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लोकपर्व : झारखंड की महान संस्कृति का प्रमुख अंग हैं टुसू परब

Updated at : 19 Jan 2018 12:40 AM (IST)
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लोकपर्व : झारखंड की महान संस्कृति का प्रमुख अंग हैं टुसू परब

तरनि बानुहड़ अगहन महीना की संक्रांति के दिन की संध्या में टुसु माई की स्थापना की जाती है. इस दिन को यहां के लोग पवित्र दिन के रूप में पालन करते हैं. ठीक इसके बाद ही शाम किसानों की कन्याओं द्वारा टुसु स्थापना की जाती है, जिसे आंचलिक भाषा में टुसु पाता कहा जाता है. […]

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तरनि बानुहड़

अगहन महीना की संक्रांति के दिन की संध्या में टुसु माई की स्थापना की जाती है. इस दिन को यहां के लोग पवित्र दिन के रूप में पालन करते हैं. ठीक इसके बाद ही शाम किसानों की कन्याओं द्वारा टुसु स्थापना की जाती है, जिसे आंचलिक भाषा में टुसु पाता कहा जाता है. प्रचलित पारंपरिक गीतों से भी इस तथ्य या कथन की पुष्टि होती है जैसे टुसु विदाई क्षण में गाया जाने वाला यह सर्वदिदित एवं लोकप्रिय गीत :

‘पानिइं हेलअ, पानिइं खेलअ/ पानिइं तर कन ओहोउ/ मनके भितर ठानि देखें/ पानिइं ससुर धार आहोउ.’

अर्थात धान की रोपाई जिस दिन से खेतों में होती है. उसी दिन से वह जलमग्न खेत यानी पानी में ही हिलती डुलती है या यूं कहा जाय खेलती है और वहां पानी में उसका ससुराल माने जाने का अर्थ यह है कि जिस प्रकार समाज की बेटियां ससुराल में जाकर ही अपने बच्चों को जन्म देती है. ठीक उसी तरह धान को भी पानी में डालने पर ही उसका अंकुरण होता है यानी वंश विस्तार होता है. इस भाव में पानी को धान के ससुराल के समान माना गया है.

इन तमाम नीति नियमाें से टुसु परब के संबंध में यह भाव निखरता है कि प्रकृति महाशक्ति में जो सृजनशील शक्ति विराजमान है, वह शक्ति धान के रूप में ही हमारे समक्ष प्रकट होती है. इसे हमारे पूर्वज हजारों साल पहले ही परखकर इस महान संस्कृति को समाज समाज में प्रतिष्ठित कर गये हैं. टुसु महामाई, आद्या शक्ति, सृजनशील-रूपिणी, महाशक्ति का साक्षात रूप है जिससे कल्पनाओं का दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं है. टुसू गीतों के विश्लेषण से पता चलता है कि उन्हें कभी मातृभाव तो कभी पुत्री भाव से स्मरण किया जाता है.

जब उसके द्वारा हम सृजन, जीवित एवं पालित होते हैं. तब धान का हम मातृभाव से याद करते हैं, वहीं जब किसान उस धान को बीज रूप में बिचड़े तैयार कर खेतों में रोपण, सिंचन, पालन-पोषण एवं देखभाल करते हैं. इस भावार्थ में किसान पालनकर्ता यानी पिता के रूप में नजर आते हैं और धान बेटी के रूप में प्रतीत होती है. इसी भावना के आधार पर अगहन संक्रांति की पवित्र तिथि में मांई अपने बाप के साथ नइहर यानी मायके में आती है और इसी आनंद उमंग से परिवार में खुशियों का माहौल रहता है.

घर-घर में पुआ, पुड़ी, खीर इत्यादि स्वादिष्ट पकवान बनाये जाते हैं. महामांई किसान की बेटी के रूप में अपने मायके आती है इसलिए किसान की लड़कियां अपनी प्रिय संगिनी के रूप में उनका स्वागत तथा सादर-सत्कार भक्ति प्रदान करने हेतु उसी रूप को टुसू नाम से स्थापना करके उसकी पूजा, उपासना एवं आराधना करती हुए उसका वंदन गीत गाती है.

कुड़मालि भाषा में ‘टुइ’ या ‘टु’ शब्द का तात्पर्य किसी वस्तु का सबसे ऊंचा भाग या स्थान यानी शिखर से है अर्थात टुई या टु मतलब सर्वोच्च और शब्द सू का अर्थ श्रेष्ठ , अच्छा, उत्तम, उत्कृष्ट आदि होता है. जैसे सु एवं हड़ शब्दों से सुघड़ शब्द बना है जिसका अर्थ होता है.

श्रेष्ठ या अच्छा आदमी. ‘गिदर टा गाछटिक टुएं चापि बसि आहे’. इस कुड़मालि वाक्य का अर्थ है – लड़का पेड़ के शीर्ष पर चढ़के बैठा हुआ है. यहां भी टू शब्द शीर्ष के मेल से टुसू शब्द का निर्माण हुआ है. जिसका अर्थ होता है सर्वोत्कृष्ट श्रेष्ठता. यह सभी कोणाें से परिपूर्णता का बोध कराती है, और संभवत: इसी वजह से परिपूर्णता को कुड़मालि में ‘टुसू टुसा’ कहा गया है.

एक शब्द देखें ‘इ बछर एतेक जुइत धान हेलाहेक जे धानें धार गिलिन टुसटुसाइ गेलाहेक’. अर्थात धान की पैदावार अच्छी होने के कारण इस साल हर घर धान से परिपूर्ण हो गया है. अत: मेरा मानना है कि सर्वोच्च, श्रेष्ठ एवं परिपूर्ण प्रकृति महाशक्ति की सृजनशील शक्ति को महामांई ‘टुसु’ के नाम से संबोधित किया गया है.

टुसु कभी किसी राजा या जमींदार की बेटी नहीं थी. अगर इसे बेटी के रूप में माना जाय तो सारे विश्व के किसानों की पालित पुत्री है. टुसू परब के विधि नियम के अनुसार यह अगहन संक्रांति से आरंभ होकर पूरा पूस महीना दैनिक एवं नियमित रूप से पूजा वंदना किये जाने के बाद मकर संक्रांति की सुबह टुसू को ससुराल के लिए विदा किया जाता है.

देखें एक प्रचलित गीत

नमअ नमअ टुसुमनि मांइ

हामरा गीत गाहब तर महिमाइ (मुखड़ा)

(अंतरा) तंहि गति तंहि मति

तंहि गिआन दें जागाइ,

तर आशिषें तर महिमा

चिरअकाल राखब जगाइ

(मुखड़ा) नमअ नमअ टुसुमनि …

(अंतरा) पांच भुतें रहिस गअ मांइ

धान रूपें अउइस धरांइ,

धिया-पुता राखिस जिआइ

तर गतअरेक दुध पिआइ

(मुखड़ा) नमइ नमअ टुसुमनि…

(अंतरा) जगतेकर लअक आउअहत

तरे नाम हांकाई

तर बिना मांइ दुनिआ आंधार

आंइखउ नि पाउअत थानाइ

(मुखड़ा) नमइ नमअ टुसुमनि…

(अंतरा) बछर बछर सेंउतअबउ मांइ

खाटब गअ तेरे सेबांइ

तरपासें इ मिनअति, मांइ

मान-खातिर राखिस जिआइ

(मुखड़ा) नमइ नमअ टुसुमनि…

हामरा गीत गाहब तर महिमाइ.

(लेखक लोक संस्कृति के जाने माने जानकार हैं)

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