चंद्रयान-2: कहीं इंजन में ख़राबी के चलते तो नहीं टूटा विक्रम से संपर्क

Updated at : 07 Sep 2019 11:03 PM (IST)
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चंद्रयान-2: कहीं इंजन में ख़राबी के चलते तो नहीं टूटा विक्रम से संपर्क

<p>स्पेस कमीशन के पूर्व सदस्य का कहना है कि इस बात की आशंका ज़्यादा है कि चंद्रयान -2 के लैंडर में मुख्य इंजन में खराबी आ गई हो और इसके चलते चंद्रमा की सतह पर उतरने का ये भारतीय मिशन सफल नहीं हो सका.</p><p>शनिवार सुबह इसरो के अध्यक्ष डॉ. सिवन ने सिर्फ़ इतना कहा कि […]

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<p>स्पेस कमीशन के पूर्व सदस्य का कहना है कि इस बात की आशंका ज़्यादा है कि चंद्रयान -2 के लैंडर में मुख्य इंजन में खराबी आ गई हो और इसके चलते चंद्रमा की सतह पर उतरने का ये भारतीय मिशन सफल नहीं हो सका.</p><p>शनिवार सुबह इसरो के अध्यक्ष डॉ. सिवन ने सिर्फ़ इतना कहा कि जब लैंडर चंद्रमा की सतह तक पहुंचने से केवल 2.1 किलोमीटर की दूरी पर था, उसका संपर्क ग्राउंड स्टेशन से टूट गया था.</p><p>लेकिन इसरो प्रमुख के इस बयान के अलावा इसरो ने और कोई बयान जारी नहीं किया.</p><p>स्पेस कमीशन के सदस्य रह चुके प्रो रोड्डम नरसिम्हा ने बीबीसी से कहा, &quot;असफलता का संभावित कारण यह हो सकता है कि मुख्य इंजन में कुछ गड़बड़ी आ गई हो और ये उतनी ऊर्जा पैदा ना कर पा रहा हो जितनी उतरने के लिए ज़रूरी है, आशंका है कि इसकी वजह से लैंडर का संपर्क टूट गया हो.&quot;</p><p>प्रो. नरसिम्हा ज़ोर देकर कहते हैं कि विफलता के लिए उनका &quot;संभावित विश्लेषण&quot; लाइव प्रसारण के तहत स्क्रीन पर दिखाई दे रही उस रेखा की गतिविधि पर आधारित है. वक्र (रेखा) ने दिखाया कि लैंडिंग के अंतिम चरण में किस तरह समय के साथ लैंडर अपनी ऊंचाई से अलग हुआ.</p><h3>प्रो रोड्डम नरसिम्हा का विश्लेषण</h3><p>&quot;अगर लैंडर की गतिविधि को दिखाने वाली रेखा निर्धारित सीमाओं के बीच चलती रहती तो सब कुछ ठीक रहता क्योंकि वो योजना के तहत निर्धारित था. लेकिन जैसा कि मैंने देखा कि लैंडर ने दो तिहाई रास्ता योजना के मुताबिक ही तय किया. उसके बाद जब लैंडर की रेखा ने सीमा रेखा को पार कर दिया तो एक सीधी रेखा दिखी और उसके बाद ये सीमा रेखा से बाहर चली गई.</p><p>इसकी संभावित व्याख्या इस तरह से की जा सकती है कि कुछ गड़बड़ तो हुआ जिससे लैंडर बहुत तेज़ रफ़्तार से नीचे गिरने लगा, जबकि उसे कम गति से यानी धीरे धीरे नीचे आना चाहिए था.</p><p>जब लैंडर चंद्रमा की सतह को छूता तो उसे दो मीटर प्रति सेंकेंड की गति से नीचे आना चाहिए था. ऐसा नहीं करने की स्थिति में चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण उसे तेज़ी से नीचे खींच लेता.</p><p>शनिवार को 1 बजकर 38 मिनट पर जब लैंडर को चंद्रमा पर उतारने की प्रक्रिया शुरु हुई, उस वक्त लैंडर 1640 मीटर प्रति सेकंड की रफ़्तार से आगे बढ़ रहा था. </p><p>इस दौरान रफ ब्रेकिंग और फाइन ब्रेकिंग ऑपरेशन के पहले दो चरणों तक लैंडर ठीक काम कर रहा था. ऐसा लगता है कि लैंडर `मंडराने की’ अवस्था में था कि तभी स्क्रीन पर वक्र निर्धारित रास्ते से बाहर चला गया. ” </p><h1>डॉक्टर अशोक चैटर्जी का विश्लेषण</h1><p>मगर नासा की जेट प्रपल्शन लैबरेटरी (जेपीएल) में मिशन इंटरफ़ेस मैनेजर डॉक्टर अशोक चैटर्जी का मानना है, &quot;जिस तरह से यह अचानक नीचे आया, इससे मुझे लगता है कि इसके प्रपल्शन सिस्टम में कोई गड़बड़ हुई होगी.&quot;</p><p>डॉक्टर चैटर्जी मानते हैं कि ऐसा होने की संभावना तब है जब &quot;चार में से एक या दो इंजनों में गड़बड़ी हो गई हो.&quot;</p><p>वह कहते हैं, &quot;2.1 की दूरी तक तो चारों इंजन काम कर रहे थे. सेंट्रल इंजन को तब ऑन किया जाता है जब लैंडर सतह से लगभग 400 मीटर ऊपर हो. अगर आप सतह पर पहुंचने तक चारों इंजनों को चलाए रखते हैं तो सतह का मलबा समस्या पैदा कर सकता है. सेंट्रल इंजन को वर्टिकल लैंडिंग पॉइंट पर ऑन किया जाना चाहिए.&quot;</p><p>डॉक्टर चैटर्जी उस टीम का हिस्सा थे जिसने 2009 में चंद्रयान 1 से खींची तस्वीरों की मदद से चांद की सतह पर पानी की खोज की थी. </p><p>नासा के मून मिनरोलॉजी मैपर या एम3 पेलोड ने इसके सबूत जुटाए थे. इसरो को रिमोट सेंसर्स की मदद से इसका अंदाज़ा तो था मगर नासा की जेट प्रपल्शन लैबरेटरी पानी होने की पुष्टि कर पाई थी और फिर इसकी आधिकारिक घोषणा की थी.</p><p>डॉक्टर चैटर्जी कहते हैं कि इसरो की पड़ताल के बाद ही पता चल पाएगा कि क्यों लैंडर अचानक नीचे की ओर झुका. जब तक इसके टेलीमेट्री सिस्टम का ग्राउंड स्टेशन से संपर्क रहा होगा, तब तक का डेटा इसने भेज दिया होगा.</p><h1>कहां हुई गड़बड़</h1><p>मूल योजना के अनुसार लैंडर को दो बड़े गड्ढ़ों के बीच दो स्थानों में से एक को चुनना था. </p><p>इसके बाद लैंडर को खुलना था और प्रज्ञान को बाहर निकल कर चंद्रमा की सतह पर घूमना था. </p><p>प्रज्ञान के सेंसर्स का काम विशेष रूप से दक्षिण ध्रुव में पानी और खनिजों के अस्तित्व के बारे में साक्ष्य जुटाना था. </p> <ul> <li><a href="https://www.bbc.com/hindi/india-49615868?xtor=AL-73-%5Bpartner%5D-%5Bprabhatkhabar.com%5D-%5Blink%5D-%5Bhindi%5D-%5Bbizdev%5D-%5Bisapi%5D">चंद्रयान 2: विक्रम लैंडर के साथ संपर्क टूटा, डेटा का इंतज़ार</a></li> <li><a href="https://www.bbc.com/hindi/india-49618758?xtor=AL-73-%5Bpartner%5D-%5Bprabhatkhabar.com%5D-%5Blink%5D-%5Bhindi%5D-%5Bbizdev%5D-%5Bisapi%5D">चंद्रयान- 2: भावुक इसरो प्रमुख को गले लगा थपथपाते रहे मोदी</a></li> </ul><p>ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ओआरएफ) में न्यूक्लियर एंड स्पेस पॉलिसी इनिशिएटिव की प्रमुख डॉ. राजेश्वरी राजगोपालन ने भी पर्दे पर लैंडर के आगे बढ़ने का रास्ता देखा. जब वक्र अपने निर्धारित मार्ग से हटा तो उन्होंने भी प्रोफेसर नरसिम्हा की तरह महसूस किया कि कुछ तो गड़बड़ है. </p><figure> <img alt="चंद्रयान-2" src="https://c.files.bbci.co.uk/F361/production/_108650326_gettyimages-1169342367.jpg" height="549" width="976" /> <footer>Getty Images</footer> </figure><h1>डॉ. राजेश्वरी राजगोपालन का विश्लेषण </h1><p>&quot;संभावित कारणों में से एक यह हो सकता है कि अंतरिक्ष यान के चारों कोनों पर चार इंजनों ने आधा ही काम किया हो. एक और आशंका यह भी है कि मुख्य इंजन में खराबी आ गई हो और वह चालू ही ना हुआ हो.</p><p>आंकड़ों की ग़ैरमौजूदगी में किसी एक नतीजे पर पहुंचना मुश्किल है, लेकिन स्क्रीन पर घटते वर्क ने दिखाया कि कुछ तो ग़लत था. दूसरी आशंका यह है कि जब आप अधिक गति से लैंडिंग करते हैं, तो आप बहुत अधिक धूल पैदा करते हैं जो गुरुत्वाकर्षण खिंचाव के कारण अंतरिक्ष यान को हिला देता है. लेकिन, इस मामले में एक इंजन की ख़राबी की आशंका अधिक है.&quot;</p><p>प्रो. नरसिम्हा का मानना है कि आंकड़ों के विश्लेषण में समय लग सकता है और अगले मिशन की योजना में लंबा समय लगेगा क्योंकि मौजूदा समस्याओं के समाधान की आवश्यकता होगी.</p><p>डॉ. राजगोपालन का कहना है कि चंद्रयान-2 का ऑर्बिटर अभी भी एक और साल के लिए काम करता रहेगा. यह आंकड़ों को जुटाने और उन्हें ग्राउंड स्टेशन पर भेजने में सक्षम है. और यह चांद की सतह को समझने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा.</p><p>हालांकि, इसरो के किसी भी वैज्ञानिक या पूर्व वैज्ञानिक ने चांद की सतह पर उतरने में विफलता के संभावित कारणों पर चर्चा नहीं की है. लेकिन अंतरिक्ष विज्ञान के जानकारों को ये पता है कि चंद्रमा की सतह पर लैंडिंग की सफलता की दर 35 फ़ीसदी से अधिक नहीं थी.</p><p><strong>(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप </strong><a 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