...जब जेल में मिठाई लेकर मुझसे मिलने आये थे लोहिया जी
Updated at : 12 Oct 2017 7:45 AM (IST)
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सराजकिशोर सिंह समाजवादी डॉ राम मनोहर लोहिया की पार्टी के आदेश पर बकास आंदोलन की लड़ाई 1952 में लड़ी गयी. जो बटाईदारी के खिलाफ थी. इसी क्रम में रामबहादुर आजाद की गिरफ्तारी हो गयी. जेल यात्रा के दौरान उनसे मिलने मुंगेर जेल में लोहिया जी खुद आये. लेकिन जेल प्रशासन मिलने नहीं दे रहा था. […]
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सराजकिशोर सिंह
समाजवादी डॉ राम मनोहर लोहिया की पार्टी के आदेश पर बकास आंदोलन की लड़ाई 1952 में लड़ी गयी. जो बटाईदारी के खिलाफ थी. इसी क्रम में रामबहादुर आजाद की गिरफ्तारी हो गयी. जेल यात्रा के दौरान उनसे मिलने मुंगेर जेल में लोहिया जी खुद आये. लेकिन जेल प्रशासन मिलने नहीं दे रहा था. लोहिया जी जेल के सामने ही धरने पर बैठ गये. सत्याग्रह शुरू कर दिया. तब जाकर शाम में जेल प्रशासन ने मिलने दिया.
उन्होंने जेल में उनसे पहला सवाल किया कि आजाद तुम जेल में घबरा तो नहीं रहे हो? उन्होंने उन्हें ढाढ़स बंधाते हुए अपने साथ लायी मिठाई खिलायी. 90 वर्षीय प्रखर समाजवादी डॉ लोहिया के काफी करीबी रहे राम बहादुर आजाद आज अपने राजनीतिक जीवन के अवसान की बेला में हैं. इस उम्र में भी उनका जज्बा और उत्साह दोनों ही कम नहीं है. पढ़िए लोहिया जी से जुड़े उनके संस्मरण.लोहिया मेरे राजनीतिक गुरु हैं
5 फरवरी 1965 को कानपुर के घंटाघर स्थित कार्यालय में डॉ लोहिया चाय पी रहे थे. पास में रेवा शंकर, श्याम मिश्र, प्यारेलाल गुप्ता व अन्य व्यक्तियों के साथ मैं भी बैठा था. खामोशी के साथ चाय पी रहे लोहिया जी अचानक से बोले- अगर महंगाई नहीं रुकी, तो एक दिन यह चाय ढ़ाई रुपये कप बिकेगी.
आजाद ने कहा कि उस वक्त राजनीति सिद्धांतों पर चलती थी. जो ईमानदारी, सादगी व प्रतिबद्धता के साथ समाज के उत्थान के लिए काम करते थे, उनको पक्ष-विपक्ष दोनों आदर देते थे. उसको समाज भी इज्जत करता था. अब पार्टी में सिद्धांत नहीं है. जब जाति धर्म का उन्माद होता है, तो सभी सिद्धांत फेल हो जाते हैं. अभी राजनीति में व्यक्तिवाद, परिवारवाद और जातिवाद का बोलबाला है.
डॉ लोहिया ने की थी पाकिस्तान के बंटवारे की भविष्यवाणी
एक बार लोहिया जी ने चर्चा के दौरान कहा था कि पाकिस्तान का बंटवारा तय है. बाद के दिनों में यह बातें सच साबित हुई. राजनीति का क, ख, ग मैंने लोहिया के विचारों से ही सीखा. पार्टी का अखबार बेचने के साथही मैंने उसका अध्ययन भी करना शुरू किया. यहीं से मुझ पर लोहिया जी का प्रभाव धीरे-धीरे मेरे जीवन को प्रभावित करता गया.
विपक्षी को आदर भाव देते थे लोहिया
सियासत का एक वो दौर था और एक आज का दौर है. अब चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशी प्रतिद्वंद्वी को दुश्मन मान लेते हैं. उस वक्त चुनाव में प्रत्याशी एक-दूसरे के विरोध में खड़े होते थे, लेकिन आज चुनाव लड़ा जाता है.
डॉ लोहिया को 1963 में फर्रूखाबाद की अवाम ने पलकों पर बैठाया और संसद तक पहुंचा दिया. खास बात यह थी कि उन्होंने चुनाव जीतने के लिए अपने प्रतिद्वंद्वी की बुराई तक नहीं की. इतना ही नहीं कार्यकर्ताओं को यह हिदायत दी कि यदि उन्होंने प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवार को भला-बुरा कहा तो वो चुनाव छोड़ कर चले जाएंगे. उनका जन्म भले ही फर्रूखाबाद में नहीं हुआ, लेकिन वे यहां की जनता को बेहद चाहते थे.
नामांकन खर्च भी समर्थकों ने उठाया
वर्ष 1963 की बात है, उस जमाने में कांग्रेस की तूती बोलती थी. तत्कालीन कांग्रेस सांसद मूलचंद दुबे के निधन के बाद हुए उपचुनाव में लोहिया सोशलिस्ट पार्टी से उम्मीदवार घोषित हुए. हालांकि व्यापारिक दृष्टि से फर्रूखाबाद से पुराना नाता था. लोहिया जी के पिताजी व्यापार के संबंध में फर्रूखाबाद से आया-जाया करते थे.
उपचुनाव में डॉ लोहिया को जब प्रत्याशी बनाया गया, तब सोशलिस्ट पार्टी के जिले भर में मात्र चार सदस्य थे. इसमें राजनारायण, रामस्वरूप विद्रोही, यशवंत कटियार शामिल थे. डॉ लोहिया के नामांकन के वक्त उनके प्रस्तावक बने श्याम प्रकाश गुप्ता ने ही नामांकन फीस के रूप में 500 रुपये दिये थे.
टूटी अटैची लेकर पहुंचे थे लोहिया
डॉ लोहिया ने चुनाव अभियान की पहली बैठक फतेहगढ़ में की थी. इसमें यशवंत, सतीश, राजनारायण समेत 19 लोग शामिल थे. चुनाव लड़ने आये डॉ लोहिया के पास कुंडा टूटी एक अटैची थी. इसमें कुल चार जोड़ी कुर्ता-पाजामा थे.
शहर के लोहाई रोड पर उन्होंने चुनाव कार्यालय बनाया था. नामांकन करने से पहले उन्होंने पल्ला पार्क में बैठक की थी, इसमें जनेश्वर मिश्रा और राजनारायण भी आये थे. बैठक में लोहिया ने साफ कह दिया था कि वे चुनाव लड़ने आये हैं. इसके लिए उन्हें जनता की मदद चाहिए, लेकिन ज्यादा नहीं, सबसे चार आना (25 पैसे) और आठ आना (50 पैसे) की मदद करने की अपील की. उन्होंने मदद करने वालों को साफ साफ कह दिया था कि निजी काम की उम्मीद नहीं करें. उन्होंने चुनाव का प्रचार बैलगाड़ी से किया था.
लोहियाजी ने मुझे जनता का नेता बनाया
डॉ लोहिया मेरे बारे में कहा करते थे कि राम बहादुर जनता का नेता है. उन्होंने भूपेंद्र नारायण मंडल, भोला सिंह, विनायक यादव, परमेश्वर कुंवर को कहा था कि रामबहादुर आजाद को चुनाव लड़ने से रोकना बड़ी गुस्ताखी होगी. 1969 के चुनाव में जब पार्टी ने खगड़िया से मुझे दोबारा विधानसभा का टिकट दिया, तो लोहिया जी को चुनावी सभा के लिए आमंत्रित किया. जब लोहिया जी मेरी जनसभा में आये, तो उनको सुनने के लिए लाखों लोगों की
भीड़ थी. भीड़ देख कर लोहिया चौंक से गये. लोहिया जी ने भरी सभा में ही मेरा हाथ पकड़ मुझे खड़ा किया और जनता की सहमति से मुझे विजयश्री की माला पहना दी. उनके आशीर्वाद से ही मैं 33 हजार वोट से चुनाव जीतने में सफल रहा.
चांदी की कुर्सी देख भड़क गये लोहिया
एक बार दरभंगा में बैठक में लोहिया जी को आना था. उनके सम्मान में दरभंगा नरेश से चांदी की कुर्सियां मांग कर लायी गयी थीं. कार्यक्रम के दौरान जब लोहिया जी को पता चला कि ये कुर्सियां दरभंगा नरेश से मंगवाई गयी हैं, तो वे काफी नाराज हो गये. उन्होंने मुझे भी काफी भला-बुरा कहा.
दक्षिण एशियाई राष्ट्र महासंघ की परिकल्पना और लोहिया
कुमार नरोत्तम
स्वतंत्र टिप्पणीकार
डॉक्टर राममनोहर लोहिया ने 1960 के दशक में, जब पाकिस्तान का बँटवारा भी नहीं हुआ था और बांग्लादेश का जन्म भी नहीं हुआ था, ने ‘भारत-पाकिस्तान महासंघ’ की सबसे पहले वकालत की थी. वे हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रबल समर्थकों में से एक थे. उनका मानना था कि दोनो देशों के बीच हिंसा रुकनी चाहिए और भारत-पाकिस्तान के बीच सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक रिश्ते मजबूत होने चाहिए. वे इस बात में यकीन रखते थे कि इस महासंघ से दोनो देशों के रिश्ते सुधरेंगे और दक्षिण एशिया क्षेत्र में शांति बहाल होगी. उन्होंनेे इस बाबत हिंदू- मुस्लिम एकता को मज़बूत करने के लिए ‘अंतर-सामुदायिक रात्रिभोज’ को अपनी पार्टी लाइन से जोड़ दिया था.
1967 में 57 वर्ष की अवस्था में लोहिया जी के आकस्मिक अवसान के बाद ‘संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी’ और ‘प्रजा सोशलिस्ट पार्टी’ के एकीकरण के बाद बने ‘सोशलिस्ट पार्टी’ ने इस महासंघ की परिकल्पना को आगे बढ़ाते हुए इसमें बांग्लादेश को भी शामिल कर लिया.
जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने पद की शपथ ले रहे थे, तो उसमें शामिल होने के लिए तत्कालीन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को जब न्योता भेजा गया और उन्होंने जब उसे स्वीकार भी कर लिया, तो अंतरराष्ट्रीय गलियारे में इसकी चर्चा होने लगी कि कहीं फिर से डॉक्टर लोहिया की ‘भारत-पाक महासंघ’ की परिकल्पना जीवित न हो जाए.
अगर यूरोपीय यूनियन के मूर्त रूप में आने से पहले की स्थिति पर गौर करें, तो एक बात स्पष्ट था कि इसे व्यावहारिक बनाना कतई आसान नहीं था. बेल्जियम, फ्रांस, जर्मनी, इटली, लक्जमबर्ग और नीदरलैंड यूरोपीय यूनियन के शुरुआती छह देश थे, जिनके बीच कई मसलों पर आपसी सहमति नहीं थी.
1940 में जर्मनी ने फ्रांस को एक तरह से अलग-थलग कर दिया था. नीदरलैंड, बेल्जियम और छोटे-से देश लक्जमबर्ग में इतनी ताकत नहीं थी, जो जर्मन फौज और उसकी आक्रामकता का सामना कर सके. 1945 में जब द्वितीय विश्वयुद्ध समाप्त हुआ था, तो उस समय विनाशलीला आजकल के सीरिया और इराक में हो रही तबाही से कहीं ज्यादा भयावह थी. युद्ध के बाद माहौल कुछ ऐसे बन रहे थे कि पश्चिमी यूरोप के लोग इस बात से खासे नाराज थे कि उनकी सरकार ने उन्हें बदहाली और अराजकता के माहौल में धकेल दिया.
जब जर्मनी और फ्रांस जैसे धुर-विरोधी यूरोपीय यूनियन के तहत लोगों, व्यापार, वस्तुओं और सेवाओं का आदान-प्रदान कर सकते हैं, तो दक्षिण-एशियाई क्षेत्र में ऐसे महासंघ की परिकल्पना व्यावहारिक क्यों नहीं हो सकती?
मोदी सरकार की मौजूदा कार्यशैली पर अगर नजर रखें, तो एक बात स्पष्ट है कि वे बीते सत्तर बरस की हर सत्ता से बड़ी लकीर खींचते हुए नजर आ रहे हैं. अगर पाकिस्तान के नज़रिये से देखें, तो पाकिस्तान को भी बिजली-सड़क-पानी-रोजगार चाहिए.
इसमें कोई संदेह नहीं है कि महासंघ का नजरिया लाइन ऑफ कंट्रोल पर बंदूक के बदले व्यापार, विकास और रिश्तों की जरूरतों को पूरा करें, तो यह संभव नहीं होगा, कैसे कहा जा सकता है. लोहिया जी की 50वीं पुण्यतिथि पर दक्षिण एशियाई देशों के सियासतदानों को एक महासंघ की परिकल्पना पर फिर से विचार करना चाहिए और अगर इस दिशा में कोई कदम उठाया जाता है, तो वह डॉक्टर लोहिया को सच्ची श्रद्धांजलि होगी.
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By Prabhat Khabar Digital Desk
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