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जमींदारी के जुल्म का वह कारुणिक गीत

Updated at : 13 Apr 2018 9:29 AM (IST)
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जमींदारी के जुल्म का वह कारुणिक गीत

II पारस नाथ सिन्हा II मेरे स्वर्गीय चाचा जी 1960-65 के वर्षों में हुसैनाबाद से लगभग 20 किलोमीटर दक्षिण के जंगलों में स्थित कसियाड के छोटे से गांव में रहते थे. गांव में परहिया आदिवासियों के 20-22 घर थे और एक भंडार जो भूतपूर्व जमींदार का था, जिसमे मेरे स्वर्गीय चाचा जी बराहिल की हैसियत […]

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II पारस नाथ सिन्हा II
मेरे स्वर्गीय चाचा जी 1960-65 के वर्षों में हुसैनाबाद से लगभग 20 किलोमीटर दक्षिण के जंगलों में स्थित कसियाड के छोटे से गांव में रहते थे. गांव में परहिया आदिवासियों के 20-22 घर थे और एक भंडार जो भूतपूर्व जमींदार का था, जिसमे मेरे स्वर्गीय चाचा जी बराहिल की हैसियत से रहते थे और जमींदार के बचे खुचे जमीनों एवं उसकी खेती की देखभाल करते थे.
मैं भी कॉलेज के गर्मी अवकाश में उन्हीं के साथ रहता था और केंदु पत्ती के ठेकेदार की ओर से पत्तियां तोड़वाता, सुखवाताऔर पोला बना बना कर गिनती से बोरों में सीलबंद करवा कर भंडारण करवा देता था. इसके एवज में ठेकेदार से मुझे डेढ़ महीने की मजदूरी 45 रुपये मिलते थे जिससे मैं कॉलेज में अगले वर्ष का एडमिशन ले लेता था.
बैशाख जेठ की तपती या चिलचिलाती दुपहरी में भी परहिया जिन्हें बैगा भी कहा जाता था के वृद्ध, युवा, बच्चे स्त्री पुरुष सभी दिन भर भूखे प्यासे जंगल पहाड़ों के इस पेड़ से उस पेड़ तक चक्कर लगाते रहते थे और केंदु पत्तों को तोड़ तोड़ कर टोकरी, थैले, आंचल में सहेज-सहेज कर रखते जाते थे. ईमानदारी इतनी कि मजाल नहीं कि उसमें दूसरे पत्ते धोखा देने की नीयत से मिला दें. दो-तीन दिन मुश्किल से मैं उनलोगों के साथ घने वनों के बीच में रह पाया. वहां न तो कुछ खाने को था न कुछ पीने को.
सभी नदी जलाशय तो सूखे रहते थे. तड़के सुबह वे जंगलों में कुछ खा-पीकर निकल जाते थे. बारह-एक बजते-बजते भूख प्यास से मैं अधमरा-सा हो जाता तो उसमें से कोई मुझे घर तक छोड़ आता था. रजनी बैगा, बनारसी बैगा, भूखन बैगा, गोहर बैगा, गोआली बैगा सभी बड़े संजीदा इंसान थे. घर पहुंचते के साथ अपने घर से दौड़ कर गुड़, पानी, मट्ठा लाकर मुझे खिलाते पिलाते और मेरे स्थिर होते के साथ नंगे पांव सीधे जंगल पहाड़ की ओर निकल जाते.
एक पूरा परिवार मुश्किल से दिन भर में एक रुपया कमा पाता था. यही उनका लक्ष्य भी रहता था. इन्हीं दिनों में वे चावल या रोटी खा पाते थे. बाकी के दिनों में तो वे लोग खनेया या गेठी खा कर रहा करते थे. गेठी एक पेड़ का जड़ था, जिसे वे रात भर पानी के बहाव में डाल कर छोड़ते थे. तब जाकर उसका कसैलापन हटता था. वरना वह नीम से भी ज्यादा कसैला होता था. इसके बाद भी खाने में कोई स्वाद नहीं मिलता था. बच्चे तो जाड़ा, गर्मी, बरसात नंगे ही रहते थे. स्त्रियों के पास पर्याप्त कपड़े न होते थे. पुरुष प्रायः अधनंगे रहते थे. वनरक्षी की नजर बचा कर यदि एकाध पेड़ की डाली से कोई सामान बाजार में बेच पाए तो उसी से उनका कपड़ा वगैरह कुछ खरीदा जाता था. यही उनकी जिंदगी थी.
एक शाम अंधेरे में कुछ युवक मिल कर अत्यंत राग से गा रहे थे – “साग पात खा के पोसली प्राण, बाछा बेच के देली डांड, नहीं माने मुंशी, देवान ओ ओ ओ ओ ओ ओ…..
सुनते-सुनते मैं रोने लगा.
(लेखक सेवानिवृत्त वाणिज्य-कर उपायुक्त, झारखंड सरकार हैं.)
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