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थायरॉइड डिसऑर्डर के सूक्ष्म लक्षणों की न करें अनदेखी....जानें इसके बारे में

Updated at : 27 Mar 2018 6:46 AM (IST)
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थायरॉइड डिसऑर्डर के सूक्ष्म लक्षणों की न करें अनदेखी....जानें इसके बारे में

एस्ट्रोजन और टेस्टोस्टेरॉन हमारे शरीर के प्रमुख सेक्स हार्मोंस हैं, जिनमें होनेवाली किसी भी गड़बड़ी को लोग तुरंत गंभीरता से लेते हैं.लेकिन शरीर में थायरॉइड हार्मोन के स्तर में गड़बड़ी को प्राय: अनदेखा करते हैं, जिससे अत्यधिक थकान, अवसाद, अनियंत्रित वजन और नींद की समस्याएं जैसे थायरॉयड विकार के लक्षण सामने आते हैं. आज के […]

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एस्ट्रोजन और टेस्टोस्टेरॉन हमारे शरीर के प्रमुख सेक्स हार्मोंस हैं, जिनमें होनेवाली किसी भी गड़बड़ी को लोग तुरंत गंभीरता से लेते हैं.लेकिन शरीर में थायरॉइड हार्मोन के स्तर में गड़बड़ी को प्राय: अनदेखा करते हैं, जिससे अत्यधिक थकान, अवसाद, अनियंत्रित वजन और नींद की समस्याएं जैसे थायरॉयड विकार के लक्षण सामने आते हैं.
आज के समय में ये कॉमन इंडोक्रिनिक डिसऑर्डर बनते जा रहे हैं. थायरॉइड हार्मोन के स्तर में होनेवाले बदलावों का प्रभाव हमारे पूरे शरीर की कार्यात्मक क्षमता पर पड़ता है, जिसके लक्षणों को पहचानने में कई बार काफी वक्त लग जाता है. जाहिर तौर पर रोग की सही पहचान न हो, तो रोगी को सही उपचार भी नहीं मिल पाता.
विशेषज्ञों की मानें तो थायरॉइड से संबंधित बीमारी से ग्रस्त 40 से 60 प्रतिशत लोगों को इसके बारे में पता ही नहीं होता. थायरॉइड ग्लैंड हमारे गले में कंठनली के पीछे अवस्थित होती है, जिसका कार्य शरीर में मेटाबॉलिज्म यानी ऊर्जा का सही संचालन करना है. यह हमारे दिल, दिमाग, आंतों और स्किन को सही तरीके से कार्य करने में मदद करता है, साथ ही शरीर के तापमान को भी संतुलित बनाये रखता है.
थायरॉइड यह कार्य थायरॉक्सिन हार्मोन की मदद से करता है. इस हार्मोन के स्तर में होनेवाला जरा-सा भी बदलाव हमारे स्वास्थ्य को तुरंत प्रभावित करता है. इससे दो तरह की स्थितियां उत्पन्न होती हैं –
हाइपोथायरॉइडिज्म
थायरॉइड हारमोन का स्तर शरीर में सामान्य से कम रहने की स्थिति हाइपोथायरॉइडिज्म कहलाती है. यानि शरीर कम कम ऊर्जा उत्पन्न करता है और हमारा मेटाबॉलिज्म धीमा हो जाता है. अक्सर जांच में इसका पता नहीं चल पाता. इसके लक्षण को कई बार कोई अन्य बीमारी या बढ़ती उम्र के लक्षण मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता है.
75 से अधिक उम्र के लगभग 20% लोगों में, जिनमें ज्यादातर संख्या महिलाओं की है, थायरॉइड हारमोन का स्तर सामान्य से कम होता है. इस उम्र वर्ग के लोगों में इसके लक्षण मानसिक भ्रम, असमय बाल सफेद होना-झड़ना, डिप्रेशन, चीजों को याद न रख पाना आदि के रूप में सामने आते हैं. लेकिन कई बार इसे भूलवश डिमेंशिया का लक्षण भी समझ लिया जाता है.
हाइपरथायरॉइडिज्म
जांच का सही तरीका
थायरॉइड ग्लैंड थायरॉक्सिन(टी-4) और ट्राइआयोडोथायोरीन (टी-3) खुद प्रोड्यूस करता है. थायरॉइड ग्लैंड ठीक से काम करता रहे, इसके लिए पिट्यूटरी ग्लैंड थायरॉइड स्टिम्युलेटिंग हारमोन जिसे थाइरोट्रोपिन कहते हैं, प्रोड्यूस करती है. थायरॉइड फंक्शन जांच में इन तीनों की जांच जरूरी है.
खून में थायरॉइड का स्तर सामान्य हो, तो भी थायरोट्रोपिन का सामान्य से कम या ज्यादा स्त्राव स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं पैदा कर सकती है. इस हार्मोन का कम स्त्राव फ्रैक्चर के खतरे बढ़ाता है, वहीं अधिक स्त्राव से किशोरों और वयस्कों में हार्ट स्ट्रोक का खतरा बढ़ता है. अत: मुख्यत: TSH, T4, थायरॉइड अल्ट्रासाउंड, थायरॉइड स्कैन जरूर कराएं.
32% भारतीय थायरॉइड संबंधी रोग से हैं ग्रसित
5 से 8 गुना पुरुषों के मुकाबले महिलाओं को है ज्यादा खतरा
10 में से 1 भारतीय को है हाइपोथायरॉइडिज्म का खतरा
एक तिहाई हाइपोथायरॉइड के मरीजों को नहीं होता रोग का पता
75 से अधिक की उम्र के 20% लोगों में थायरॉइड हार्मोन का स्तर होता है सामान्य से कम
सही इलाज व जीवनशैली में सुधार जरूरी
डॉक्टर मनोज कुमार सिन्हा
मेडिकल सुपरिनटेंडेंट, इंडोक्रिनोलॉजिस्ट
न्यू गार्डिनर रोड हॉस्पिटल पटना
थायरॉइड ग्लैंड में होनेवाली समस्याओं को पूरी तरह ठीक नहीं किया जा सकता, लेकिन उचित इलाज और सही लाइफस्टाइल से इससे संबंधित समस्याओं को काफी हद तक मैनेज जरूर किया जा सकता है.
थायरॉइड हार्मोन के संतुलित स्त्राव के लिए डायट में आयोडीन युक्त चीजों को शामिल करना जरूरी है. जरूरी है कि भोजन में आयोडीन युक्त नमक का इस्तेमाल हो. अंडा, सी फूड, अनपाश्चराइज्ड डेयरी प्रोडक्ट्स में भी आयोडीन पाया जाता है. महिलाओं में हाइपोथायराइडिज्म की समस्या ज्यादा देखने को मिलती है. इससे उनके शरीर में सूजन, उल्टी, कब्ज, काम में मन न लगना जैसी समस्याएं होती हैं.
नियमित रूप से व्यायाम, वजन पर नियंत्रण और हेल्दी लाइफस्टाइल द्वारा भी शरीर में इस हारमोन के संतुलन को बनाये रखने में मदद मिलती है. हार्ट पेशेंट के केस में ज्यादा सावधानी की जरूरत होती है, क्योंकि उन्हें दी जानेवाली दवाएं थायरॉइड हार्मोन के स्त्राव को प्रभावित करती हैं, अतः इसी हिसाब से दवाओं के डोज का निर्धारण किया जाता है.
बातचीत : पूजा कुमारी
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