खोरठा भाषा के अग्रदूत थे श्रीनिवास पानुरी
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :09 Feb 2018 2:48 AM (IST)
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II धनंजय प्रसाद II श्री निवास पानूरी जी ने खोरठा साहित्य को समृद्ध करने के लिए अपने जीवन तक को न्योछावर कर दिया. उन्होंने दधीचि की तरह खोरठा की समृद्ध एवं विकास के लिए योगदान किया. एक समय में खोरठा भाषा को लोग नीच की भाषा कहा करते थे, वैसे समय में पानुरी जी ने […]
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II धनंजय प्रसाद II
श्री निवास पानूरी जी ने खोरठा साहित्य को समृद्ध करने के लिए अपने जीवन तक को न्योछावर कर दिया. उन्होंने दधीचि की तरह खोरठा की समृद्ध एवं विकास के लिए योगदान किया. एक समय में खोरठा भाषा को लोग नीच की भाषा कहा करते थे, वैसे समय में पानुरी जी ने अनवरत संघर्ष करके खोरठा को खड़ा करने का काम किया. आज खोरठा साहित्य की जो स्थिति है वो पानुरी जी की देन है.
पानुरी जी साहित्य के सफल साधक थे. आर्थिक तंगी के बाबजूद वे साहित्य साधना में अनवत लीन रहे. कभी मुफ्फसिली साहित्य साधना के आड़े नहीं आयी. वे धनबाद में एक पान की गुमटी में बैठकर साहित्यिक चर्चा करते नहीं अघाते थे. चाहे उनका ग्राहक घूम ही क्यों नहीं जाय. पानुरी जी की गीतों के कायल धनबाद के बुद्धिजीवी, राजनीतिकर्मी सहित दूरदराज के प्रसिद्ध साहित्यकार भी थे. उनसे मिलने जुलने वाले उन्हें कवि जी कहकर बुलाते थे.
उनकी कविताओं में जनकवि वाला भाव दिखता है. कई साहित्यकार उनकी कविता और बाबा नागार्जुन की कविता में साम्य भाव देखते हैं. दोनों जनपक्षधर कवि थे. पानुरी जी और बाबा ने आम आदमी के दुख दर्द , पीड़ा, कसक और टीस को आत्मसात कर कागज के पन्नों पर उकेरने का काम किया है. दोनों ही फकीरी की जिंदगी कबूल की. दोनो की कथनी-करनी हमेशा एक जैसी रही.
पानुरी जी की जन्मस्थली धनबाद है और जन्मतिथि 25 दिसंबर 1920. वर्ष 1944 से वे साहित्य साधना में जुट गये. 1950 से खोरठा में गंभीर रचनाएं करने लगे. उनकी रचनाओं में मुख्य रूप से कविता, गीत, लघुकथा, नाटक एवं अनुवाद है. उनकी पहली कविता संग्रह ‘बाल किरन’ 1954 में प्रकाशित हुई. 1957 से उन्होंने खोरठा भाषा की मासिक पत्रिका ‘मातृभाषा’ का प्रकाशन शुरू किया. इसी वर्ष रांची आकाशवाणी से उनकी खोरठा कविता प्रसारित हुई.
कविता संग्रह एवं पत्रिका का प्रकाशन और आकाशवाणी में कविता का प्रसारण होने पर साहित्य जगत में इनकी पैठ जमने लगी. बड़े-बड़े साहित्यिक सम्मेलनों में बुलाये जाने लगे. इसी दौरान भारत के प्रसिद्ध साहित्यकारों – हरिवंश राय बच्चन, राहुल सांकृत्यायन, श्याम नारायण पांडेय, बेधड़क बनारसी, रामदयाल पांडेय, शिवपूजन सहाय, जानकी बल्लभ शास्त्री, भवानी प्रसाद मिश्र, रामजीवन शर्मा, राधाकृष्ण, वीरभारत तलवार- ऐसे सरीखे साहित्यकारों से उनका संपर्क रहा.
‘मातृभाषा’ पत्रिका प्रकाशन के बाद पानुरी जी ने ‘खोरठा’ नामक पत्रिका प्रकाशित करायी. ‘तितकी’ नामक पत्रिका कई बार रुक-रुक कर सामने आती रही, इसकी प्रेरणा का स्रोत पानुरी जी ही थे. 1968 में पानुरी जी ने महाकवि कालीदास के ‘मेघदूत’ का अनुवाद खोरठा में प्रकाशित किया.
‘मेघदूत’ के खोरठा में प्रकाशित होेने पर राधाकृष्ण जी ने पानुरी जी की विशद चर्चा करते हुए एक निबंध ‘आदिवासी’ में प्रकाशित किया था, जिसमें ये बात कही गयी – ‘‘छोटानागपुरी भाषाओं मे सर्वप्रथम खोरठा भाषा में श्री निवास पानुरी ने ‘मेघदूत’ का अनुवाद करने का श्रेय पाया है……..उनकी तपस्या के सम्मुख आदर से सर झुक जाता है. डॉ वीर भारत तलवार ने ‘मेघदूत’ के संबंध में कहा कि कहना न होगा कि श्री निवास पानुरी ने ‘मेघदूत’ को उसकी उचित जमीन पर उतार दिया है. लोकभाषा का सहारा पाकर जनपद की कथा जनपदवासियों तक पहुंच गयी है.
बहुत कम लोगों को पता होगा कि पानुरी जी ने मार्क्स से की रचना ‘कम्युनिस्ट घोषणा पत्र’का ‘युगेक गीता’ शीर्षक से खोरठा में काव्यानुवाद किया है. आर्थिक अभाव के कारण उनकी बहुत सारी पुस्तकें अप्रकाशित रह गयीं, जिसमें प्रमुख हैं– खते भीजल पांखा(अनुवाद), अजनास(नाटक), मोतीक चूर, अग्नि परीखा (उपन्यास), समाधान, मोहभंग, हमर गांव, भ्रमर गीत, उद्मासल करन, युगेक गीता आदि.
पानुरी जी का खोरठा के प्रति विचार था- ‘‘आपना भाषा सहज सुंदर, बुझे गीदर बुझे बांदर’’. ये पंक्तियां पानुरी अपनी प्रथम पत्रिका ‘मातृभाषा’ के शीर्ष पर छपवाते थे. इतना ही नहीं पानुरी जी खोरठा को पदस्थापित कराने के लिए हमेशा लड़ते रहे. उन्होेेंने रांची विश्वविद्यालय में खोरठा की पढ़ाई के लिए संघर्ष किया. परिणामस्वरूप आज खोरठा की पढ़ाई हो रही है.
खोरठा का अलख जगाने वाले पानुरी जी का निधन 7 अक्टूबर 1986 को हृदयगति रुक जाने के कारण हो गया. पानुरी जी के प्रेरणा से मैंने वर्ष 1995 से ‘इंजोर’ का प्रकाशन शुरू किया, जो आज भी खोरठा जगत में अलख जगाने के लिए प्रयासरत है.
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