शिक्षामित्रों को मिली कलकत्ता हाइकोर्ट से बड़ी जीत
Published by : Prabhat Khabar News Desk Updated At : 27 Apr 2023 12:35 PM
गौरतलब है कि वर्ष 2004 में वाममोरचा के कार्यकाल के दौरान सर्व शिक्षा अभियान के तहत शिक्षामित्रों की भर्ती की प्रक्रिया शुरू हुई. उस समय शिक्षकों को 2400 रुपये प्रति माह भत्ता मिल रहा था.
शिक्षामित्रों को कलकत्ता हाइकोर्ट से बड़ी जीत मिली है. बुधवार को कलकत्ता हाइकोर्ट के न्यायाधीश रवींद्रनाथ सामंत ने इससे संबंधित मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि शिक्षामित्रों को 60 साल तक काम करने का अधिकार है. कोर्ट ने उन लोगों को काम पर लौटने का आदेश दिया है, जिन्हें 2014 के बाद से काम करने के रुपये नहीं मिले हैं. न्यायमूर्ति रवींद्रनाथ सामंत की अध्यक्षता वाली एकल-न्यायाधीश की पीठ ने निर्देश दिया है कि जिन लोगों को काम से वंचित किया गया था, उन्हें उनके पिछले स्कूल में बहाल किया जाये.
न्यायमूर्ति रवींद्रनाथ सामंत ने फैसले की घोषणा करते हुए कहा कि संविधान में मुफ्त शिक्षा के प्रावधान का उल्लेख है. निस्संदेह, शिक्षामित्र ऐसा ही करते हैं. इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि उनका काम अवैध है. इसी पर उनकी रोजी-रोटी निर्भर है. अतः राज्य उन्हें रोजगार से समाप्त करने से पहले स्पष्ट रूप से सूचित करे कि किस कानून के आधार पर उन्हें इस अधिकार से वंचित किया जा रहा है, जिनका रोजगार 60 साल पहले तक तय है.
गौरतलब है कि वर्ष 2004 में वाममोरचा के कार्यकाल के दौरान सर्व शिक्षा अभियान के तहत शिक्षामित्रों की भर्ती की प्रक्रिया शुरू हुई. उस समय शिक्षकों को 2400 रुपये प्रति माह भत्ता मिल रहा था. 2011 में तृणमूल कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद, 2013 से राज्य सरकार ने शिक्षामित्रों की स्थिति को स्वयंसेवकों में बदल दिया और फिर अप्रैल 2014 से राज्य सरकार ने शिक्षकों का भत्ता बंद कर दिया. इसके खिलाफ शिक्षामित्रों ने हाइकोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसकी सुनवाई करते हुए हाइकोर्ट ने यह आदेश दिया.
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आसनसोल स्थित काजी नजरूल यूनिवर्सिटी (केएनयू) के अंदर चल रहे धरने और आंदोलन पर कलकत्ता हाइकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है. बुधवार को इससे संबंधित मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति राजशेखर मंथा ने कहा कि शिक्षण संस्थान में धरना या आंदोलन किसी भी तरह से बर्दाश्त नहीं किया जायेगा. न्यायाधीश ने कहा कि शिक्षा को नुकसान पहुंचाकर धरना चलाने का अधिकार नहीं है. न्यायाधीश ने आसनसोल सीपी को तत्काल कार्रवाई करने का निर्देश दिया. उन्होंने निर्देश दिया कि धरना स्थल को परिसर के अंदर से हटाया जाए. पुलिस इसे जल्द से जल्द हटाने के लिए कदम उठाएगी. जरूरत पड़ी तो बल प्रयोग किया जाएगा. मुख्य द्वार से 50 मीटर की दूरी पर धरना जारी रह सकता है.
हालांकि, न्यायाधीश ने आदेश दिया कि शिक्षकों और छात्रों को परिसर में प्रवेश करने से नहीं रोका जा सकता है. विश्वविद्यालय के डिप्टी रजिस्ट्रार ने हाइकोर्ट में याचिका दायर कर कहा था कि धरने के मंच के कारण संविदा कर्मियों को विश्वविद्यालय चलाने में परेशानी हो रही है. पुलिस को बुलाने के बाद भी कोई समाधान नहीं हुआ. डिप्टी रजिस्ट्रार ने कहा कि शिकायत के मद्देनजर वीसी के फैसले से रजिस्ट्रार को पहले ही बर्खास्त किया जा चुका है. कोर्ट ने उस आदेश पर कोई रोक नहीं लगायी.
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