झारखंड: कार्तिक पूर्णिमा पर ओड़िया समुदाय का ‘बोईत बंदाण’ उत्सव, नदी में छोड़ते हैं केले के छिलके से तैयार नाव

Published by :Guru Swarup Mishra
Published at :27 Nov 2023 5:30 AM (IST)
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झारखंड: कार्तिक पूर्णिमा पर ओड़िया समुदाय का ‘बोईत बंदाण’ उत्सव, नदी में छोड़ते हैं केले के छिलके से तैयार नाव

वर्षों पूर्व ओड़िया समुदाय के लोग कार्तिक पूर्णिमा के दिन से बड़े-बड़े नाव (पानी जहाज) पर सवार होकर वाणिज्य-व्यवसाय करने के लिए जाते थे. कार्तिक पूर्णिमा पर ‘बोईत बंदाण’ के दौरान लोग राज्य के प्राचीन समुद्री इतिहास को चिह्नित करने के लिए केले के पेड़ की छाल से बनी छोटी नाव पानी में छोड़ते हैं.

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सरायकेला, शचिंद्र कुमार दाश: कार्तिक पूर्णिमा को ओड़िया समुदाय का सबसे पवित्र व पुण्य दिन माना जाता है. ओड़िया समाज के लोग कार्तिक पूर्णिमा पर ‘बोईत बंदाण’ उत्सव के रूप में मनाते हैं. सोमवार को सूर्योदय के पूर्व ब्रह्म मुहूर्त में ओड़िया समुदाय के लोग नदी में स्नान कर केले के पेड़ के छिलके से तैयार नाव छोड़ेंगे. इसके अलावा कार्तिक पूर्णिमा को लेकर थर्माकोल से बनी रंग-बिरंगी नाव भी लोग नदी-सरोवर में छोड़ते हैं. यह त्योहार ओड़िया समुदाय की ऐतिहासिक वाणिज्य यात्रा से जुड़ा हुआ है.

नदी में छोड़ते हैं नाव

वर्षों पूर्व ओड़िया समुदाय के लोग कार्तिक पूर्णिमा के दिन से बड़े-बड़े नाव (पानी जहाज) पर सवार होकर वाणिज्य-व्यवसाय करने के लिए नाव पर सवार हो कर जाते थे. कार्तिक पूर्णिमा पर ‘बोईत बंदाण’ के दौरान लोग राज्य के प्राचीन समुद्री इतिहास को चिह्नित करने के लिए थर्मोकॉल, रंगीन कागज या केले के पेड़ की छाल से बनी छोटी नाव पानी में छोड़ते हैं.

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ओड़िया समुदाय के समृद्ध समुद्री इतिहास की याद दिलाता है ‘बोईत बंदाण’ उत्सव

ओड़िया संस्कृति के जानकार प्रो अतुल सरदार ने बताया कि पहले ओड़िया समुदाय के लोग समुद्री मार्ग से व्यापार करने के लिए बड़े-बड़े पानी जहाज से देश-विदेश के विभिन्न क्षेत्रों में जाते थे. मान्यता है कि पहले नाव के सहारे ओडिशा के व्यापारी जावा, सुमात्रा, बोर्नियो व श्रीलंका जैसे कई देशों में कारोबार के लिए जाते थे. बारिश के मौसम में व्यापारिक यात्रा बंद हो जाती थी. बारिश का मौसम खत्म होने के बाद कार्तिक पूर्णिमा के दिन फिर से इस यात्रा की शुरुआत की जाती थी. बारिश के बाद शुरू होने वाली यात्रा के दौरान कोई बाधा न आए और व्यापार आगे बढ़े, इसके लिए पूजा की जाती थी. सदियों पुरानी परंपरा अभी भी जीवंत है. ‘बोईत बंदाण’ त्योहार को इसी की याद में मनाया जाता है.

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Guru Swarup Mishra

लेखक के बारे में

By Guru Swarup Mishra

मैं गुरुस्वरूप मिश्रा. फिलवक्त डिजिटल मीडिया में कार्यरत. वर्ष 2008 से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से पत्रकारिता की शुरुआत. आकाशवाणी रांची में आकस्मिक समाचार वाचक रहा. प्रिंट मीडिया (हिन्दुस्तान और पंचायतनामा) में फील्ड रिपोर्टिंग की. दैनिक भास्कर के लिए फ्रीलांसिंग. पत्रकारिता में डेढ़ दशक से अधिक का अनुभव. रांची विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में एमए. 2020 और 2022 में लाडली मीडिया अवार्ड.

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