1971 के भारत-पाक युद्ध में शहीद प्रभुदान हेमरोम का परिवार है उपेक्षित, इंदिरा गांधी ने दिया था संवेदना पत्र

Jharkhand News: शहीद के परिवार वालों को मेडिकल की भी कोई सुविधा नहीं मिलती है. उन्होंने बताया कि खेतीबारी कर परिवार का गुजर-बसर करते हैं. प्रभुदान हेमरोम को सेना द्वारा मरणोपरांत सेवा मेडल दिया गया.
Jharkhand News: 1971 की भारत-पाक लड़ाई में शहीद सैनिक प्रभुदान हेमरोम का परिवार आज भी उपेक्षित है. वे झारखंड के खूंटी जिले के तोरपा प्रखंड के झटनीटोली गांव के रहने वाले थे. गांव में उनके छोटे भाई डेविड हेमरोम परिवार के साथ रहते हैं. प्रभात खबर से बात करते हुए उन्होंने बताया कि 1962-63 में प्रभुदान हेमरोम सेना में बहाल हुए थे. 1971 में बांग्लादेश के उदय के समय पाकिस्तान से हुई लड़ाई में शहीद हो गये थे. उनकी शहादत के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का लिखा संवेदना पत्र भी परिवार वालों के पास है. जिसमें उन्होंने लिखा है कि प्रभुदान की शहादत से देश लोग कृतज्ञ है.
प्रभुदान हेमरोम की शहादत के बाद गांव के ही एक अन्य सैनिक पतरस हेमरोम ने उनका जूता, कपड़ा आदि लाकर दिया था. प्रभुदान को वहीं पर दफनाया गया था, जहां अल्बर्ट एक्का को दफनाया गया था. छोटे भाई डेविड हेमरोम बताते हैं कि उनके कब्र की मिट्टी गांव लायी जाये. उन्होंने बताया कि गांव में उनके नाम से एक पत्थर लगाया गया है. प्रभुदान अविवाहित थे. प्रभुदान के परिवार को फिलहाल कोई सुविधा नहीं मिलती है. उनकी शहादत के बाद उनकी मां मेरी मुंडाइन को पेंशन मिलती थी. पेंशन के रूप में महज 1500 रुपये ही मिलता था. मां की मृत्यु मार्च 2000 में हो गयी. उसके बाद से पेंशन मिलना भी बंद हो गया.
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शहीद प्रभुदान हेमरोम के परिवार वालों को मेडिकल की सुविधा नहीं मिलती है. उन्होंने बताया कि खेतीबारी कर परिवार का गुजर-बसर करते हैं. प्रभुदान हेमरोम को सेना द्वारा मरणोपरांत सेवा मेडल दिया गया. इसके अलावा उन्हें उत्कृष्ट सेवा के चार अन्य मेडल भी दिए गये. उनकी शहादत के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का लिखा संवेदना पत्र भी परिवार वालों के पास है. जिसमें उन्होंने लिखा है कि प्रभुदान की शहादत से देश कृतज्ञ है.
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