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आदिवासी समाज की पीड़ा व संघर्ष की कविताएं

Updated at : 13 Apr 2018 9:31 AM (IST)
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आदिवासी समाज की पीड़ा व संघर्ष की कविताएं

II मनोज लकड़ा II झारखंड की युवा आदिवासी कवयित्री जसिंता केरकेट्टा की कविताएं देश विदेश में धूम मचा रही हैं. पश्चिमी सिंहभूम जिला के मनोहरपुर प्रखंड के खुदपोस गांव की जसिंता का जीवन संघर्षशील रहा है. कुछ साल पहले अपने गांव के हाट में इमली बेचने वाली उस लड़की की ​कविताएं आज देश विदेश को […]

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II मनोज लकड़ा II
झारखंड की युवा आदिवासी कवयित्री जसिंता केरकेट्टा की कविताएं देश विदेश में धूम मचा रही हैं. पश्चिमी सिंहभूम जिला के मनोहरपुर प्रखंड के खुदपोस गांव की जसिंता का जीवन संघर्षशील रहा है. कुछ साल पहले अपने गांव के हाट में इमली बेचने वाली उस लड़की की ​कविताएं आज देश विदेश को झकझोर रहीं हैं. इस साल प्रतिष्ठित भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन नई दिल्ली ने उनकी कविताओं का संग्रह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक साथ तीन भाषाओं में प्रकाशित किया है.
हिंदी, अंगरेजी, जर्मन में है ‘जड़ों की जमीन’ भारतीय ज्ञानपीठ ने पहली बार झारखंडी आदिवासी पृष्ठ्भूमि से आने वाले किसी युवा कवि की कविताओं का संग्रह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तीन भाषाओं में प्रकाशित किया है. जसिंता की कविताओं का दूसरा संग्रह ‘जड़ों की जमीन’ (Land of the Roots/ Tiene Wurzeln (टिफह वुर्जेलन) के नाम से हिंदी-इंग्लिश व हिंदी-जर्मन में एक साथ आया है. हिंदी- अंगरेजी संस्करण राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पाठकों के लिए, वहीं हिंदी-जर्मन, यूरोपीय देशों में जर्मन भाषियों के लिए है. इसे भारतीय ज्ञानपीठ व द्रौपदी वेरलाग, हाइडलबर्ग (जर्मनी) ने संयुक्त रूप से प्रकाशित किया है.
2016 में आई थी पहली पुस्तक ‘अंगोर’ : जसिंता की कविताओं की पहली पुस्तक 2016 में आदिवाणी प्रकाशन, कोलकाता ने ‘अंगोर’ के नाम से हिंदी- अंगरेजी में प्रकाशित की. उसी साल जर्मनी के प्रकाशन द्रौपदी वेरलाग ने इसे ‘ग्लूट’ नाम से हिंदी- जर्मन में प्रकाशित किया. बढ़ती मांग को देखते हुए जर्मन प्रकाशक ने 2018 में ‘अंगोर’ का पुनर्प्रकाशन किया है.
जर्मनी के 12 शहरों में एकल कविता पाठ : 2016 में जर्मनी के 12 शहरों में उनकी एकल कविता पाठ का कार्यक्रम रखा गया. जर्मनी के बड़े और सबसे पुराने चार यूनिवर्सिटी हाइडलबर्ग यूनिवर्सिटी, एरफर्ट यूनिवर्सिटी, गोटिंगन यूनिवर्सिटी व बॉन यूनिवर्सिटी के विद्यार्थियों के बीच कविता पाठ और उनके साथ संवाद किया. जर्मनी के पूर्वी हिस्से में स्थित एरफर्ट यूनिवर्सिटी की अपनी विशेष पहचान है. वहां धार्मिक पुनर्जागरण आंदोलन की शुरूआत करने वाले मार्टिन लूथर ने अध्ययन किया था और लंबे समय तक रहे थे.
कई भाषाओं में अनुवाद, कई में काम जारी
2017 में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, दिल्ली ने उनकी कविता ‘बांध से बंधी धान की बालियां’ का इंग्लिश अनुवाद की पंक्तियां ‘हार्मनी’ नामक पुस्तक में शामिल किया. ‘पहाड़ी बांसों का रहस्य’ कविता का इंग्लिश अनुवाद Walking BookFairs द्वारा 100 poems are not enough के नाम से प्रकाशित होने वाले देश-विदेश के कवियों की कविताओं के संग्रह में शामिल किया गया है. भारत व पाकिस्तान में उनके पहले संग्रह पर अलग-अलग भाषाओं में अनुवाद का काम चल रहा है. देश में संथाली, तमिल व पंजाबी और पाकिस्तान में उर्दू में अनुवाद हो रहा है.
अ​मेरिका, रूस, ऑस्ट्रेलिया व जर्मनी के कुछ शोधार्थियों ने उनकी ​कविताओं को आधार बनाया है. वहीं, गुजराती, मराठी, असमिया, पंजाबी, कन्नड़ आदि भाषाओं में उनकी अनूदित कविताएं अपने- अपने क्षेत्र की पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.
स्विटजरलैंड में परिचर्चा, इटली में लोकार्पण, 22 को हो रही हैं रवाना : इस साल जसिंता केरकट्टा के पहले संग्रह ‘अंगोर’ पर स्विटजरलैंड में आयोजित सेमिनार में परिचर्चा होगी. इसी साल इतालवी भाषा में अनुवादित ‘हिंदी- इतालवी’ कविता-संग्रह का लोकार्पण इटली बुक फेयर में किया जाएगा. इतालवी अनुवाद तुरीनो यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर एलेक्जेंड्रा ने किया है.
जसिंता वेनिस, मिलान, तुरीन व रोम में अपनी कविताओं का पाठ करेंगी और वहां के लोगों से संवाद करेंगी. वे ऑस्ट्रिया व जर्मनी के बर्लिन, म्यूनिख आदि शहरों में भी अपनी कविताओं के साथ लोगों से संवाद करेंगी. इन कार्यक्रमों के लिए वह 22 अप्रैल को रांची से रवाना हो रही हैं.
जड़ों की जमीन’ की कुछ कविताएं
परवाह
मां
एक बोझा लकड़ी के लिए
क्यों दिन-भर जंगल छानती,
पहाड़ लांघती
देर शाम घर लौटती हो?
मां कहती है –
जंगल छानती
पहाड़ लांघती
दिन-भर भटकती हूं
सिर्फ सूखी लकड़ियों के लिए.
कहीं काट न दूं कोई जिंदा पेड़ .
जनहित में
मेरा पालतू कुत्ता
सिर्फ इसलिए मारा गया
क्योंकि खतरा देख वह भौंका था.
मारने से पहले उन्होंने
उसे घोषित किया पागल
और मुझे नक्सल …
जनहित में .
मां ने जमीन गिरवी रख सात हजार रुपये देकर भेजा था रांची
अशांत पारिवारिक माहौल के कारण मां ने जमीन गिरवी रख उसके हाथों में सात हजार रुपये थमा कर रांची भेज दिया था. रांची आने पर संत जेवियर्स कॉलेज में मास कम्युनिकेशन में स्नातक कोर्स की फीस के लिए घूम-घूम कर लोगों से पैसे मांगे. रहने-खाने के खर्च के लिए पुरुलिया रोड के आस-पास के कान्वेंट्स में अग्निशमन यंत्र बेचे.
अपर बाजार में सेक्यिूरिटी गार्ड कंसल्टेंसी सेंटर में काम भी किया. ढाई हजार रुपये प्रतिमाह पर एक स्थानीय टीवी चैनल में काम किया, जहां तीन महीने तक पैसा न मिलने पर अपनी दो बहनों के साथ कई रात भूखे पेट गुजारी. एक स्थानीय अखबार में बतौर पत्रकार काम करते हुए अपनी बहनों को उच्च शिक्षा दिलाने में अपना योगदान दिया़
उपलब्धियां
2014 में उन्हें एआईपीपी थाईलैंड ने इंडिजिनस वॉयस ऑफ एशिया का रिकॉग्निशन अवार्ड, झारखंड इंडिजिनस पीपुल्स फोरम और छोटानागपुर सांस्कृतिक संघ की ओर से प्रेरणा सम्मान से नवाजा गया.
2015 में रविशंकर उपाध्याय स्मृति युवा कविता पुरस्कार मिला. वर्ष 2017 में प्रभात खबर ने अपराजिता अवार्ड दिया. 2017 में ‘ इनिशिएटिव्स ऑफ चेंज ‘ मुंबई द्वारा झारखंड के टॉप ब्यूरोक्रेट्स के लिए आयोजित कार्यशाला में अपनी बात रखी़ इसमें पूर्व राज्यपाल प्रभात कुमार भी शामिल हुए़ उसी साल इस संस्था के सहयोग से उत्तरप्रदेश के महिला व बाल कल्याण विभाग द्वारा बाल सुधार गृह और महिला शरणालय विभाग में पदस्थापित अधिकारियों के लिए आयोजित कार्यशाला को संबोधित किया़
इस वर्ष मुुंबई में आयोजित ‘गेटवे लिटफेस्ट’ में शामिल होने वाली झारखंड की एकम़ात्र प्रति​निधि​ थीं. इस लिटफेस्ट में कला, साहित्य, थिएटर व फिल्म क्षेत्र से जुड़ी देशभर की चुनिंदा महिलाएं शामिल हुईं.
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