इन पांच नक्षत्रों के समूह को कहते हैं पंचक..जानें इनके बारे में
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :24 Feb 2018 6:10 AM (IST)
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मार्कण्डेय शारदेय (ज्योतिष व धर्मशास्त्र विशेषज्ञ) ज्योतिष के अंतर्गत कुंभ और मीन राशि के चंद्रमा के नक्षत्रों, अर्थात् धनिष्ठा के उत्तरार्द्ध, शतभिषा, पूर्वा भाद्रपदा, उत्तरा भाद्रपदा तथा रेवती- इन पांच नक्षत्रों के समूह को पंचक कहते हैं. इन पांचों नक्षत्रों में दक्षिण दिशा की यात्रा, खाट बुनना तथा घर की छज्जा, चांदनी लगाना, छज्जा के […]
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मार्कण्डेय शारदेय (ज्योतिष व धर्मशास्त्र विशेषज्ञ)
ज्योतिष के अंतर्गत कुंभ और मीन राशि के चंद्रमा के नक्षत्रों, अर्थात् धनिष्ठा के उत्तरार्द्ध, शतभिषा, पूर्वा भाद्रपदा, उत्तरा भाद्रपदा तथा रेवती- इन पांच नक्षत्रों के समूह को पंचक कहते हैं. इन पांचों नक्षत्रों में दक्षिण दिशा की यात्रा, खाट बुनना तथा घर की छज्जा, चांदनी लगाना, छज्जा के लिए वस्तु संग्रह व घर की लिपाई-पुताई (रंग-रोगन) विशेषतः वर्जित है. प्रेतदाह भी निषिद्ध है. इसीलिए मुहूर्त-चिंतामणि में कहा गया है-
‘प्रेतस्य दाहं यमदिग्गमं त्यजेत् शय्या-वितानं गृह-गोपनादि च’।
कहा गया है कि पंचक में तिनकों और काष्ठों के संग्रह से अग्निभय, चोरभय, रोगभय, राजभय एवं धनहानि संभव है-
‘अग्नि-चौरभयं रोगो राजपीडा धनक्षतिः।
संग्रहे तृण-काष्ठानां कृते वस्वादि-पंचके’।।
इन पांचों में जन्म-मरण को भी अच्छा नहीं माना गया है. आचार्यों के अनुसार धनिष्ठा से रेवती पर्यंत इन पांचों नक्षत्रों की क्रमशः पांच श्रेणियां हैं- ग्रामपंचक, कुलपंचक, रथ्यापंचक, गृहपंचक एवं ग्रामबाह्य पंचक.
ऐसी मान्यता है कि यदि धनिष्ठा में जन्म-मरण हो, तो उस गांव-नगर में पांच और जन्म-मरण होता है. शतभिषा में हो तो उसी कुल में, पूर्वा में हो तो उसी मुहल्ले-टोले में, उत्तरा में हो तो उसी घर में और रेवती में हो तो दूसरे गांव-नगर में पांच बच्चों का जन्म एवं पांच लोगों की मृत्यु संभव है. शास्त्र-कथन है –
‘धनिष्ठ-पंचकं ग्रामे शद्भिषा-कुलपंचकम्।
पूर्वाभाद्रपदा-रथ्याः चोत्तरा गृहपंचकम्।
रेवती ग्रामबाह्यं च एतत् पंचक-लक्षणम्’।।
मान्यता यह भी है कि किसी नक्षत्र में किसी एक के जन्म से घर आदि में पांच बच्चों का जन्म तथा किसी एक व्यक्ति की मृत्यु होने पर पांच लोगों की मृत्यु होती है. मरने का कोई समय नहीं होता. ऐसे में पांच लोगों का मरना कुछ हद तक संभव है, परंतु उत्तरा भाद्रपदा को गृहपंचक माना गया है और प्रश्न है कि किसी घर की पांच औरतें गर्भवती होंगी तभी तो पांच बच्चों का जन्म संभव है.
पंचक में मृत्यु सुनकर लोग काफी भयभीत हो जाते हैं. गरुडपुराण में भी पंचक-मरण को अशुभ बताकर उसके लिए शांति-विधान पर जोर दिया गया है. लोग पारिवारिक कल्याण के लिए शास्त्रानुसार मृतक के साथ पांच कुशनिर्मित पुत्तलों को जलाते हैं और दशकर्म के बाद विधिवत् जप, पूजा-पाठ भी कराते हैं.
जन्म और मरण क्रमशः उत्सव एवं विषाद के प्रतीक हैं. सृष्टि-प्रक्रिया में इन दोनों का मूल्य है.परंतु यह कथन अंधविश्वास की ओर ले जानेवाला है कि पंचक में जन्म-मरण और पांच का सूचक है. परंतु आभिप्रायिक अर्थ लें, तो अविश्वसनीय नहीं रह जाता. जन्म खुशी है और गृह आदि में विभक्त इन नक्षत्रों के तथाकथित फल पांच गृहादि में होनेवाले हैं, तो स्पष्ट है कि वहां विभिन्न प्रकार की खुशियां आ सकती हैं.
पांच मृत्युओं का अभिप्राय देखें तो पांच गृहादि में रोग, कष्ट, दुःख आदि का आगम हो सकता है. कारण व्यथा, दुःख, भय, लज्जा, रोग, शोक, अपमान तथा मरण- मृत्यु के ये आठ भेद हैं.
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