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गर्भधारण की ‘इंश्योरेंस पॉलिसी’ है एग फ्रीजिंग...जानें कैसे

Updated at : 16 Jan 2018 5:26 AM (IST)
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गर्भधारण की ‘इंश्योरेंस पॉलिसी’ है एग फ्रीजिंग...जानें कैसे

हाल ही में खबर आयी कि यूएस की एक महिला ने 25 वर्ष पहले फ्रीज्ड किये गये अंडों से एक स्वस्थ बच्चे को जन्म देने का रिकॉर्ड बनाया है. इससे पहले भारत में पूर्व मिस इंडिया डायना हेडन के दोबारा फ्रोजेन एग्स द्वारा प्रेग्नेंट होने की खबर आ चुकी है. इसी प्रक्रिया की सहायता से […]

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हाल ही में खबर आयी कि यूएस की एक महिला ने 25 वर्ष पहले फ्रीज्ड किये गये अंडों से एक स्वस्थ बच्चे को जन्म देने का रिकॉर्ड बनाया है. इससे पहले भारत में पूर्व मिस इंडिया डायना हेडन के दोबारा फ्रोजेन एग्स द्वारा प्रेग्नेंट होने की खबर आ चुकी है. इसी प्रक्रिया की सहायता से उनके पहले से भी जुड़वा बच्चे हैं. एग्स फ्रीजिंग तकनीक को वर्तमान में मेडिकल विज्ञान का एक चमत्कार माना जा रहा है. रिपोर्ट्स के मुताबिक मां बनने से आठ साल पहले उन्होंने इन एग्स को हॉस्पिटल में फ्रीज करवाया था. वह पहले भी वर्ष 2016 में इस तकनीक से मां बन चुकी हैं.
हेडन ने 40 साल की उम्र में अमेरिकन कॉलिन डिक से शादी की थी. अभी उनकी उम्र करीब 44 साल है. उन्होंने साबित कर दिया है कि एग फ्रीजिंग महज एक सपना नहीं, बल्कि साइंस का चमत्कार है.
दिलचस्प है कि एप्पल और फेसबुक जैसी कंपनियां महिला कर्मचारियों को इंफर्टिलिटी ट्रीटमेंट्स, स्पर्म डोनर्स और एग्स फ्रीज करने के लिए 20000 डॉलर (करीब 12 लाख रुपये) तक दे रही हैं, ताकि महिलाएं अपने कैरियर पर फोकस कर पायें और वक्त आने पर आसानी से मां बन पायें. एक दशक पहले एग्स फ्रीज करना एक बड़ी चुनौती थी. ‘एग्स फ्रीजिंग’ अपने आप में नयी तकनीक है. आमतौर पर महिलाओं में गर्भधारण की उम्र 15 से 40 वर्ष तक होती है.
उम्र बढ़ने के साथ अंडाणु की गुणवत्ता खराब होती जाती है. 35 वर्ष की उम्र के बाद गर्भधारण में कई तरह की मुश्किलें आ सकती हैं. कई बार इस उम्र की महिलाओं को मां बनने के लिए एग बैंक से किसी और के अंडाणु लेने पड़ते हैं. अत: उम्र जितनी कम होगी, मां बनने की संभावना उतनी अधिक होगी.
कैसे की जाती है एग फ्रीजिंग
एग्स फ्रीजिंग प्रक्रिया की शुरुआत माहवारी के 21वें दिन से जीएनआरएच एनालॉग के साथ होती है और माहवारी आने तक जारी रहती है. इसके बाद गोनेडोट्रॉफिन हॉर्मोन की बड़ी खुराक दी जाती है, जो ओवरी को इस तरह सक्रिय कर देती है कि वह अधिक संख्या में अंडाणु पैदा कर सके. मासिक चक्र के दूसरे दिन से लेकर 10-14 दिनों तक रोज इंजेक्शन दिये जाते हैं.
अंडाणु के एक खास आकार में आने के बाद उसे पूर्ण परिपक्व अवस्था में लाने के लिए ह्यूमन क्रॉनिक गोनेडोट्रॉफिन का इंजेक्शन दिया जाता है. 30 घंटे बाद महिला को बेहोश कर ओवरी से अंडाणुओं को निकाल लिये जाते हैं. परिपक्वता के आधार पर अच्छे अंडाणुओं को छांट कर लिक्विड नाइट्रोजन में रख दिया जाता है और -196 सेंटीग्रेट पर फ्रीज किया जाता है. आइवीएफ का प्रयोग करके गर्भधारण करवाया जाता है. ‘विट्रीफिकेशन ऑफ ओसाइट्स टेक्नोलॉजी’ एग फ्रीज की सबसे नवीनतम तकनीक है, जिसके अच्छे रिजल्ट आते हैं.
दादी-नानी के नुस्खे
दैनिक जीवन में लोग कई छोटी-छोटी समस्या का सामना करते हैं और इलाज के तौर पर एलोपैथिक दवाएं लेते हैं. इसका साइड इफेक्ट भी हो सकता है. जबकि बुजुर्गों के बताये कई नुस्खे हैं, जो सदियों से आजमाये जा रहे हैं और बेहद प्रभावी भी हैं. जानिए कुछ उपाय.
अगर आपको सर्वाइकल पेन है तो एक गिलास दूध में एक चम्मच हल्दी डालकर उबाल लें. ठंडा कर इसमें एक चम्मच शहद मिला लें. रोज दिन में 2 बार पीने से गर्दन के साथ शरीर के किसी भी दर्द में राहत मिलेगी.
सर्दी में झड़ते बालों और रूसी की समस्या से राहत के लिए बालों में दही और नींबू को आधे घंटे के लिए लगा कर छोड़ दें और बाद में शैंपू कर लें. रूसी खत्म हो जायेगी.
सफर में उल्टी की शिकायत होती हो, तो घर से निकलने से पहले एक कप गर्म पानी में आधा नीबू निचोड़कर चुटकी भर काली मिर्च पाउडर मिला लें. इसे पीकर ही घर से बाहर निकलें. उल्टी नहीं आयेगी. सफर में सौंफ भी चबा सकते हैं.
फिजियो सलाह
डॉ विनय पांडे
सीनियर फिजियोथेरेपिस्ट
आइजीआइएमएस, पटना
मेरे बेटे को कुछ समय से पांव में दर्द और दौड़ने में परेशानी होती थी. डॉक्टर को दिखाने पर फ्लैट फुट का पता चला है. यह किसी प्रकार की समस्या है और इससे भविष्य में भी कोई परेशानी भी हो सकती है?रोहन सिंह, दानापुर
पांव की संरचना जटिल होती है, जो तकरीबन 26 हड्डियों तथा 35 जोड़ों की विभिन्न मांसपेशियां, लिगामेंट्स और टेडनस के जुड़ने से बनती है. जन्म के समय हर बच्चे में फ्लैट-फुट ही होता है. जब वह चलना शुरू करता है, तो समय के साथ पांव सामान्य आकार लेना शुरू करता है. पांच से छह वर्ष की उम्र तक सामान्यत: फुटआर्च पूरी तरह विकसित हो जाते हैं.
फ्लैट फुट दो प्रकार के हो सकते हैं- सिंप्टोमेटिक और एसिंप्टोमेटिक फ्लैट फुट. ज्यादातर बच्चों में फ्लैट फुट के लक्षण जैसे दर्द इत्यादि नहीं होते हैं, इसे एसिंप्टोमेटिक फ्लैट-फुट कहते हैं और ऐसे बच्चों को किसी इलाज की जरूरत नहीं होती.
प्रमख लक्षण : सिंप्टोमेटिक फ्लैट फुटवाले बच्चों में पांव में दर्द, क्रैंप, और घुटनों में दर्द, एड़ी का बाहर की तरफ झुक जाना, चलने के पैटर्न में परिवर्तन, खेल-कूद तथा शारीरिक क्रियाओं में ऊर्जा की कमी का महसूस होना आदि लक्षण दिखते हैं.
अगर पांच से छह वर्ष के बाद भी बच्चे का आर्च विकसित नहीं होता और दर्द और अन्य समस्याएं हो रही हों, तो फिजियोथेरेपिस्ट से मिल कर जांच करवाएं. टिपिकल फ्लैट-फुट के बच्चे में फुटआर्च तो होता है पर जैसे ही वह खड़ा होता है आर्च फ्लैट हो जाता है, इसे फ्लैक्सिबल फ्लैट फुट कहते हैं. यह दर्द और अक्षमता के साथ हो, तो इलाज की जरूरत होती है.
शिशु रोग
मेरे बच्चे को बार-बार बुखार आ रहा था. डॉक्टर के पास जाकर जांच कराने पर डॉक्टर ने किडनी इन्फेक्शन बताया है. क्या किडनी में इन्फेक्शन से बुखार आ सकता है?सबिता कुमारी, रांची
डॉ एस कुमार
शिशु रोग विशेषज्ञ, रोड नं-2, विकास नगर, रेनबो क्लिनिक, सिंह मोड़, हटिया, रांची
हां, किडनी में इन्फेक्शन के कारण बच्चे को बुखार आ सकता है. कई बार किडनी में इन्फेक्शन के कारण किडनी के काम करने की क्षमता काफी कम हो जाती है. ऐसे में लगातार बुखार रह सकता है और पेट में दर्द भी होता है. हालांकि पेशाब की C/S जांच कराने और अल्ट्रासाउंड स्कैन से समस्या का पता चल सकता है. यदि समस्या को इग्नोर किया गया, तो किडनी की क्षमता 20% से कम हो सकती है. ऐसे में सर्जरी की भी नौबत आ सकती है.
इसलिए ऐसे कोई भी लक्षण दिखें, तो तुरंत डॉक्टर की सलाह लें.
प्रमुख लक्षण : तेज बुखार, पेट दर्द, उल्टियां, भूख नहीं लगना, काफी बीमार रहना आदि. किसी भी उम्र में बुखार के कारण का शारीरिक जांच में पता नहीं चल पाना, बार-बार यूटीआइ होना, छोटे एवं बड़े बच्चों में भूख नहीं लगना, पेशाब में जलन, बार-बार होना, बिस्तर पर पेशाब कर देना, पेशाब में खून आना, बूंद-बूंद गिरना आदि प्रमुख लक्षण हैं.
उपचार : कम से कम एक लीटर पानी प्रतिदिन 15 किलो के बच्चे को पीना चाहिए. वजन अधिक हो, तो मात्रा बढ़ानी चाहिए. आहार ऐसा हो कि कब्ज न हो. हर पांच-छह घंटे पर पेशाब कराएं. बबल बाथ से बचना चाहिए. मूत्रमार्ग को हमेशा साफ रखना चाहिए. बच्चे का शौच पीछे से आगे नहीं, बल्कि आगे से पीछे की ओर साफ करना चाहिए.
अंडाणु फ्रीज करने के लिए सर्वाधिक उपयुक्त उम्र
50,000-1,00,000
प्रति महीने तक आता है खर्च. अवधि बढ़ने के अनुसार फीस भी बढ़ती जाती है.196 सेंटीग्रेट पर फ्रोजेन एग को किया जाता है स्टोर. इसे 10 वर्षों तक बिना गुणवत्ता को प्रभावित किये रखा जा सकता है.
डॉ प्रिया दाहिया
सीनियर आइवीएफ कंसल्टेंट, अपोलो फर्टिलिटी सेंटर,दिल्ली
भले ही इस विधि का कोई साइड इफेक्ट नहीं है. फिर भी नॉर्मल सिचुएशन में मात्र कैरियर या लाइफ एन्जॉयमेंट के लिए हम महिलाओं को अपनी प्रेग्नेंसी टालने की सलाह नहीं देते. यह तकनीक बांझपन या अन्य कंसीविंग प्रॉब्लम्स से जूझ रही महिलाओं के लिए बेहतर है. इससे 40-45 की उम्र (मेनोपॉज से पहले) तक कंसीव करना सही रहता है. उसके बाद बीपी, शूगर, हार्ट आदि से संबंधित कई तरह की समस्याएं होने की वजह से कॉम्पिकेशंस बढ़ने का खतरा रहता है.
डॉ अनुजा सिंह
आइवीएफ कंसल्टेंट, इंदिरा आइवीएफ सेंटर, पटना
20-30 साल की उम्र में फ्रीज्ड करवाये गये एग्स से कंसीविंग के चांसेज अधिक होते हैं. फिर भी यह जरूरी नहीं कि सारे एग्स सही हो हीं, इसलिए ज्यादा संख्या में एग्स निकाले जाते हैं और उनमें से अमूमन 10 में से 6-7 एग्स (60-70%) से फर्टिलाइज होने के चांसेज होते हैं.
सामान्य तौर से प्यूबर्टी के शुरुआती दौर में महिला के शरीर में हर महीने ज्यादा अंडे बनते हैं और एक तय उम्र के बाद हार्मोन की कमी यूट्रस के सिकुड़ते जाने से अंडों के बनने की यह प्रक्रिया धीमी पड़ती जाती है. ऐसे में समय रहते उन अंडों को स्टोर कर लिया जाये, तो उनका ग्रोथ नॉर्मल ही रहता है. समय आने पर हार्मोनल इंजेक्शन देकर उन अंडों को महिला के शरीर में ट्रांसप्लांट किया जाता है.
हृदय रोग
आइसीडी क्या है? हृदय रोग में अन्य इंप्लांट्स से यह किस तरह से भिन्न है? क्या इस प्रत्यारोपण के पश्चात सामान्य जीवन जीना संभव है?
ललितेश राय, आसनसोल
डॉ मुन्ना दास
इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजिस्ट, नारायणा हॉस्पिटल, कोलकाता
इंप्लांटेबल कार्डियोवर्टर इफिब्रिलेटर्स (आइसीडी) घातक वेंट्रिक्युलर एरिथ्मिया को रोकता है और अचानक मृत्यु से बचाता है. उन्हें पेसमेकर्स की तरह ही लगाया जाता है. आधुनिक आइसीडी बहुत हद तक पेसमेकर्स जैसे दिखते हैं. वे वेंट्रिक्युलर टैचिकार्डियल (तीव्र धड़कन) या पुनर्जीवित वेंट्रिक्युजर फिलब्रिलेशन (असामान्य लय) के साथ जी रहे मरीजों को अचानक मृत्यु से बचाने में काफी लाभदायक रहे हैं. अध्ययनों से पता चलता है कि यह उच्च-जोखिम वाले मरीजों में हृदय गति रुकावट से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.
अधिकांश मरीज लगभग सामान्य जीवनशैली बिता सकते हैं, लेकिन डॉक्टर से परामर्श कर जान लें कि आइसीडी प्रत्यारोपण के बाद वे किसी तरह की गतिविधियां कर सकते हैं और कौन-सही नहीं. मजबूत चुंबकीय क्षेत्रवाले उपकरण से आइसीडी का ऑपरेशन प्रभावित हो सकता है.
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