने खूब बयानबाजी की है.

सभी ने मिलकर ‘बंगाली प्राइड’ की हवा निकाली

बंगाल चुनाव छह चरणों की वोटिंग में राजनीतिक हिंसा का नंगा नाच हुआ. कमोबेश सभी दलों के समर्थकों ने हिंसा की. इस बार के चुनाव प्रचार में बंगाली प्राइड को ठेस पहुंची. सबको साथ लेकर चलने वाला बंगाल खेमों, धर्मों और कुनबों में बंटा दिखा. जाति-धर्म को किनारे रख कर आगे चलने वाले बंगाल में चुनाव प्रचार में हिंदू-मुस्लिम वोटबैंक पर खूब बयानबाजी देखने को मिली. ममता बनर्जी ने बाहरी-भीतरी और खेला होबे का राग छेड़ा तो, बीजेपी कहां चुप बैठने वाली थी. बीजेपी ने सोनार बांग्ला का नारा गढ़ दिया. साहित्य, सिनेमा, कला-संस्कृति और आध्यात्म की सोने की चिड़िया को बीजेपी ने सोनार बांग्ला बनाने का चुनावी नारा भी दिया है.

क्या प्रचार में हिंदू-मुसलमान की जरुरत भी है?

बंगाल चुनाव प्रचार ने शायद पहली बार हिंदू-मुस्लिम की खाई को अपनी आंखों के सामने चौड़ा होते देखा है. पीएम नरेंद्र मोदी, सीएम ममता बनर्जी और कांग्रेस नेता राहुल गांधी चुनावी मंच से हिंदू-मुस्लिम करते दिखे. चुनाव प्रचार में बेरोजगारी, गरीबी, अशिक्षा बैकसीट पर दिखे. इनकी बात सिर्फ चुनावी घोषणापत्र में हुई. चुनावी मंच पर विरोधियों को निशाने पर लेने वाले नेताओं ने राजनीति के हर उस हथकंडे को अपनाया, जिसे भद्रलोक के लिए एक बुरा सपना भी माना जा सकता है. शीर्ष संवैधानिक पदों पर बैठे लोग भी सारी मर्यादाओं को तिलांजलि देकर ही माने.

बाहरी-भीतरी के बाद ‘कोरोना जिहाद’ भी…

इस बार के चुनाव प्रचार में बाहरी-भीतरी राग भी खूब सुना गया. बीजेपी नेताओं ने घुसपैठियों को बाहर करने की बात कही. बोले कि घुसपैठिए बंगाल के लोगों के अधिकार को खा रहे हैं. बीजेपी की सरकार बनी तो सभी को बाहर का रास्ता दिखाया जाएगा. जबकि, ममता बनर्जी ने तो सीएए और एनआरसी का हवाला देकर वोटबैंक को गोलबंद करने की भी खूब कोशिश की. कोरोना जैसी महामारी पर भी खूब पॉलिटिक्स हुई है. बीजेपी ने फ्री में कोरोना वैक्सीन देने की पेशकश की. टीएमसी ने भी बीजेपी के नेताओं पर कोरोना जेहाद जैसे आरोप भी लगा डाले. कोरोना से कराह रहे बंगाल को संकट से निजात दिलाने का भरोसा किसी ने भी नहीं किया है.

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धर्म की राजनीति, बंगाल की सभ्य संस्कृति

बंगाल चुनाव के प्रचार में धर्म की राजनीति भी खूब देखने को मिली है. बीजेपी के नेताओं ने तो चुनावी मंच से जय श्रीराम के नारे को खूब भुनाया. यहां तक कि जय श्रीराम नारे को राजनीति से जोड़कर नहीं देखने की बात भी कही. दूसरी छोर पर खड़ी ममता बनर्जी चुनावी मंच पर चंडी पाठ से लेकर शक्ति आराधना करती देखी गईं. बंगाल के मतदाता सबकुछ खामोशी से देखते रहे. आखिरकार सातवें फेज की वोटिंग भी आ गई. अधिकतर नेताओं ने जो भी कहा, उसका क्या असर होगा, वो दो मई को पता चलेगा. वैसे, बंगाल में एक बात कही जाती है कि जो भद्रलोक आज सोचता है, उसे देश आने वाले कल में अपनाता है. आपको भी फुर्सत मिले तो सोचिएगा क्या भद्रलोक सच में आज वैसा रह गया है, जिसे आने वाले कल में देश फॉलो करे?

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