देवाधिदेव शिव ऐसे हो गये बैद्यनाथ

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 13 Aug 2018 7:18 AM

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त्रय:शूल निर्मूलनं शूलपाणिम्। भजेहं भवानीपतिं भावगम्यम्।। आज पवित्र मास सावन की तीसरी सोमवारी है. श्रावण मास की शिवरात्रि के बाद इस सोमवारी को शिवलिंग पर जलार्पण का काफी महत्व है. साथ ही इसके दो दिन बाद बुधवार को नाग पंचमी है. सर्पदोषाें से बचने के लिए नाग पंचमी के दिन पूजा करने से लाभ होता […]

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त्रय:शूल निर्मूलनं शूलपाणिम्।
भजेहं भवानीपतिं भावगम्यम्।।
आज पवित्र मास सावन की तीसरी सोमवारी है. श्रावण मास की शिवरात्रि के बाद इस सोमवारी को शिवलिंग पर जलार्पण का काफी महत्व है. साथ ही इसके दो दिन बाद बुधवार को नाग पंचमी है. सर्पदोषाें से बचने के लिए नाग पंचमी के दिन पूजा करने से लाभ होता है.
समस्त ज्योतिष ग्रंथों के अलावा महर्षि पराशर व वराहमिहिर के शास्त्रों में भी कालसर्प दोष का वर्णन मिलता है. ज्योतिष के अनुसार, व्यक्ति की कुंडली में ग्रह जब राहु और केतु के मध्य आ जाते हैं, तो कालसर्प दोष लग जाता है. जिन्हें कालसर्प दोष होता है, उन्हें नागपंचमी के दिन पूजा करने से लाभ होता है. इस दिन नागदेव को सिर्फ दूध चढ़ाया जाता है.
नागदेव की आराधना से कालसर्प दोष से मुक्ति मिलती है. इस दिन विशेष रूप से शिवमंदिर में एक माला शिव गायत्री मंत्र का जप करने और चांदी, सोने या तांबे के नाग-नागिन के जोड़े चढ़ाने से कालसर्प दोष से मुक्ति मिलती है. इस खास मौके पर बाबा बैद्यनाथ से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी से भरा है आज का यह आयोजन-
हिंदू धार्मिक ग्रंथों में आदिदेव महादेव का सर्वशक्तिमान देव माना गया है़ इन्हें शिव की संज्ञा आख्यानों में दी गयी है़ शिव जगत के लोगों के प्राणधार हैं
शिव ने ही सृष्टि की रचना की है़ वे जगत के सर्जक, पालक और संहारक माने गये हैं एक साथ तीनों गुणों का संगम ही शिव है़ पौराणिक ग्रंथों में एक शिव पुराण है, जिनमें शिव की महिमा को विशद रूप में आख्यायित किया गया है:
देवो गुणत्रयातीतश्चतुव्यूहो महेश्वर:
सकल: सकलाधार: शक्तेरुत्पतिकारणम् ।
-शिवपुराण
कहने का तात्पर्य है कि शिव के बिना जगत की परिकल्पना संभव नहीं गुणत्रयातीत से भगवान शिव चार व्यूहों में विभक्त हैं- ब्रह्मा, काल रुद्र और विष्णु़ ये चारों शिव के आधार हैं़ शक्ति की जन्मस्थली है़ धार्मिक ग्रंथों की मानें, तो शिव सत्य है, सुंदर हैं़ इनकी एक-से-एक क्रिया मानव हित में है. वैसे कहा जाता है कि शिव ने ही सभी विद्या को जन्म दिया़
चाहे मंत्र विधा हो या तंत्र विधा, चाहे नाट्य विधा हो या वैद्य विधा, सभी को शिव ने ही जगत में अवतरित किया है़ शिव की परिकल्पना एक ऐसी मूर्ति के रूप में है, जो मूर्त भी हैं और अमूर्त भी़ उन्हें कोई निराकार भगवान के तौर पर भजता है, तो कोई साकार मूर्ति के तौर पर. जो भी हो, शिव शाश्वत देव हैं़ शिव की पूजा लिंगवत होती है़ शिव ही एक ऐसे देव हैं, जिनकी शक्ति संग अर्चना होती है़
तार्किक तौर पर देखें, तो जगत में जो भी मानव हैं, उनकी शक्ति की ही पूछ है़ निर्बल होना शाप माना जाता है़ मनुष्य मात्र के लिए सृष्टि की गति को आगे बढ़ाने के लिए शिव प्रदत्त शक्ति न रहे, तो वह समाज के कोने का आदमी बन जाता है़ निरोग होना प्रकृति का उत्तम विधान है़
शशिवलिंगे अपि सर्वेसां
देवानां पूजनं भवेत्।
सर्वलोकमये
यस्माच्छिवषक्तिर्विभु: प्रभु: ॥
-शिवपुराण
आस्तिकों को शिव की पूजा से ज्यादा फल शिवलिंग के पूजन से मिलता है. यह जगजाहिर है़ इस देव को वैद्यों के नाथ वैद्यनाथ कहा गया है़ आखिर क्यों ? यह एक अहम प्रश्न हर भक्त के मन में हमेशा उठता है़ कथाओं के अनुसार शिव से बढ़कर कोई वैद्य तीनों लोकों में नहीं हुआ. मानव के देह में हाथी का मस्तक सफलता पूर्वक जोड़ने की कथा गणेश जी के प्रसंग में आयी है़
कथा के अनुसार एक बार शिव और माता पार्वती भूलोक में विहार करने के लिए आये. एक सुंदर वन में उमा संग शिव ने कुछ दिनों तक वास किया. पार्वती सानंद रह रही थीं. एक दिन देवाधिदेव शिव जी फल लाने के लिए दूर चले गये, जहां का विहंगम दृश्य देख कर कुछ दिनों के लिए वहीं रह गये़ इधर पार्वती एक दिन नहाने के लिए जा रही थीं. अपनी देह में उन्होंने उबटन लगाया. मन में कौतूहलता हुई कि उबटन को संग्रहित कर एक आकृति का रूप दे दूं
बस क्या था, माता पार्वती ने भगवान हरि का स्मरण कर एक पुत्र के रूप में आकृति बना डाली़ पुनश्च उसमें प्राण फूंका, तो वह आकृति जीवंत हो उठी. अपना बालक समझ पार्वती ने घर के बाहर नगर रक्षार्थ उसे तैनात कर दिया और स्वयं सखियों के संग विहार करने लगी़ं इस दौरान तरह-तरह की जलक्रीड़ा कर रही थी़ं इधर शिव को अपनी नगरी याद आयी, तो वे वापस आये़ नगर में एक बालक को देख वे आश्चर्यचकित हो गये़ अपने घर में प्रवेश करने का प्रयास किया, तो मासूम बालक ने मार्ग रोका और मना किया़ शिव जी आग बबूला हो गये और अपने शूल से बालक का सिर कत्ल कर कर दिया.
मस्तक कहां चला गया, इसका भी पता नहीं चल पाया़ कहा गया है कि सिर भस्मीभूत हो गया़ शिव ने जब अपने घर में प्रवेश किया, तो पार्वती को जलक्रीड़ा स्थल पर देखा. पार्वती के पूछने पर सारी घटना बता दी़ पार्वती कुपित हो गयीं और विलाप करने लगीं कि आपने मेरे पुत्र की यह दशा क्यों कर दी? इस पर शिव जी ने कहा कि मैं जान नहीं रहा था कि यह तुम्हारी संतान है़
अज्ञात्वा ते सिरष्छिन्नं शूलेनानेन यन्म्या।
तेनाहं सापराधोस्मि सत्यं सत्यं जनार्दन॥
शिव को पार्वती ने सख्त हिदायत दी कि जल्द ही मेरे पुत्र को जीवित कर दें, नहीं तो मैं अपनी शक्ति का प्रभाव दिख दूंगी़ जब सभी के भोलेनाथ हैं, तो कैसे नहीं मानते़ शिव जी राजी हो गये़ वे जंगल की ओर चल दिये़ पौराणिक कथाओं के अनुसार, वे एक जंगल में गये, जहां पर एक गजराज उतर दिशा की ओर पांव करके सोया था़ शिव ने उसका वध करना उचित समझा़
ततोरण्ये समालोक्य गजराजं महाबलम्।
उदकषिरसमेकत्र श्यानं स महेश्वर: ॥
उन्होंने त्रिशूल से गजराज का मस्तक काटा और सिर कटे बालक की देह में प्रतिरोपित कर दिया़ शिव का यह कार्य कुशल वैद्य का ही तो था. भले ही दुनिया आगे बढ़ी हो, पर तीनों लोगों में वैद्यों के नाथ तो शिव ही हैं. उनके समक्खक्ष सभी वैद्य तुच्छ हैं
मानव के कटे हुए शरीर में गजराज का मस्तक जोड़ उसे जीवित करने का वह काम तो महावैद्य भी नहीं कर सकता, जिसे शिव ने कर दिखाया़ यही गज मस्तक वाले सूत गजानन कहलाये़ पार्वती व शिव के प्रथम पुत्र गणेश की पूजा आज जगत में किसी भी प्रकार के कार्य आरंभ के पूर्व में की जाती है़ भगवान गणेश की पूजा से शिव और पार्वती दोनों एक साथ प्रसीद होते हैं
देवघर की धरती पर बाबा वैद्यनाथ की पूजा सावन में व्यापक पैमाने पर होती रही है़ लाखों-लाख भक्त आते हैं और निरोग होने की कामना करते हैं़ ये हर प्रकार के रोग से निजात दिलाते हैं. लोक में जय शिव का घोष होता है और आस्था के साथ उनकी अर्चना कर मनोकामना की प्राप्ति की जाती है.
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