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हिंदी कहानी : खुशबू खूबलाल मिठाई दुकान

शाम को जब दुकानबढ़ा कर खूबलाल हलवाई घर पहुंचे तो पत्नी कलावती दरवाजे पर ही खड़ी थी. उन्हें देखकर निहाल होकर बोली- तुम भी खूब करते हो जी, पूरा गांव जवार खुशी बांट कर चला गया और तुम्हें अब बखत मिला घर आने का. वो भी खाली हाथ.

जो लोग चलते नहीं हैं, उन्हें पता नहीं चल पाता कि वो जंजीरों में जकड़े हुए है’ – रोजा लक्समबर्ग

जब से सिपाही भर्ती का परिणाम आया था सब के जुबान पर उसकी ही चर्चा थी. कौन खुशकिस्मत निकला. किसके भाग्य ने अब तक साथ नहीं दिया. आखिर इसी एक दिन के लिए ही तो मूंह अंधेरे से गांधी मैदान में दौड़ लगाते थे अभ्यर्थी. इसी एक दिन के लिए तो माएं मंदिरों में मन्नतें मांगती थीं. इसी एक दिन के लिए तो कईयों को कई रातों से नींद नहीं आ रही थी. लेकिन अब पूरे पांच हजार लोगों की किस्मत चमकी थी. कई घरों में तो बकायदा जश्न शुरू हो गया था. लेकिन खुशबू के घर में खामोशी पसरी थी.

यूं तो खुशबू के पिता खूबलाल हलवाई को अब तक कई लोगों ने बधाई दे दी थी लेकिन उनका मन ठीक नहीं था. सलवार कमीज पहनने वाली बेटी पतलून शर्ट में मर्दों के साथ रात-रात भर काम करेगी इसका ख्वाब ही उन्हें डरा रहा था. कहीं कुछ ऊंच नीच हो गयी तो. माना बेटी सिपाही बन जायेगी, लेकिन रहेगी तो लडकी ही न. इससे तो अच्छा होता कि वो अपनी बड़ी बेटी पूनम की तरह खुशबू की भी किसी ठीक ठाक परिवार में शादी कर देते. कम से कम उसकी चिंता तो नहीं करनी पड़ती. लेकिन अब क्या करें.

शाम को जब दुकान बढ़ाकर खूबलाल हलवाई घर पहुंचे, तो पत्नी कलावती दरवाजे पर ही खड़ी थी. उन्हें देखकर निहाल होकर बोली- तुम भी खूब करते हो जी, पूरा गांव जवार खुशी बांट कर चला गया और तुम्हें अब बखत मिला घर आने का. वो भी खाली हाथ. क्या दुकान पर ही सारी मिठाइयां बांट दी जो घर के लिए न ला सके.

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‘ अरे नहीं, माथा दुःख रहा है, आज सुबह से ही.’ कहते हुए खूबलाल ने अपनी बनियान निकाली और लंबा गलियारा पार करते हुए कमरे में जा घुसे. गलियारे पर दूसरे छोर पर खड़ी खुशबू के माथे पर हाथ भी न रखा. न ही उसे देख मुस्कुराए.

कमरे में भी जाकर खूबलाल औंधे मुंह बिछावन पर जा लेटे. खुशबू आयी ताक झांक कर चली गयी. कलावती आयी माथा सहला कर चली गयी लेकिन खूबलाल जबरन आंखे मूंदे रहे. रात का खाना भी न खाया. सुबह उठकर चाय भी न मांगी. लेकिन जब बिना नाश्ता किये दूकान जाने लगे तब कलावती रास्ते में खडी हो गयी.

‘अकल मारी गयी है क्या तुम्हारी. बेटी ने नाम रौशन कर दिया हमारा और तुम्हारे चेहरे पर बारह बजे हैं. फनी बाबू का मंझला लड़का पटना जाकर तैयारी कर रहा था फिर भी उसका रिजल्ट नहीं आया. हमारी बेटी ने घर बैठे रिजल्ट निकाल लिया ये क्या कम खुशी की बात है.

‘नहीं, ऐसा नहीं है. खुशी की बात तो है’ खूबलाल ने धीमे स्वर में जवाब दिया.

‘बात है तो खुश काहे नहीं हो जी’ कलावती सीधा जवाब चाहती थी.

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‘कैसे खुश हो जाऊं, बताओं तुम्ही. पुलिस की नौकरी लगी है हमारी बेटी की. कोई मास्टरनी नहीं बनी है. कौन चाहेगा पुलिस वाली को अपनी बहू बनाना. कहां रिश्ता ढूंढेंगे उसके लिए. कहां ब्याह करेंगे उसका.’ एक सांस में बोल गए खूबलाल.

कलावती चुप हो गयी. उसे बेटी के रिजल्ट की खुशी थी. बहुत खुशी. जो कारनामा लोगों के बेटों ने न किया था वो उसकी बेटी ने कर दिखाया था. लेकिन रिजल्ट के बाद बेटी की नौकरी होगी और अगर नौकरी होगी तो ब्याह कैसे होगा ये उसने न सोचा था. सच में उसके दूर-दूर के खानदान में लड़कियों ने नौकरी न की थी. पुलिस की नौकरी तो किसी लड़के की भी न थी.

‘मैं तो कहता हूं कलावती, तुम बिटिया को समझा बुझा लो. हमे नहीं करानी पुलिस की नौकरी अपनी बेटी से. दिन रात मर्दों के साथ उठने बैठने वाली नौकरी. न दिन रात का पता न मर्द औरत का. उस पर से पुलिस वाले होते बड़े खराब हैं. उनके साथ कैसे रह पाएगी हमारी फूल सी बिटिया.

‘ बाबूजी, ऐसा न कहो. मुझे ये नौकरी करनी है. इतनी मेहनत की है, इतनी पढाई की है तब जाकर नौकरी मिली है मुझे. अब मैं न छोडूंगी ये नौकरी.’

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दरवाजे की आड़ में खडी सारी बात सुन रही खुशबू बीच में बोल पड़ी. वो कल रात से ही अपने पिता की मंशा समझ रही थी और तभी पक्का इरादा भी कर लिया था कि चाहे जो हो नौकरी तो वो पुलिस की कर के रहेगी.

‘पर बिटिया हमे तेरा ब्याह भी तो करना है”

‘बाबूजी उसकी अभी क्या जल्दी है. अभी कुछ बरस नौकरी कर लेने दो. फिर जब ब्याह का सोचोगो और दिक्कत होगी तो छोड़ दूंगी नौकरी.

खूबलाल को यह बात जंची.

ठीक ही तो कर रही है बेटी. नौकरी छोडनी तो अपने हाथ में है लेकिन लेनी तो अपने हाथ में नहीं रहती हमेशा.

तीन बरस बीत गए. इक्कीस की खुशबू चौबीस की हो गयी. चाल चलन रहन सहन सब बदल गया. जो लडकी कभी बिना दुपट्टे के घर से बाहर न निकलती थी वो पायजामा टी शर्ट में घूमने लगी. जिसका सर बड़ों के आगे न उठता अब लोग उससे डर कर बात करते. कान में छोटे छोटे हीरे के टॉप्स पहनने लगी खुशबू, कलावती के गले में सोने की चेन चली आयी. अब तक तो खूबलाल की दूकान भी बदल गयी. टीन की छत पक्के में बदल गयी, काउंटर में सजे मोतीचूर के लड्डू के बगल में पेस्ट्री आ गयी. घर में भी रंगीन टी वी आ गया. पानी की टंकी बैठ गयी.

तीन बरस में खूबलाल भी थोडा चमक गए लेकिन उनकी चिंता भी बढ़ती गयी. खुशबू के ब्याह की चिंता दिनों दिन बढ़ती गयी| शुरुआती एक दो साल तो उन्होंने लड़के नहीं देखे. लेकिन खुशबू का चौबीसवा चढ़ते वो लड़के वालों के घर की सीढीयां चढ़ने लगे. हर जगह से उन्हें निराशा ही हाथ लगी. लड़के वाले यह सुनते ही कि लडकी महिला सिपाही है ना नुकुर कर देते. नौकरी वाला कहता हमे तो हाउस वाइफ चाहिए वरना जीवन बंजारे की तरह गुजर जाएगा. स्थाई घर गृहस्थी वाला कहता हमें किस चीज की कमी है जो बहू को नौकरी करवाए. कई बार तो पुलिस की नौकरी सुन कर विचित्र बहाने बनाने लगते लड़के वाले. कभी कहते अभी हमे लड़के की शादी नहीं करनी दो साल बाद करेंगे. फिर दो महीने बाद खबर आती कि लड़के की शादी दूसरी जगह फिक्स हो गयी. कोई कहता कि पहले मकान बनवायेंगे फिर शादी करेंगे. फिर एक दिन खबर आती कि उसी पुराने घर में नयी बहू आ गयी उनकी. इस तरह हर दरवाजे से जार बेजार होकर लौटते सिपाही बेटी के पिता.

खूबलाल कई बार सोचते, काश खुशबू बेटी नहीं बेटा होती. फिर तो लडकी वाले दुआर कोड देते. फिर सोचते जाति ही उनकी हलवाई न होकर ब्राह्मण भूमिहार होती. तो थोड़ा करेजा वाले होते लड़के वाले और सिपाही बहू को गर्व से घर लाते. अरे छोटी जाति भी होती तब ठीक था. लेकिन यहां तो न तीन में रह गए थे न तेरह में.

उस वक्त तो पूरे परिवार ने खुशी खुशी सोच लिया था कि जब शादी का वक्त आयेगा तब नौकरी छोड़ देंगे. लेकिन अब तो उन्हें वर्दी में बेटी को देखने की और बेटी को हर महीने खाते में पैसे आने की आदत हो गयी थी. दूकान के आस पास वाले अब खूबलाल से गलती से भी न उलझते. एक बार एक ग्राहक मिठाईयां खाकर बिना पैसे दिए जा रहा था. दूकान पर काम कर रहे चेले ने ही बता दिया कि खूबलाल जी की बेटी थानेदार है. बेचारा चुपचाप दो सौ रुपये दे गया. गांव की जमीन पर पड़ोसी कब्जा कर रहे थे, खुशबू की नौकरी की बात सुन अपना बोरा टंटा खुद ही पीछे कर लिया. अब ऐसे भाव वाली नौकरी छोड़ने को बेटी से कहे इसकी हिम्मत खूब लाल को न होती. लेकिन बेटी का ब्याह भी तो करना था.

अब तो दूकान पर आने वाले एक्का दुक्का लोग पूछने लगे थे कि बिटिया का ब्याह कब कर रहे हैं.

एक मजाकियां रिश्तेदार ने तो यहाँ तक कह दिया था कि खूबलाल भाई को बेटी की कमाई खाने की आदत लग गयी है इसलिए उसका ब्याह नहीं कर रहे हैं.

खूबलाल के पूरे शरीर का खून सूख गया था तब. कभी कभार कलावती से सारी बाते करते तो वो साहस देती- जी छोटा न करो जी. कोई तो मिल ही जाएगा अपनी खुशबू के लिए. जो उसके भी इज्जत देगा और उसके काम को भी.

दो साल और गुजर गए. इस बीच एक बार खुशबू का नर्वस ब्रेक डाउन हुआ. विभाग का ही कोई बड़ा अफसर उसे पसंद आया था. उससे रात भर बातें करती. खूबलाल भी ऐतराज नहीं जताते. सोचते सिपाही बेटी पर इतना गर्व है तो पदाधिकारी दामाद पर कितना गर्व होगा. कलावती भी ज्यादा टोका टाकी न करती. उसे लगता अगर अब न बदलेगी तो कभी न बदलेगी. नया ज़माना है नया रिवाज है. इधर खुशबू की भी दिन रात की ड्यूटी लगती रहती, सो मां बेटी आपस में ज्यादा बात न कर पाती. फिर जाने एक दिन क्या हुआ खुशबू घर लौटी तो माथा गर्म था, आंखे चढ़ी हुयी थी. उस रात खुशबू ने खाना नहीं खाया. कहा कि पंद्रह दिन की छुट्टी ली है. थोड़ी तबियत ठीक नहीं है.

कलावती को लगा कि शायद दिन रात की ड्यूटी से थक गयी है. लेकिन जब रात को सोयी रही और अगले दिन दोपहर तक न उठी तो कलावती का जी घबराने लगा. कमरे में जाकर देखा तो पसीने ले लत पत पडी थी और पूरा शरीर कांप रहा था. उसे लिए खूबलाल और कलावती डॉक्टर की तरफ भागे. पुलिस की नौकरी से जो थोड़ी बहुत जान पहचान बनी थी उसका फायदा उठाया. इलाज में देरी न हुयी. खुशबू की कुछ महिला सिपाही दोस्त अस्पताल पहुंच गयीं. कुछ और लोग भी आये. डॉक्टर ने अच्छे से इलाज किया और खुशबू होश में आ गयी. खूबलाल उसे वापस घर ले आये. डॉक्टर ने बताया था कि नर्वस ब्रेक डाउन है. बहुत अधिक तनाव लेने से हो जाता है. खूब ख्याल रखने की भी हिदायत दी. घर आकर भी खुशबू दस दिन तक गुमसुम ही बैठी रही. कलावती उसकी पसंद का खाना बनाती खुशबू दो कौर खाकर छोड़ देती. खूबलाल उसकी पसंद की मिठाई लाते. खुशबू उन पर एक नजर ना डालती. खूबलाल और कलावती दोनों रात भर आंखों आंखों में कांटते. जवान बेटी की चिंता उन्हें सोने न देती. मन ही मन उन्होंने तय कर लिया कि अबकी अगर खुशबू ठीक हो गयी तो उसे नौकरी न करने देंगे. आग लगे ऐसी नौकरी में जिसमे बेटी की जान पर बन आये.

जिस रात दोनों ने इसका पक्का इरादा किया उसके अगले दिन ही जब कलावती खुशबू के कमरे में गयी तो वो बिछावन पर न थी. कलावती का खून सूख गया. वो खूबलाल को खबर देने के लिए भागी लेकिन दरवाजे पर जाकर ठिठक गयी. बाहर से ट्रैक सूट में खुशबू अन्दर चली आ रही थी. पसीने से तर बतर. जैसे खूब भागकर आयी हो. एक हाथ में अखबार थामे हुए उसने जूते उतारे और चाय का कह कर नहाने चली गयी. नहाकर जब खुशबू ने वर्दी पहनी तब दोनों चौके- ‘आज से ड्यूटी लग गयी क्या बेटी’.

‘हां बाबूजी, घर में मेरा अब मन ना लग रहा है. ड्यूटी पर जाऊंगी तो थोडा अच्छा लगेगा.’

खूबलाल और कलावती कल रात की बात जुबान पर न ला सके. बेटी जिसमे खुश उसमे ही तो उनकी खुशी थी. उस दिन जब खुशबू ने तैयार होकर वर्दी पहनी तब उसे देख कलावती की आंखें जुड़ा गयीं. अपनी पैदा की गयी बेटी कितनी जंचती है पुलिस की वर्दी में. खूबलाल ने उस दिन उसके जूते खुद ही पालिश कर दिए. क्या किसी डी एस पी से कम है अपनी बेटी. उस दिन से खुशबू भी बदल गयी. समय की पाबंद हो गयी. समय पर सोती, समय पर जगती और फिटनेस का खूब ध्यान रखती.

इसी बीच खूबलाल को एक लड़का मिल गया. दारोगा था लड़का बिहार पुलिस में. उसे खुशबू की नौकरी से बहुत खुशी न थी तो बहुत दुःख भी न था. जरा कठोर जरा चिड़चिड़ा सा था. लेकिन खुशबू से शादी को राजी था. खूबलाल को इससे ज्यादा क्या चाहिए था. दस लाख कैश और एक फोर व्हीलर पर बात बनी. आधा कैश दिला गया. फोर व्हीलर खरीद कर दरवाजे पर लग गया. शुक्रवार को बरात आने वाली थी और बुधवार को खबर आयी कि लड़के के पिता गुजर गए.

घर में मातम छा गया. लेकिन अब क्या किया जा सकता था. ब्याह टल गया या तय तारीख को होगा ये पूछने की भी हिम्मत लड़की वालों को न हो रही थी. जैसे तैसे करके कुछ दिन कटे. जब बरखी बीत गयी तो खूबलाल कपड़ा वगैरह लेकर लड़के वालों के घर गए. लेकिन जैसा डर था वैसा ही हुआ. लड़के वालों ने न तो उन्हें बैठने को कहा न चाय नाश्ते का पूछा. बात समझते देर न लगी कि उन्हें लग रहा था कि लड़की अपशकुनी है. चलते समय यह भी सुना दिया कि हफ्ते भर में पांच लाख वापस कर देंगे. खूबलाल को पांच लाख से ज्यादा चिंता गाड़ी की थी. घर लौटते समय ही उन्होंने तय कर लिया कि जाकर ही गाड़ी वापस कर देंगे. अभी तो एक किलोमीटर भी न चली है गाड़ी. फिर मन में खुशबू का भी ख्याल आया. पिछली बार का ब्रेक डाउन याद था उन्हें. उस समय तो एक पल को लगा था कि बेटी से ही हाथ धो बैठेंगे. पर आज वो ऐसा कुछ न होने देंगे. जाकर ही कह देंगे कि खुद मना कर आये. वरना लड़का वाला तो चाहता ही था.

खूबलाल घर पहुंचे. घर पर अब भी उदासी पसरी थी. सब चुप थे, एक खुशबू ही सोफे पर बैठी टीवी देख रही थी. बाबूजी को घर आया देख उठ कर उनके कमरे में आ गयी. खूबलाल ने खुशबू के हाथों में लगी मेहंदी देखी. फिर एक लंबी सांस ली और कहा – ‘लड़के वालों ने शादी से मना कर दिया.’

अब तक तो इरादा करके आये थे कि सच नहीं बतायेंगे. लेकिन पत्नी और बेटी को सामने पाकर झूठ नहीं बोल पाए.

‘कोई बात नहीं बाबूजी. अच्छा ही हुआ.’ ये खुशबू थी.

‘बेटा तुझे बूरा नहीं लगा.”

‘नहीं बाबूजी. मुझे वो लड़का तो ऐसे ही पसंद नहीं था. कोहड़े जैसी शकल थी उसकी. और मुस्कुराना तो उसे आता ही नहीं था. ऐसा लड़का मुझे क्या किसी लडकी को पसंद न हो.

‘फिर तूने शादी के लिए हां क्यों की?

‘क्योंकि आप चाहते थे बाबूजी, आपके लिए हां कर दी.’

खूबलाल को लगा जैसे जी का बोझ थोडा उतरा.

‘बेटा मुझे माफ़ कर दे, तेरे लिए अच्छा लड़का नहीं ढूंढ पा रहा हूं. मैं अच्छा बाबूजी नहीं बन पाया बेटी. खूबलाल फूट फूटकर रोने लगे. खूबलाल ने खुशबू के हाथों को अपने हाथों में लेकर कहा.

‘बाबूजी आपने मुझे पढ़ाया लिखाया. नौकरी करने लायक बनाया. दुःख सुख में साथ रहे. इससे अच्छा बाप क्या होता है. लड़कियां सिर्फ शादी करने के लिए तो पैदा नहीं होती न बाबूजी. और मुझे तो अभी शादी नहीं करनी. अभी मुझे और पढ़ना है और अफसर बनना है. शादी जब होनी है होगी. न भी होगी बाबूजी तो कोई बात नहीं. मैं अपनी जिंदगी से खुश हूं. बाबूजी आपको पता है मुझे खुशी कब मिलती है. जब मैं वर्दी पहनकर जूते के फीते कसती हूं, मुझे बड़ी खुशी मिलती है. जब मैं ग्राउंड पर दौडती हूं और हवा मेरे माथे की पसीने को ठंडा करती है मुझे बहुत खुशी मिलती है. जब मैं घोर अंधेरी रात में सड़क से जा रहे किसी संदिग्ध को टोकती हूं मुझे बहुत खुशी मिलती है. मैं इतनी जिम्मेदारी वाला काम करती हूं. मेरी वजह से कितनी लड़कियां सुरक्षित महसूस करती हैं. मैं किसी के सामने हाथ नहीं फैलाती. मुझे इस बात का क्या कम गर्व है.

बाबूजी पता है, जो लोग चलते हैं वो गिरते हैं. उनको चोट भी लगती है. दर्द भी होता है. लेकिन वो फिर भी चलते हैं. रुकते तो नहीं न. मेरी भी जब नौकरी लगी मैंने चलना सीखा. गिरी भी लेकिन उठी भी तो. थोडा टूटी भी लेकिन कुछ जंजीरों को तोड़ा भी तो. मुझे अपनी जिंदगी में चलना है बाबूजी. रुकना नहीं है.

बाबूजी आप मेरी चिंता न करो. अपने पांच लाख की चिंता करो जो लड़के वालो को दे आए हो.’ खुशबू ने माहौल हल्का करने की कोशिश की.

‘वो तो मैं ले लूंगा बेटी. और आज ही जाकर गाड़ी भी वापस कर दूंगा.’

‘अच्छा तो गाड़ी उस कोहड़े की शक्ल वाले लड़के के लिए थी, मेरे लिए न थी.’

‘तेरे लिए ही थी बेटा लेकिन…’

‘तो गाड़ी की चाबी मुझे दो बाबूजी. अभी दस दिन की छुट्टियां बची हैं. मैं अपनी गाड़ी से अपना देश घूमना चाहती हूं बाबूजी. वो भी अकेले. सोलो ट्रिप कहते हैं इसे.’

‘बेटा, तुझे गाड़ी चलानी आती है.’

‘तो आपको क्या लगता है बाबूजी. हमारी नाईट ड्यूटी पर हम खर्राटे लेते हैं. गाड़ी चलाना सीख लिया है मैंने और सोलो ट्रिप पर जाने की बड़ी ख्वाहिश है मेरी. अच्छा हुआ जो ब्याह न हुआ. वरना मेरे तो सारे अरमान ही अबकी टूट जाने थे.

बाप बेटी की अंत हीन बातचीत शुरू हो गयी.

अगले दिन जो लोग भी शादी टूटने का दुःख मनाने खूबलाल की दूकान पर आये दुःख न मना सके. खूबलाल ने अपनी दूकान के ऊपर एक बड़ा सा बोर्ड लगा रखा था- ‘खुशबू खूबलाल मिठाई दूकान’.

डॉ प्रीति प्रकाश, संपर्क : ब्लॉक वेलफेयर ऑफिसर, शिवहर ब्लॉक ऑफिस, शिवहर, बिहार, मो. – 7667437178

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