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उड़त गुलाल लाल भए बादर, जोगीरा सा रा रा... रा

Updated at : 01 Mar 2018 7:14 AM (IST)
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उड़त गुलाल लाल भए बादर, जोगीरा सा रा रा... रा

आनंद और खुशी से सराबोर होली के बारे में नजीर अकबराबादी कहते हैं- तरब है, ऐश है, चुहलें हैं, रंग रलियां हैं/ अजब ‘नजीर’ है फरखुंदा हाल होली का. पद्माकर की मानें, तो ‘आई खेलि होरी, कहूं नवल किसोरी भोरी/ बोरी गयी रंगन सुगंधन झकोरै है.’ रंगों में एक रंग मोहब्बत का भी है. हरिवंश […]

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आनंद और खुशी से सराबोर होली के बारे में नजीर अकबराबादी कहते हैं- तरब है, ऐश है, चुहलें हैं, रंग रलियां हैं/ अजब ‘नजीर’ है फरखुंदा हाल होली का. पद्माकर की मानें, तो ‘आई खेलि होरी, कहूं नवल किसोरी भोरी/ बोरी गयी रंगन सुगंधन झकोरै है.’ रंगों में एक रंग मोहब्बत का भी है.
हरिवंश राय ‘बच्चन’ रेखांकित करते हैं- ‘तुम अपने रंग में रंग लो तो होली है.’ शायर अजहर इकबाल फरियाद करते हैं- ‘कहीं अबीर की खुशबू कहीं गुलाल का रंग/ कहीं पर शर्म से सिमटे हुए जमाल का रंग/ चले भी आओ भुला कर सभी गिले शिकवे/ बरसना चाहिए होली के दिन विसाल का रंग.’ होली की अशेष शुभकामनाओं के साथ यह प्रस्तुति…
उल्लास का रंग लिये हुए हर बरस होली हमें अपने परिजनों से कुछ अधिक आत्मीय बनाने के लिए चली आती है. रंग, उमंग और आनंद से भरी हुई होली… बसंत, फाग और होली के बहाने हम एक बार उन परंपराओं को याद कर सकते हैं, जिनकी उपस्थिति हमारे समाज में लगभग एक संस्कृति की तरह हजारों सालों से मौजूद रही है.
यह होना इस बात की गवाही है कि हमने इन परंपराओं की वजह से कितना जीवंत, लोक-लुभावन, आत्मीय और महत्वपूर्ण समय जिया है. बसंत पंचमी से लेकर फाग खेलने के दिन तक, हम जिस किसी से भी मिलते हैं, उसके रंग में स्वयं को या कि उसके द्वारा डाले गये गुलाल को स्वयं पर आरोपित करके एकरंगी हो जाते हैं…
बृज में ‘ए जी कोई भलो-बुरो मत मानो/ रंगन रंग होरी होली है’ कह कर गुलाल डाला जाता है.होली इस अर्थ में एक धरातल पर निभनेवाली ऐसी सांस्कृतिक अभिव्यक्ति भी है, जिसमें लोक जीवन, रसोई के व्यंजन, आपसी रिश्तों की हास-परिहास वाली मर्यादा के साथ संगीत, नृत्य और कलाओं को भी एक उमंग भरा मंच मिलता है. यह देखना गौरवपूर्ण है कि हमारी संस्कृति, होलिका के बहाने बीत रहे संवत्सर की जो चिता जलाती है, उसमें इस आशय का बीज छुपा होता है कि इस मौके पर अपना अहंकार हमें इस अग्नि में डालना है और उसमें तपकर कुंदन की भांति इस कदर निकलना है, जिस पर कोई भी बड़ी आसानी से अपने प्रेम का रंग चढ़ा सके.
शायद इसी कारण सूफियों के यहां भी होली का उल्लास बरकरार रहा है. सफेद की सादगी में लिपटा हुआ सूफियों का समाज भी होली की केसरिया और बसंती आभा से अपने को बचा नहीं सका. कहते हैं पहली बार हजरत निजामुद्दीन औलिया पर अमीर खुसरो ने पीले फूलों का रंग डाला और गाया- ‘हजरत ख्वाजा संग खेलिये धमाल.’ तभी से इस परंपरा की सर्वाधिक प्रसिद्ध कव्वाली भी होली की ही मशहूर हुई, जिसके अमर बोल हैं- ‘आज रंग है हे मां, रंगा है दिन.’ ये कौन भूल सकता है कि ‘गीत-गोविंद’, ‘अभिज्ञान शाकुंतलम्’ और ‘नन्दिकेश्वर’ जैसे गौरव ग्रंथ हों या कथक, भरतनाट्यम, मणिपुरी और कुचिपुड़ी जैसे शास्त्रीय नृत्य, संगीत की अनुपम परंपरा में मौजूद ध्रुपद, धमार, ठुमरी एवं चैती का पारंपरिक गायन हो या पीलू, बसंत, काफी, सिंदूरा, परज एवं पटमंजरी जैसे रागों की अभिनव अदायगी में लिपटी हुई बंदिशें- हर जगह पूरी उत्फुल्लता के साथ होली मौजूद है.
इसी के साथ रूपंकर अभिव्यक्तियों में भी होली को ही सर्वाधिक प्रतिष्ठा मिली, जिसमें मुगल, कांगडा, बसोहली, बूंदी और कान्हेरी शैली के चित्रों में भी रंगों का त्यौहार खूब चटक होकर उतरा. भक्तिकाल के ढेरों संत-कवियों और निर्गुणियों की पदावलियां हों या बिसरा दी गयी बाईयों की महफिलों में इस मौके पर गायी जाने वाली ढफ की ठुमरी- ‘भिजोयी मोरी चूनरी हो नंदलाला’- होली के बिना, निगुर्णियों का इकतारा, महफिलें और घरों के आंगन, हाट-बाजार सभी सूने हैं.
होली को अयोध्या के बहाने यदि देखें या एक हद तक अवध की धरती को उसमें शामिल करते हुए उसके एक बड़े परिदृश्य का आकलन करें, तो हम पायेंगे कि इस रंग-पर्व की बहुरंगी पृष्ठभूमि भी कहीं न कहीं समन्वय की धरती में रूपायित होती रही है. जहां अयोध्या में रसिक भक्तों के अतिरिक्त कृष्ण की अनन्य उपासिका सूफी दरवेश बड़ी बुआ साहिबा और रीतिमुक्त शृंगार कवि द्विजदेव ने होली के ढेरों बधाई पद लिखे थे, वहीं सुदूर बृज क्षेत्र में राधा-कृष्ण की मशहूर शृंगारिक होली को सिर्फ अष्टछाप के कवियों या वल्लभाचार्य ने ही उपकृत नहीं किया, वरन् उसमें बनी-ठनी जैसी साधिका, स्वामी हरिदास जैसा गवैया एवं मुस्लिम कवयित्री ताज भी शामिल थे. यह होली की ही विशिष्टता है कि राम, कृष्ण और शिव- तीनों के ही शहर अपने-अपने ढंग से नगरवासियों को इस पर्व पर समरस करते रहे हैं.
जहां अयोध्या में यह परंपरा रसिकों की महान भक्ति परंपरा में नया अध्याय जोड़ती है, जब अवधपुर की फागें, उलारा और डेढ़ ताल की बंदिशें अयोध्या के मठ-मंदिरों को सराबोर रंगों की ही तरह गुंजा देती हैं. दूसरी ओर मथुरा और वृंदावन पर होली का रंग उनके आराध्य कृष्ण की प्रिया राधा के मायके के गांव बरसाना के मार्फत चढ़ता है, जब कृष्ण के ग्वाल-बाल एवं मित्र-हितैषी गोचारण के साथ लठमार होली खेलते हैं.
हर तरफ अबीर और गुलाल की गोलों और पिचकारी के रंगों के बीच ‘होली खेलन आयो श्याम आज याहे रंग में बोरो री’ चारो तरफ सुनायी पड़ता है.
इन सबसे अलग शिव की होली, एकदम अवधूत की होली होती है- बिल्कुल बनारसी अंदाज में भांग, धतूरा, पान चबाये- जोगीरा सा रा रा रा की धुन पर. कहने का अर्थ यह है कि होली का अनुष्ठान एक ओर शैव-वैष्णव के समरस भाव का उद्यम है, एक ओर वह मदन-दहन का पर्व है, जिसमें सरयू और यमुना के तट पर होरी मचती है, तो अयोध्या में ‘ऐ री दोनों राजदुलारे होरी खेलत सरजू तीर’ गाते हुए रामभक्ति परंपरा अपना आनंद लुटाती है, तो दूसरी ओर यमुना के तट पर ‘आज बिरज में होरी है रे रसिया’ से लेकर ‘रसिया को नारी बनाऊंगी, रसिया को’ जैसे मधुर गीतों का कोरस कुंज गलियों में गूंजता है.
कवि मित्र आशुतोष दुबे की बात को यदि होली के संदर्भ में देखें, तो कहना होगा कि हमारी होली दरअसल ‘बरजोरी, मरोरी, भीजी, चोली, कलाईयां, पिचकारी, नयन, बलम, दईया, हाय, रंग, भंग, कसक-मसक, उई, हट, चूनर और श्याम व राधा’ जैसे शब्दों के बीच मनती है. आधुनिक संदर्भों में होली, वर्तमान व्यवस्था को लताड़ लगाती हुई थोड़ी विनोदप्रियता के रंग में कबीरा गाने की होती है, जिसमें हर एक को आमोद की गाली की बौछार में भीगना ही पड़ता है.
यही संस्कृति का सबसे सुंदर अर्थ है कि अगर जीवन है, उसकी आपाधापी और उससे उपजी ऊब और थकान है, तो बसंत या फाग या होली के बहाने अपना कलुष धोने और थोड़ी देर मर्यादा की स्वायत्तता के भीतर आनंद-उमंग की व्यवस्था के साथ समरस हो लें. इस समरसता को हम कई बार रंगों, कबीरी चुहल और भंग-ठंढई की मस्ती में रूपायित करते हैं.
अपने ऊहापोहों और अनजाने दबावों से बाहर आने और एकबारगी उन्हें उत्साह से ढहा देने का सबसे लोक कल्याणकारी पक्ष भी शायद यही है, जिसकी सीख हर बार फागुन में हमें मिलती है. हालांकि आधुनिक समय में यह सारी परंपरायें सिर्फ याद करने के लिए ही बची हैं, जिनका हम बड़ी आसानी से अब वर्चुअल संसार के फेसबुक, ट्विटर, व्हॉट्सएप और इंस्टाग्राम जैसे माध्यमों में उपयोग करते हुए होली मनाकर खुश हो लेते हैं. वास्तविक संसार में रंग खेलना और इन परम्पराओं को जीना हमने लगभग भुला ही दिया है. यह स्थिति अब महानगरों तक ही सीमित नहीं रही, बल्कि छोटे शहरों में भी इसने हमारे उज्ज्वल पर्वों के रंगों को फीका करना शुरू कर दिया है.
विदेशों में होली सरीखे आयोजन
दक्षिण कोरिया में मड फेस्टिवल
दक्षिण कोरिया में होली की तरह ही मड फेस्टीवल मनाया जाता है, जिसमें कीचड़ से होली खेली जाती है. इस समय वहां विदेशी पर्यटक भी बड़ी संख्या में पहुंचते हैं. त्वचा को सुंदर बनाने के लिए यह आयोजन किया जाता है. इस दौरान महिलाएं भी कीचड़ में होने वाली कुश्ती में पूरे उत्साह से हिस्सा लेती हैं.
ऑस्ट्रेलिया का चिनचिला
ऑस्ट्रेलिया में एक खास पर्व के दौरान लोग तरबूजों को जूतों की तरह पहन कर लोग दौड़ते हैं. तरबूज को फेंकने का खेल भी होता है.
पोलैंड का अर्सीना पर्व
पोलैंड में होली की तरह अर्सीना नामक त्यौहार आयोजित किया जाता है. इस मौके पर लोग एक दूसरे पर रंग डालते हैं और गले मिलते हैं.
जर्मनी में वाशरश्चैल्ट
जर्मनी में गर्मी के समय होली की तरह ही पानी फेंक कर व्यापक लड़ाई की जाती है. हालांकि, अब इसमें लोग फल, अंडे और अन्य चीजों को भी शामिल कर रहे हैं.
स्पेन के ग्रैनाडा में कैस्कामोरास
स्पेन के ग्रैनाडा में वहां के निवासी हाेली की तरह ही खास त्यौहार मनाते हैं. यह मुख्य रूप से काले पेंट से खेला जाता है. लोग अपने प्रेमी-प्रेमिका को काले पेंट से पोत देते हैं.
स्पेन में टमाटर के रंग
स्पेन में टमाटीनो पर्व में देखने को मिलती है. यह अगस्त में मनाया जाता है. इसमें रंगों की जगह टमाटर का इस्तेमाल किया जाता है. लोग एक दूसरे पर टमाटर फेंककर हुड़दंग करते हैं.
अफ्रीका में होलिका दहन
अफ्रीका के कई देशों में आेमेना बोंगा नामक एक उत्सव मनाया जाता है, जिसमें होलिका की तरह ही एक जंगली देवता का जलाया जाता है.
थाईलैंड में पानी का रंग
थाईलैंड में सोंगकरन पर्व होली से बहुत मिलता-जुलता है. इसमें पानी का बहुत इस्तेमाल किया जाता है. तालाब के पास लोग एक दूसरे पर पानी फेंकते हैं.
इंगलैंड का ग्लोसेस्टशायर चीज रॉलिंग फेस्टिवल
इंगलैंड के ग्लोसेस्टशायर में एक खास तरह का आयोजन किया जाता है. इस दौरान एक पहाड़ी पर लोग जमा होते हैं.
न्यूजीलैंड में पेंटिंग
न्यूजीलैंड में एक अलग किस्म की परंपरा है, जिसमें लोग शरीर पर पेंटिंग बनाते हैं. दिनभर हुड़दंग के बाद के बाद रात में नाच-गाने का आयोजन किया जाता है. भारत में रंगों के पर्व होली से बहुत कुछ िमलता-जुलता है यह.
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