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बड़ी आबादी को स्वच्छ पेयजल मुहैया कराने में कामयाब होगा ग्रैफीन आधारित नया मेंब्रेन!

Updated at : 12 Sep 2017 6:47 AM (IST)
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बड़ी आबादी को स्वच्छ पेयजल मुहैया कराने में कामयाब होगा  ग्रैफीन आधारित नया मेंब्रेन!

वाटर प्यूरीफाइ टेक दुनिया की सभी आबादी को स्वच्छ पेयजल मुहैया कराना तकरीबन सभी देशों की सरकारों के लिए अब तक बड़ी चुनौती रही है. स्वच्छ पेयजल के अभाव में अनेक बीमारियों के कारण दुनियाभर में लाखों लोगों की असमय मौत हो जाती है. पानी को साफ करने की मौजूदा तकनीकों की पहुंच सभी लोगों […]

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वाटर प्यूरीफाइ टेक
दुनिया की सभी आबादी को स्वच्छ पेयजल मुहैया कराना तकरीबन सभी देशों की सरकारों के लिए अब तक बड़ी चुनौती रही है. स्वच्छ पेयजल के अभाव में अनेक बीमारियों के कारण दुनियाभर में लाखों लोगों की असमय मौत हो जाती है. पानी को साफ करने की मौजूदा तकनीकों की पहुंच सभी लोगों तक नहीं हो पाने के कारण यह संकट ज्यादा है.
शोधकर्ताओं ने कम खर्च में बेहतर तरीके से पानी को स्वच्छ बनाने की एक तकनीक विकसित की है. उम्मीद की जा रही है कि इसके जरिये दुनिया की सभी आबादी को अब स्वच्छ पेयजल मुहैया कराने में आसानी होगी. कैसे विकसित की गयी यह तकनीक और क्या रही है इस दिशा में आरंभिक कामयाबी समेत इससे संबंधित विविध मसलों पर फोकस कर रहा है आज का साइंस टेक्नोलॉजी पेज …
शोधकर्ताओं की एक टीम ने संयुक्त प्रयास से दुनिया की बड़ी आबादी को साफ पेयजल मुहैया कराने की दिशा में आरंभिक कामयाबी हासिल की है. ‘इंटेरेस्टिंग इंजीनियरिंग’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, जापान की शिंशु यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों और पेन स्टेट के एटॉमिक सेंटर के डायरेक्टर के नेतृत्व में अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ताओं की एक टीम ने अद्भुत मैटेरियल ग्रैफीन के जरिये इसे अंजाम दिया है.
मौजूदा नैनोफिल्ट्रेशन मेंब्रेन तकनीक के मुकाबले नये विकसित किये गये ग्रैफीन आधारित कोटिंग सिस्टम के जरिये पानी में से नमकीन और दूषित पदार्थों को छानने की प्रक्रिया ज्यादा मजबूत और मानक तरीके से की जा सकती है. आरंभिक नतीजों में यह भी दर्शाया गया है कि नयी तकनीक के माध्यम से पानी में से प्रोटीन को पृथक करने की प्रक्रिया भी आसान है. साथ ही इस प्रेक्टिकल मेंब्रेन को वेस्ट वाटर ट्रीटमेंट यानी बेकार हो चुके पानी को दोबारा से साफ करने में भी इस्तेमाल में लाया जा सकता है. इसके अलावा, विशेषज्ञों को यह भी उम्मीद है कि फार्मास्यूटिकल और फूड इंडस्ट्री में भी इसका इस्तेमाल किया जा सकता है.
कैसे काम करता है हाइब्रिड मेंब्रेन
विकसित किये गये इस हाइब्रिड मेंब्रेन ग्रैफीन ऑक्साइड के मिश्रण की कोटिंग के लिए स्प्रे- ऑन टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया गया है. इसमें सोलुशन के तौर पर ग्रैफीन की कुछ परतों के साथ पॉलिविनाइल अल्कोहल के साथ मोडिफाइड पॉलिसल्फोन के मेंब्रेन के जरिये सपोर्ट दिया गया है.
यह सपोर्ट मेंब्रेन इस हाइब्रिड मेंब्रेन की मजबूती को बढ़ावा देते हैं, जो तीक्ष्ण प्रवाह व उच्च दाब बनाये रखने के साथ क्लोरीन एक्सपोजर को ज्यादा कार्यसक्षम बनाता है. यहां तक कि विकास के आरंभिक चरण में मेंब्रेन 85 फीसदी तक नमक को निकालने में कामयाब रहा है, जो पेयजल के रूप में भले ही पूरी तरह से मानक पर खरा नहीं उतर पाया हो, लेकिन खेती के कार्यों में जरूर इस्तेमाल में लाया जा सकता है. हालांकि, विविध प्रकार के कलर बनानेवाली फैक्ट्रियों से निकलने वाले प्रदूषित तत्वों को नष्ट करने में अब तक यह 96 फीसदी तक सफल पाया गया है. अाम तौर पर इन उद्योगों से निकलने वाले प्रदूषित तत्वों को दुनिया के अनेक हिस्सों में नदियों में गिराया जाता है.
क्लोरीन का इस्तेमाल आम तौर पर मेंब्रेन में बायोफौलिंग को कम करने के लिए किया जाता है, लेकिन मौजूदा पॉलिमर मेंब्रेन के कार्यप्रदर्शन को क्लोरीन तेजी से कम कर देता है. ग्रैफीन के कुछ अतिरिक्त परत मिलकर क्लाेरीन के प्रति उच्च प्रतिरोधी नये मेंब्रेनबनाते हैं.
ग्रैफीन को पहले से ही मैकेनिकल रूप से बहुत मजबूत माना जाता है और पोरस ग्रैफीन के बारे में यह अनुमान लगाया गया था कि यह नमक को 100 फीसदी तक निकालने में सक्षम है. पानी में से नमक को बाहर करने का यही गुण इसे इस लिहाज से आदर्श व सक्षम तत्व बनाता है.
हालांकि, औद्योगिक रूप से इसके इस्तेमाल में इसकी राह में अनेक चुनौतियां हैं, जिसमें नियंत्रण की बाधाएं व इसकी हैंडलिंग के लिए जटिल ट्रांसफर तकनीक की जरूरतें शामिल हैं. मौजूदा प्रयास इस लिहाज से ज्यादा कामयाब माना जा रहा है, क्योंकि यह कम लागत में सस्ते और टिकाऊ व उच्च गुणवत्ता वाले मेंब्रेन का व्यापक पैमाने पर उत्पादन करने में सक्षम हो सकता है.
ग्लोबल एक्वा इनोवेशन सेंटर
इस सिस्टम का सर्वप्रथम सार्वजनिक प्रदर्शन पिछले माह ग्लोबल एक्वा इनोवेशन सेंटर और जापान के नागानो स्थित शिंशु यूनिवर्सिटी के द इंस्टीट्यूट ऑफ कार्बन साइंस एंड टेक्नोलॉजी ने किया.
जापान की साइंस एंड टेक्नोलॉजी एजेंसी ग्लोबल एक्वा इनोवेशन सेंटर के जरिये सेंटर ऑफ इनोवेशन प्रोग्राम के तहत इस शोधकार्य को मदद मुहैया करायी गयी है, ताकि दुनियाभर में लोगों को स्वच्छ पेयजल मुहैया कराते हुए उनके जीवन स्तर को उन्नत बनाया जा सके.
9.7 करोड़ आबादी को स्वच्छ पेयजल नहीं मिल पाता है भारत में.
70 फीसदी लोग अब भी दूषित पानी पीने को मजबूर हैं देश के ग्रामीण इलाकों में.
4 फीसदी जल संसाधन ही हैं भारत में, जबकि दुनिया की 18 फीसदी आबादी बसती है भारत में.
6 घनमीटर प्रति व्यक्ति थी पानी की उपलब्धता भारत में वर्ष 1947 में.
1.5 घन मी प्रति व्यक्ति रह गयी थी पानी की उपलब्धता भारत में वर्ष 2011 में, यानी इसमें तेजी से कमी आ रही है, जो चिंताजनक है.
समुद्र के खारे पानी को पीने योग्य बनायेगा ग्रैफीन
समुद्री पानी को पीने लायक बनाने की दिशा में वैज्ञानिकों को एक बड़ी कामयाबी हासिल हुई है. वैज्ञानिकों की एक टीम ने ग्रैफीन से बनी ऐसी छलनी तैयार की है, जो समुद्र के पानी से नमक को अलग करने में सक्षम है. ‘नेचर नैनोटेक्नोलॉजी’ में प्रकाशित इस शोध रिपोर्ट के मुताबिक, इस तकनीक को बड़े पैमाने पर विकसित करने से दुनियाभर में करोड़ों लोगों की पेयजल की समस्या का निदान हो सकता है.
आमतौर पर ग्रैफीन ऑक्साइड की छलनी पानी में जाकर फूल जाती है और केवल नमक के मोटे कण ही छन पाते हैं. पानी के साथ नमक के छोटे कणों के पार हो जाने से पानी पीने योग्य नहीं हो पाता. ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ मैनचेस्टर के वैज्ञानिकों ने अब पानी में ग्रैफीन की छलनी को फूलने से बचाने का तरीका तलाश लिया है. इसकी मदद से छलनी के छिद्रों को बेहतर तरीके से नियंत्रित करना संभव हो सकता है. ऐसी छलनी से नमक के बहुत छोटे कणों को भी छानकर अलग किया जा सकता है.
विशेषज्ञ की राय
हमारा सपना एक स्मार्ट मेंब्रेन बनाना है, जो उच्च प्रवाह दर, उच्च दक्षता और ज्यादा टिकाऊ होने समेत खुद से अपनी मरम्मत करने में सक्षम होने के साथ बायो व इनॉर्गेनिक प्रदूषण को नष्ट करने में सक्षम हो, ताकि दुनिया के अधिकतर हिस्सों में, जहां स्वच्छ पेयजल दुर्लभ हैं, वहां इसके जरिये लोगों को बेहतर समाधान मुहैया कराया जा सके. अच्छी बात यह है कि इस दिशा में हम आगे बढ़ भी रहे हैं.
– मौरीसियो टेरोंस, फिजिक्स, केमिस्ट्री और मैटेरियल साइंस व इंजीनियरिंग के प्रोफेसर,
पेन स्टेट
ज्यादा प्रभावी और स्मार्ट मेंब्रेन तैयार करने की दिशा में यह पहला कदम है, जिसे संबंधित इलाकों में पर्यावरण अनुकूलता के साथ उसे ज्यादा-से-ज्यादा ग्रहणीय बनाया गया है. इससे दुनिया की एक बड़ी आबादी को स्वच्छ पेयजल मुहैया कराया जा सकता है.
– मोरीनोबू एंडो, प्रोफेसर, शिंशु यूनिवर्सिटी, जापान
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