‘दलित नजर’ को समझाती फिल्में

Updated at : 05 Aug 2018 5:50 AM (IST)
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‘दलित नजर’ को समझाती फिल्में

मिहिर पांड्या, फिल्म क्रिटिक नागराज मंजुले की ‘सैराट’ और पा रंजीथ की ‘काला’, ये दोनों फिल्में प्रस्थान हैं ‘सहानुभूति’ से ‘स्वानुभूति’ की ओर. यह ‘दलित नजर’ है, जो लोकप्रिय हिंदी सिनेमा से मिसिंग थी. करण जौहर द्वारा निर्मित ‘धड़क’ ने बहस का नया पिटारा खोल दिया है. नागराज मंजुले की माइलस्टोन मराठी फिल्म ‘सैराट’ की […]

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मिहिर पांड्या, फिल्म क्रिटिक

नागराज मंजुले की ‘सैराट’ और पा रंजीथ की ‘काला’, ये दोनों फिल्में प्रस्थान हैं ‘सहानुभूति’ से ‘स्वानुभूति’ की ओर. यह ‘दलित नजर’ है, जो लोकप्रिय हिंदी सिनेमा से मिसिंग थी.

करण जौहर द्वारा निर्मित ‘धड़क’ ने बहस का नया पिटारा खोल दिया है. नागराज मंजुले की माइलस्टोन मराठी फिल्म ‘सैराट’ की ऑफिशियल हिंदी रीमेक है धड़क. अच्छा है कि अब हिंदी सिनेमा बाकायदा दूसरी भाषाओं की फिल्मों के राइट्स खरीदकर उन्हें अडॉप्ट कर रहा है, ‘प्रेरणा’ से नहीं. लेकिन ‘धड़क’ उदाहरण है समझने के लिए कि जब दलित अस्मिता के स्वघोष को ‘सवर्ण उत्तर भारतीय नजर’ से दोहराने की कोशिश की जाये, तो वह कितनी कृत्रिम हो जाती है.
इस ‘दलित नजर’ को हमें समझना होगा. यही ‘दलित नजर’ निर्देशक पा रंजीथ की तमिल फिल्म ‘काला’ में है. उत्तर भारतीय दर्शकों के लिए ‘काला’ देखना, अपने परिचित फॉर्मूला सिनेमा को विपरीत सिरे पर खड़े होकर देखने का अनोखा अनुभव है. ‘काला’ ने रामकथा को उलट दिया है. रावण यहां नायक है और छली राम खलनायक है. यह सिनेमा के पर्दे पर पूरी गमक के साथ दलित अस्मिता का उद्घोष है.
ऐसा नहीं कि हिंदी सिनेमा ने दलित उत्पीड़न की कथाएं देखी नहीं. 70-80 के दशक का समांतर सिनेमा आंदोलन सदा वंचित की कथा कहता रहा. लेकिन वह सिनेमाई भाषा मुख्यधारा सिनेमा से अलग थी, आम पब्लिक से दूर थी. लेकिन, पा रंजीथ अपनी बात लोकप्रिय सिनेमा की भाषा में कहते हैं. यहां रंग भी हैं और रैप भी. गीतों भरी प्रेम कहानियां भी हैं और अदम्य नायकीय एक्शन भी. सिनेमाई भाषा के लिहाज से यह फुल मसाला फिल्म है. संयोगों और मेलोड्रामा से भरपूर, पर नजर भिन्न है. बिंब वही, पर अर्थ उलट.
‘काला’ लोकप्रिय हिंदी सिनेमा के लिए जैसे एंटी-थीसिस है. विस्मयकारी क्लाइमेक्स में एक ओर रामायण की कथा का वाचन जारी है, वहीं धारावी झोपड़पट्टी का बहुजन महानायक काला करिकालन जैसे कथा से ऊपर उठकर उस वैचारिक युद्ध का प्रतीक बन जाता है, जो आज के शहरी भारत से लेकर दंडकारण्य के जंगलों तक जारी है. युद्ध, जो जमीन पर कब्जे के लिए सवर्ण राज्यसत्ता और बहुजन समाज के बीच लड़ा जा रहा है. और भी दिलचस्प है फिल्म का ‘स्वच्छता’ और ‘गंदगी’ के विलोम को उसके सर के बल खड़ा कर देना, जो आज के राजनीतिक परिदृश्य में कहीं ज्यादा मानीखेज है.
यहां विलेन ‘क्लीन कंट्री’ अभियान चलानेवाला और ‘डिजिटल मुंबई’ का सपना बेचनेवाला एक ऐसा राष्ट्रवादी नेता है, जिसका चेहरा शहर के हर बिलबोर्ड पर चस्पां है. काला अपने से छोटों से भी हाथ मिलाता है. वहीं भगवा पार्टी का नेता चरणस्पर्श की गैरबराबर रूढ़ि में बंधा है. पूरी फिल्म अांबेडकरवादी प्रतीकों और पहचानों से भरी है.
अच्छा है कि ये फिल्में पुराने हिंदी सिनेमा के ख्वाजा अहमद अब्बास से लेकर जावेद अख्तर जैसे मार्क्सवादी लेखकों द्वारा रची उस एकायामी समझ से बंधी नहीं है, जिसमें जाति की समस्या को क्लास प्रॉब्लम के एक बाई-प्रोडक्ट जैसे ट्रीट किया जाता रहा. नागराज मंजुले और पा रंजीथ की फिल्में प्रस्थान हैं ‘सहानुभूति’ से ‘स्वानुभूति’ की ओर. यह ‘दलित नजर’ है, जो लोकप्रिय हिंदी सिनेमा से मिसिंग थी.
मिहिर पांड्या, फिल्म क्रिटिक
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