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उच्च शिक्षा में विदेशी साझेदारी और रोजगार के स्वरूप में बदलाव की उम्मीद

Updated at : 05 Jan 2018 7:10 AM (IST)
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उच्च शिक्षा में विदेशी साझेदारी और रोजगार के स्वरूप में बदलाव की उम्मीद

रोजगारोन्मुखी बन रही शिक्षा में उच्चतर और पेशेवर शिक्षा का महत्व बढ़ता जा रहा है. इसमें चुनौतियां भी बहुत हैं. सरकारी और निजी शिक्षण संस्थाओं पर निगरानी और उनके पाठ्यक्रम को बेहतर करने पर ध्यान देने की जरूरत है. दूसरी ओर, बड़ी आबादी और बढ़ते श्रम बल को पिछले कुछ वर्षों से रोजगार मुहैया करा […]

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रोजगारोन्मुखी बन रही शिक्षा में उच्चतर और पेशेवर शिक्षा का महत्व बढ़ता जा रहा है. इसमें चुनौतियां भी बहुत हैं. सरकारी और निजी शिक्षण संस्थाओं पर निगरानी और उनके पाठ्यक्रम को बेहतर करने पर ध्यान देने की जरूरत है.
दूसरी ओर, बड़ी आबादी और बढ़ते श्रम बल को पिछले कुछ वर्षों से रोजगार मुहैया करा पाना सरकार के लिए बड़ी सिरदर्दी साबित हो रही है. शिक्षा और रोजगार से जुड़े इन्हीं समस्याओं और उम्मीदों को रेखांकित कर रहा है आज का वर्षारंभ …
अभिजीत मुखोपाध्याय
अर्थशास्त्री
प्रोफेसर अमर्त्य सेन ने एक साक्षात्कार में कहा था कि भारत एकमात्र ऐसा देश है जो अशिक्षित एवं स्वास्थ्यहीन श्रमबल के आधार पर वैश्विक आर्थिक शक्ति होने की कोशिश कर रहा है. किसी भी देश के आर्थिक इतिहास में ऐसा नहीं हुआ है, और प्रोफेसर सेन के विचार से भविष्य में भी ऐसा नहीं हो सकता है.
गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और आर्थिक वृद्धि में एक निश्चित संबंध है. गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से श्रमबल में गुणवत्ता आती है तथा इससे उत्पादकता में बढ़ोतरी होती है. यही कारण है कि अधिकतर यूरोपीय देशों ने सार्वभौमिक शिक्षा को अपनाया, जिसे बाद में अमेरिका और जापान ने अपनाया. दक्षिण कोरिया, ताइवान, हांग कांग, सिंगापुर और चीन में यह व्यवस्था लागू हुई.
आर्थिक वृद्धि की प्रक्रिया और गुणवत्तापूर्ण रोजगार को श्रमबल की गुणवत्ता से अलग करने का विचार एक गंभीर आर्थिक गलती है. बाजार अर्थव्यवस्था के पिता कहे जानेवाले अर्थशास्त्री एडम स्मिथ ने 1776 में ऐसी समझ के विरुद्ध चेता दिया था. उनकी समझ सही थी कि भारत में अंग्रेजी शासन बुनियादी शिक्षा पर समुचित ध्यान नहीं दे रहा है. लेकिन सबसे बड़ी विडंबना यह है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद की लगभग सभी सरकारों ने भी यही भूल की है. मौजूदा सरकार भी इस रुझान का अपवाद नहीं है.
दोधारी तलवार है युवा आबादी
देश के कथित ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ यानी बड़ी युवा आबादी से ऊंची उम्मीदों के साथ मौजूदा सरकार का कार्यकाल शुरू हुआ था. अभी भारत की जनसंख्या का 64 फीसदी से ज्यादा हिस्सा 15 से 59 वर्ष की उम्र के कामकाजी दायरे में है. इतना ही नहीं, 27 फीसदी आबादी 14 साल उम्र तक की है और 60 साल से ऊपर के लोगों की संख्या आठ फीसदी से कुछ अधिक है.
ऐसी आबादी को विभिन्न प्रकार के रोजगार की तलाश होती है. यह स्थिति आगामी 25 सालों तक बनी रहेगी. इसे कई अर्थशास्त्री और आर्थिक टिप्पणीकार एक अच्छी स्थिति मानते हैं. लेकिन इसका एक दूसरा पहलू भी है. युवा आबादी एक तरह से दोधारी तलवार है. यदि इसे रोजगार के समुचित अवसर उपलब्ध नहीं कराये गये, तो यह युवा बेचैन हो सकता है तथा भविष्य में समाज के भीतर समस्याएं और दरार पैदा कर सकता है.
रोजगारविहीन आर्थिक विकास
श्रम ब्यूरो के आंकड़ों के मुतािबक, अक्टूबर, 2016 से जनवरी, 2017 के बीच मात्र 1.1 लाख रोजगार ही बढ़े. 2016 में रोजगार में बस एक फीसदी की बढ़त हुई, जबकि सभी तिमाहियों में आर्थिक वृद्धि की दर सात फीसदी से अधिक रही थी. यह अच्छा संकेत नहीं है, खासकर तब जब सूचना तकनीक/बीपीओ सेक्टर में रोजगार में मंदी का माहौल है.
संभव है कि भविष्य में अर्थव्यवस्था की बढ़ोतरी रोजगारविहीन वृद्धि बन कर रह जाये. आश्चर्य की बात विभिन्न सरकारी एजेंसियों के आंकड़ों के प्रति सरकार का रवैया है. सरकारी अर्थशास्त्रियों, मंत्रियों और अधिकारियों ने अपने ही आंकड़ों पर संदेह जताया है और सही तस्वीर जानने के लिए व्यापक सर्वेक्षणों की वकालत की है. लेकिन ऐसे सर्वेक्षणों में समय लगेगा और 2017 में रोजगार के आंकड़े निराशाजनक रहे हैं.
साक्षरता और शिक्षा
भारत में साक्षरता की मौजूदा दर उपलब्ध सूचनाओं के अनुसार करीब 74 फीसदी है. इसमें भी लिंग और क्षेत्र के आधार पर भारी विषमता है. पुरुषों और स्त्रियों की कुल साक्षरता दर क्रमशः 82.14 तथा 65.46 फीसदी है, वहीं केरल में दोनों श्रेणियों में यह 90 फीसदी से अधिक है.
राजस्थान, तेलंगाना और बिहार जैसे राज्य भी हैं जहां साक्षरता क्रमशः महज 67.06, 66.5 और 63.82 फीसदी है. सभी स्तरों के स्कूलों की संख्या 2014-15 में 15 लाख से कुछ ज्यादा थी. उस समय करीब 38 हजार कॉलेज, 760 अलग-अलग तरह के विश्वविद्यालय और 12 हजार तकनीकी संस्थान थे. यह कहने की जरूरत नहीं है कि साक्षरता की दर तथा शैक्षणिक संस्थाओं की संख्या में असमानता बेहद चिंताजनक है.
‘स्किल इंडिया’ से नाउम्मीदी
मौजूदा सरकार ने ‘स्किल इंडिया’ कार्यक्रम बहुत उत्साह से शुरू किया था, लेकिन उसके लक्ष्यों को हासिल करने में विफल रही और इसका नतीजा यह हुआ है कि अब संबद्ध मंत्रालय का कहना है कि भविष्य में लक्ष्य ही निर्धारित नहीं किये जायेंगे और पूरी प्रक्रिया मांग के अनुरूप होगी.
साधारण शब्दों में, लोगों को उन्हीं क्षेत्रों के लिए प्रशिक्षित किया जायेगा, जिनमें मांग होगी. इसके साथ ही इस कार्यक्रम के तहत रोजगार का रिकॉर्ड भी बहुत खराब है. वर्ष 2016-17 में करीब 16.6 तथा 2017-18 की अवधि में अब तक लगभग नौ फीसदी सफल प्रशिक्षु रोजगार पा सके हैं.
इस तरह से अभी गुणवत्तापूर्ण श्रमबल तैयार करने तथा बेहतर रोजगार के अवसर पैदा करने की प्रक्रिया बहुत चिंताजनक नजर आती है. यदि हम ऐतिहासिक रूप से देखें, तो वोकेशनल प्रशिक्षण का मॉडल बुरी तरह से असफल साबित हुआ है.
कई अन्य सरकारी कार्यक्रमों की तरह ‘स्किल इंडिया’ की चर्चा तो खूब हुई, पर आज हालत यह है कि छोटी अवधि के पाठ्यक्रमों के मॉडल भी कामयाब नहीं हो पा रहे हैं. छोटे, मझोले और बड़े उद्योग और उद्यम जरूरत भर रोजगार नहीं पैदा कर पा रहे हैं. ऐसे में सेवा क्षेत्र- खासकर असंगठित क्षेत्र में- पर भारी दबाव बढ़ता जा रहा है जहां लोग गुजर-बसर की मजबूरी के कारण जा रहे हैं.
गुणवत्ता के ह्रास की आशंका
नये विश्वविद्यालय और कॉलेज नहीं खोले जा रहे हैं, और मौजूदा सरकार के दौर में दक्षिणपंथी ताकतें कुछ अच्छे उदारवादी विश्वविद्यालयों का माहौल बिगाड़ने पर तुली हुई हैं. निजी शिक्षण संस्थाएं समाज और आबादी के उन तबकों को सेवा दे रही हैं, जहां से उन्हें कमाई और मुनाफे की उम्मीद है, तथा यह बात ऐतिहासिक रूप से साबित हो चुकी है कि निजी संस्थाएं कभी भी सरकार द्वारा संचालित संस्थाओं का विकल्प नहीं हो सकती हैं, क्योंकि उनके लिए मुनाफा सबसे अहम लक्ष्य है.
इस तरह से आज जरूरी यह है कि अच्छी शैक्षणिक संस्थाएं स्थापित हों ताकि सक्षम और निपुण श्रमबल तैयार किया जा सके. लेकिन अफसोस की बात है कि गुणवत्ता के ह्रास और रोजगार के क्षेत्र में मंदी की हालत की प्रक्रिया 2018 में भी जारी रहने की आशंका है.
भारत की पहली राष्ट्रीय रोजगार नीति
वर्ष 2018 तक भारत में बेरोजगारों की अनुमानित संख्या 1.8 करोड़ तक पहुंच जायेगी. संयुक्त राष्ट्र श्रम रिपोर्ट में इस पर बड़ी चिंता जतायी गयी है. इस मुश्किल हालात से निपटने के लिए केंद्र सरकार देश की पहली राष्ट्रीय रोजगार नीति (एनईपी) लागू करने पर विचार कर रही है. वर्ष 2018 के बजट में इस बाबत घोषणा की जा सकती है. यह नीति आर्थिक, सामाजिक व श्रम नीतियों के माध्यम से विभिन्न सेक्टरों में गुणवत्ता युक्त नौकरियों के सृजन के लिए विस्तृत रूपरेखा तैयार करेगी.
राष्ट्रीय रोजगार नीति के तहत श्रम प्रधान क्षेत्र के नियोक्ताओं को सरकार वित्तीय प्रोत्साहन देने पर विचार कर सकती है, ताकि अधिकाधिक नौकरियों का सृजन हो और कर्मचारियों को संगठित क्षेत्र में रोजगार मुहैया कराया जा सके. ऐसा करना इसलिए जरूरी है, ताकि कर्मचारियों को न्यूनतम वेतन और पर्याप्त सामाजिक सुरक्षा मिल सके. क्योंकि आज भी हमारे देश का लगभग 60 करोड़ श्रमबल असंगठित क्षेत्र में कार्यरत है. यह वह क्षेत्र है, जहां कर्मचारियों के लिए न ही कोई सामाजिक सुरक्षा कानून लागू होता है, न ही उन्हें न्यूनतम वेतन दिया जाता है.
श्रम व रोजगार मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2011-12 में संगठित क्षेत्र में महज 10.1 प्रतिशत ही रोजगार का सृजन हो पाया था.
उम्मीद की जा रही है कि राष्ट्रीय रोजगार नीति देश के श्रमबल में हर वर्ष जुड़नेवाले लगभग एक करोड़ युवाओं के लिए संगठित क्षेत्र में रोजगार सुनिश्चित करेगी. हमारे देश में रोजगार की जो वर्तमान स्थिति है, सरकार उसका आकलन कर रही है. सरकार द्वारा किये जा रहे इस आकलन में व्यापक आर्थिक माहौल, जनसांख्यिकीय संदर्भ और रोजगार सृजन में क्षेत्रीय चुनौतियां शामिल की गई हैं. इस आकलन के बाद ही कोई लक्ष्य निर्धारित होगा और उनकी निगरानी की जायेेगी.
शहरों पर बढ़ता रोजगार का दबाव
भारत जैसी विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में युवाओं को रोजगार मुहैया कराना बड़ी चुनौती बनती जा रही है. भारत में जैसे-जैसे अर्थव्यवस्था आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे खेती से लोग विमुख हो रहे हैं.
बेहतर रोजगार की तलाश में लोग शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं. बड़ी तादाद में लोगों को रोजगार मुहैया कराना सरकार के लिए बड़ी समस्या बन चुकी है. देश में खेती और इससे जुड़े क्षेत्र सबसे बड़े रोजगार प्रदाता हैं. लेकिन बीते दशकों के दौरान खेती समेत टेक्सटाइल और लेदर इंडस्ट्री में रोजगार के मौके घट गये हैं. हालांकि, सर्विस सेक्टर समेत अनेक अन्य क्षेत्रों में रोजगार के नये मौके सृजित हो रहे हैं, लेकिन इसके लिए व्यापक पूंजी और तकनीक की जरूरत होती है. ऐसे में इन क्षेत्रों में रोजगार के मौके सीमित हैं.
2018 में इन क्षेत्रों में पैदा होगा रोजगार
इस वर्ष अनेक क्षेत्रों में रोजगार के नये मौके पैदा होने की उम्मीद है. इनमें से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं :
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस
अनेक तकनीकी कंपनियां अपने कार्यक्षेत्र को बढ़ रही हैं. इसके लिए वे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का सहारा ले रही हैं. ई-कॉमर्स और आईटी सेक्टर में इसकी मदद से रोजगार के नये मौके पैदा होने की व्यापक उम्मीद है.
डिजिटल मार्केटिंग
स्टार्टअप्स और अन्य स्थापित कंपनियां अपनी विविध गतिविधियों (एचआर, ऑपरेशंस, मैन्युफैक्चरिंग, वेयरहाउसिंग और कम्युनिकेशन) को अंजाम देने के लिए डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल कर रही हैं. इसी तरह से मार्केटिंग अब पारंपरिक माध्यमों तक ही सीमित नहीं रहा है. डिजिटल मार्केटिंग का दायरा दिनों-दिन बढ़ता जा रहा है और इनके प्रोफेशनल्स की मांग बढ़ रही है.
डेटा साइंस
भारत में इंटरनेट कंपनियां उपभोक्ताओं के आंकड़ों को विविध तरीकों से विश्लेषित कर रही हैं. इससे अनेक प्रकार के निष्कर्ष निकाले जा रहे हैं और उन्हें संबंधित सेक्टर से जुड़े कारोबारों को मुहैया कराया जा रहा है. उपभोक्ताओं की आयु और अन्य तरीके से वर्गीकरण के मुताबिक उनकी रुचियों का अध्ययन और विश्लेषण करने वाले प्रोफेशनल्स की मांग बढ़ सकती है.
उच्च शिक्षा में विदेशी साझेदारी
भारत में 2020 तक चार करोड़ छात्रों को उच्च शिक्षा मुहैया कराने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा गया है. इसे हासिल करने के लिए विदेशी विश्वविद्यालयों को यहां या तो किसी साझेदारी के तहत या फिर अपने कैंपस के जरिये अंजाम देना होगा.
ऑस्ट्रेलिया की न्यू साउथ वेल्स यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर इयान जैकक्स के हवाले से ‘आईएएनएस’ की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत में उच्च शिक्षा क्षेत्र में व्यापक मौके हैं और इसका दोहन करने के लिए बड़ी तादाद में साझेदारी के जरिये संस्थाअों का गठन करना होगा. आगे वे कहते हैं, मौजूदा समय में भारत में किसी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय के लिए अपना कैंपस चालू करना मुमकिन नहीं है. लेकिन, किसी भारतीय विश्वविद्यालय की साझेदारी से इसकी शुरुआत करना मुश्किल नहीं है.
जीईआर में बढ़ोतरी मुमकिन!
भारत ने 2020 तक उच्च शिक्षा में ग्रॉस एनरोलमेंट रेशियो (जीईआर) को 30 फीसदी तक करने का लक्ष्य रखा है. 18 से 23 वर्ष उम्र समूह की आबादी में उच्च शिक्षा में कुल एनरोलमेंट को जीईआर कहते हैं.
मानव संसाधन विकास मंत्रालय के मुताबिक, भारत में वर्ष 2015-16 में जीईआर 24.5 फीसदी था, जिसमें वर्ष 2004-05 के मुकाबले करीब 10 फीसदी की बढ़ोतरी देखी गयी है. लेकिन यदि हम इस लिहाज से भारत की तुलना चीन और ब्राजील से करेंगे, तो चीन में जहां यह 26 फीसदी है, वहीं ब्राजील में यह 36 फीसदी है.
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