स्मृतियों में फादर पीटर पॉल एक्का
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :16 Mar 2018 7:34 AM (IST)
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II महादेव टोप्पो II पिछले करीब पांच वर्षों से रांची में लगातार रहना हो रहा है और कुछ साहित्यिक कार्यक्रमों में अनेक लोगों से मुलाकात होती रही है. उनमें कई नाम ऐसे थे जिनके नाम और काम से परिचित तो था लेकिन, उनसे कभी मिलने का अवसर नहीं मिला था. ऐसा ही एक रचनाकार थे- […]
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II महादेव टोप्पो II
पिछले करीब पांच वर्षों से रांची में लगातार रहना हो रहा है और कुछ साहित्यिक कार्यक्रमों में अनेक लोगों से मुलाकात होती रही है. उनमें कई नाम ऐसे थे जिनके नाम और काम से परिचित तो था लेकिन, उनसे कभी मिलने का अवसर नहीं मिला था.
ऐसा ही एक रचनाकार थे- फादर पीटर पॉल एक्का. कुछ कार्यक्रमों में मुलाकात हुई, बात-चीत हुई, फोन नंबर का आदान प्रदान हुआ और बीचबीच में कभी-कभी फोन पर भी बात-चीत होने लगी.
अस्सी के आसपास उनकी कहानियां चर्चा का विषय थीं और मेरे कई दोस्त उनकी कहानियों के प्रशंसक थे. कभी निष्कलंका में उनकी कहानियां मित्रों के घरों पर देखने को मिल जाती थी.
आदिवासियों द्वारा लिखी किताबों देखने को मैं अब भी ललचता रहता हूं. अतः, उनकी किताबें या अन्य लेखकों की किताबें खरीदता रहा. लेकिन, कहानियां छोटी होने के बावजूद कम ही पढ़ पाया. उनकी किताबों के शीर्षक मुझे आज भी बेहद अच्छे लगते हैं – जंगल के गीत, राजकुमारों के देश में या क्षितिज की तलाश में आदि. ऐसा लगता है जंगल से मोह न फादर पीटर छोड़ सके, न मैं, न हमउम्र रचनाकार. अपने कविता-संग्रह में जंगल या पहाड़ जुड़े शब्द के वगैर मैं शीर्षक की कल्पना मेरे लिए असंभव था. उसी तरह शायद फादर पीटर पॉल एक्का के लिए भी ऐसा ही कुछ था. वे मुझसे एक साल बड़े थे और ऐसा लगता है मेरी उम्र के लोगों का जंगल से जुड़ाव कुछ अधिक रहा होगा.
उनकी कहानियों में जंगल से जुड़ी गतिविधियों का भी वर्णन है. जहां उनके कहानी संग्रह का नाम जंगल के गीत है तो मेरे कविता संग्रह का जंगल पहाड़ के पाठ एक और भी संयोग कि वाल्टर भेंगरा तरूण के कहानी संग्रह का नाम है जंगल की ललकार. अपने लेखन-कर्म में मैं भी जंगल के बारे कुछ कहने मुक्त नहीं हो सका जैसाकि मेरे अग्रज रचनाकार.
जब मैंने उन्हें अपनी कविता संग्रह जंगल पहाड़ के पाठ फादर पीटर पॉलजी को भेंट की, उसके बाद उनसे फोन पर भी बातें होने लगीं. किताब पढ़कर फोन पर प्रतिक्रिया देनेवाले वाले वे पहले व्यक्ति थे. कुछ महीनों पहले उनका फोन आया और उन्होंने बताया वे अब तेजपुर, असम में हैं.
मैंने कहा असम आऊंगा तो आपसे भी अवश्य मिलूंगा. एक दिन फोन आया उन्होंने पूछा और क्या कर रहे हैं? मैंने बताया कि लेखों के संग्रह को अंतिम रूप दे रहा हूं. छपने पर एक प्रति मेरे लिए रख देना- उन्होंने कहा. मैंने पूछा –उन दिनों आप क्या लिख रहे हैं? तो उन्होंने उत्साह से बताया कि- वे इन दिनों लंबी कविता लिख रहे हैं. मुझे खुशी हुई कि एक रचनाकार एक दूसरी विधा में हाथ आजमा रहा है.
कुछ नया पढ़ने को मिलेगा. फिर उन्होंने वागर्थ नवंबर 17 में प्रकाशित मेरी कविता और कुछ कवियों के प्रकाशित कविताओं के बारे पूछा और विस्तार से बताने पर वागर्थ की एक प्रति रख देने के लिए आग्रह किया. मैंने उनकी प्रति रख दी कि जब वे आयेंगे तो दे दूंगा. लेकिन परसों खबर मिली फादर पीटर पॉलएक्का नहीं रहे. विश्वास नहीं हुआ.अतः मित्रों को फोन किया. उन्होंने कहा- खबर सच है.
पिछले कुछ दिनों से वीर भारत तलवार जी से झारखंड के रचनाकारों के बारे लगातार बात-चीत हो रही थी. उन्होंने कहा कि वे रांची आने पर कुछ बात करेंगे. कल जब वीर भारत तलवार से होटल में मुलाकात हुई तो उन्हें फादर के बारे सूचित किया. वे बेहद दुखी हुए और कहा- अब कैसे होगा? हम उन्हें ही सम्मानित करना चाह रहे थे.
फादर पीटर पॉल एक जेसुइट होकर भी अपनी कहानियों में आदिवासी जीवन की अच्छाइयों एवं संघर्ष को एक आदिवासी की तरह देखने, खोजने का प्रयास करते रहे. इसीलिए प्रसिद्ध युवा कवि अनुज लुगुन ने फेसबुक में श्रद्धांजलि देते हुए लिखा –“उन्होंने अपनी रचनाओं में आदिवासी जीवन दर्शन को उसकी सहजीविता के साथ अभिव्यक्त किया.
उसके यथार्थ को समग्रता में अभिव्यक्त किया न कि धार्मिक परछाई में. दरअसल यही आदिवासियत है.” आगे इन्होंने लिखा – “ एक रचनाकार के रूप में एक्का जी मनुष्य होने के अर्थ को आधुनिक पूंजीवादी दुनिया में उसके संक्रमण को और सांस्कृतिक आवाजाही को सटीक रूप से अभिव्यक्त करते हैं.”
जीवन की विडंबना क्या है? समझना कठिन है कि जिसने हमें जो देना था अपनी रचनाओं के माध्यम से दे दिया. लेकिन, जब हमने उन्हें कुछ देना चाहा तो दे न सके.
शायद इसी का नाम दुनिया है या यही जीवन है. लेकिन, देखना यह कि वे जो ‘परती जमीन’ छोड़ जा रहे हैं उस पर भविष्य में हमारे ‘युवा शब्द-किसान (युवा लेखक)’ और कितनी फसल उगायेंगे? कितने छटका और मोरा भरेंगे? इसे भरना और परती जमीन में बेहतर लेखन से साहित्य की पुष्ट फसल उगाना हमारा, उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी. आशा है, नयी पीढ़ी यह चुनौती स्वीकार करेगी.
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