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आत्मा को मांझने का अनूठा लोकपर्व

Updated at : 24 Oct 2017 9:08 AM (IST)
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आत्मा को मांझने का अनूठा लोकपर्व

दुनियादारी की सारी बीमारी और दवाओं को कुछ दिन भूल सारा बिहार-यूपी अपने गांव-घर की तरफ निकल चला है. सोचता हूं तो लगता है कि साल में कम-से-कम एक बार गांव इसलिए आ जाना जरूरी नहीं है कि यहां ईंटों से बना एक पुश्तैनी मकान है, जिसमें पुरखों की निशानी खुदी है और मैं उसे […]

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दुनियादारी की सारी बीमारी और दवाओं को कुछ दिन भूल सारा बिहार-यूपी अपने गांव-घर की तरफ निकल चला है. सोचता हूं तो लगता है कि साल में कम-से-कम एक बार गांव इसलिए आ जाना जरूरी नहीं है कि यहां ईंटों से बना एक पुश्तैनी मकान है, जिसमें पुरखों की निशानी खुदी है और मैं उसे अंगुलियों से छूकर महसूस करना चाहता हूं. गांव आ जाना इसलिए भी जरूरी नहीं कि घर के आंगन की माटी में अल्हड़ बचपन की तरह लोट-लोट कर खेलना चाहता हूं या गांव की गलियां मुझे ढूंढ़ रही हैं या फिर बरगद का पेड़ मेरी राह तकता है.

ये सब कविता के लिए कच्चा माल भले हैं मेरे लिए, गांव जाने की जरूरी शर्त नहीं. मैं साल में कम-से-कम एक बार गांव इसलिए आना चाहता हूं कि ‘छठ’ के गीत सुन सकूं. जी हां, जब कहीं दूर किसी छोर से ‘कांच ही बांस के बहंगिया’ सुनाई पड़ जाता है, तो गीत वाला वो बांस मानो उड़नखटोला बन हर हम पुरबइया को गांव की ओर उड़ा ले जाता है. छठ गीत हमारे लिए दयानंद सरस्वती के ‘वेदों की ओर लौटो’ से ज्यादा अपील करते हैं और हम सब गांव की ओर लौट जाते हैं. हम चले आते हैं गांव, ताकि देख सकें आस्था की जमीन पर लहलहाती परंपरा की उस फसल को, जहां ‘सूप और डाला’ जोड़ने के संकेत से मानव को मानव से जोड़ने का पाठ सिखाया जाता है. जी हां, साल भर अंदर-बाहर सब छूट और टूट चुके जड़ों की मरम्मत के लिए आते हैं हम सब ‘छठ’ में.

छठ सिर्फ एक पर्व होता तो मनाना छूट भी जाता, लेकि यह पर्व भर थोड़े ही है. यह तो जड़ है हमारी परंपरा की, कुंजी है मानव और प्रकृति के सह अस्तित्व की. देखिए न इस महान लोकपर्व के दर्शन की विशाल परिधि को, गहरे निहितार्थ को. इसमें नदी है, जीवन का केंद्र सूर्य है, प्रकृति के फल-फूल हैं और है कुदरत के हाथ से गढ़ी हुई, बड़ी पवित्रता के साथ तन-मन तक को मांझ कर परब करती एक परबैतिन. प्रकृति के पांच तत्वों- क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा- को मिला कर प्रकृति के शाश्वत नियमों को बहाल करनेवाला ऐसा लोकपर्व ‘छठ’ के सिवा क्या होगा भला.
गौर करें तो सब कुछ बदल रहा है. दशहरा देवी द्वारा राक्षस के वध से अब महिषासुर की शहादत तक आ गया है, दीवाली माटी के दीप से अब चायनीज झालर तक आ गयी है, लेकिन ‘छठ’ कमोबेश जस-का-तस बना हुआ है.
ओह छठ का वो माहौल… चार दिन के इस लोकपर्व का हर बीता साल घूमता-उछलता है मेरे अंदर. कदुआ-भात के दिन ही घर धोआ-पोछा कर मंदिर में तब्दील हो जाता था और उसकी देहरी दूसरे देश की सीमा जैसी हो जाती थी- इधर न कूदो, उधर ना खेलो. इस दिन कद्दू की खास सब्जी बनती और कद्दुआ एक दिन के लिए सब्जी सम्राट बन जाता था, सब्जी नरेश पनीर तक को पछाड़ देता इस दिन कद्दू कुमार.
याद है मुझे, मेरी परनानी तीन दिन पहले ही पड़ोस की ‘मलतिया माय’ को बोल कर कद्दू की बुकिंग कर देती थी. देखिये न, अब न तो बुढ़िया नानी रही, न ही मलतिया माय, बस कसाई बाजार रह गया है. एक-एक कद्दू साठ-सत्तर रुपये का मिलने लगा है अब तो.
दूसरे दिन सुबह सात बजते ही पूरा हटिया बाजार डाला, सूप, नारियल, ईख, चिनिया बादाम, सुथनी, शकरकंद, कच्ची हल्दी, शरीफा, डाभा नींबू, सेब, केला से भर जाता था. क्रेता-विक्रेता सब नहाये धोआये. यहां तक कि मन भी धुला हुआ. बाजार को इतने पाकसाई में देखना छठ में ही नसीब होता है. घर में पड़ोस की ‘बुधनी माय’ आती और साथ में ‘तेतरी माय’ भी. फिर शुरू होता ‘जांता’ में गेहूं पीसने का काम और ढेंकी में चावल कूटना. रात में खरना की खीर बनती, दूध में चावल और गुड़ डाल के.
तीसरे दिन भोरे-भोर से सब जुट जाती प्रसाद बनाने में. ठेकुआ बनता, तो कचवनिया बनता. ठेकुआ में गुड़ वाला थोड़ा लिबलिब होता और उसके स्वाद का क्या कहना. कचवनिया में कपूर दे के बने तो क्या कहने. सब प्रसाद बनाते हुए समवेत स्वर में ‘उगहो सुरूज देवा’ ऐसे गाते,मानो आत्मा तक को मांझ रहे हों. शारदा सिन्हा के गीत तो छठ के सिद्ध मंत्र हो चुके हैं, कान में घुलते ही मोक्ष जानिए.
आध्यात्मिक चमत्कार को छोड़ भी दीजिए, तो अपने सामाजिक सरोकार, परस्पर सहयोग और समन्वय तथा प्रकृति और मानव के सहसंबंधों को दर्शानेवाले इस महान लोकपर्व का स्वरूप अनूठा है. आप दीवाली, दशहरा खुद में सिमट कर बाल-बच्चों संग भले मना ले सकते हैं, लेकिन छठ तो एक परंपरा और नियम से बंध कर, पूरे समाज का ताना-बाना बुन कर ही मनाया जा सकता है. इस ताने-बाने में डिप्टी कलेक्टर की मां होगी,तो संग-संग तेतरी माय भी, बुधनी माय भी. इस लोकपर्व का सरोकार इतना व्यापक है कि पूरे समाज को एक माला में गुंथे बिना इसका चक्र ही पूरा नहीं हो सकता. यह अपने घर के भीतर खुशियां मनाने का नहीं, समाज के साथ आनंद बांटने-पाने का पर्व है. इस समन्वयकारी पर्व में एकाकीपन की कोई जगह नहीं. यह तो प्रकृति को पूजने, प्रकृति से मानव को जोड़ने का पर्व है. एक ऐसा उदार पर्व, जहां उगते सूर्य के साथ डूबते सूर्य को भी नमन किया जाता है. हम भाग्यशाली हैं कि हमें परंपरा से ऐसा अनूठा लोकपर्व मिला है, जिसमें लोक का महत्व है और जो एकाकी होती दुनिया के दौर में भी सामाजिकता और सामूहिकता को स्थापित करता है.
पुरबइया आदमी चाहे कितना भी पछिया के लपेट में आ जाये, इन चार दिनों में पूरब को लौट जाना चाहता है. मुंबई, दिल्ली हो या सूरत, हर तरफ से ट्रेनें लोगों को भेड़-बकरी की तरह ठूंस कर लाती हैं और बिहार के प्रमुख स्टेशनों पर पटक देती हैं. लेकिन, लंबी यात्रा की विकट परेशानियों के बावजूद यह परंपरा और जड़ की ताकत ही है, जो हर हाल में इन्हें खींच लाती है अपने गांव-घर तक, नदी-पोखर तक. जय हे छठी मइया.
(युवा साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित उपन्यासकार)
नीलोत्पल मृणाल
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