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हेमंत कुमार की मगही कविता – पर्यावरण बचाहो और बड़ी निमन मगही भाषा

मगही कवि हेमंत कुमार की दो रचनाएं इस बार प्रभात खबर के दीपावली विशेषांक में छपीं हैं. ‘पर्यावरण बचाहो’ और ‘बड़ी निमन मगही भाषा’ आप यहां पढ़ें...

पर्यावरण बचाहो

पर्यावरण बचाहो तऽ बचतो जिनगानी,

पेड़-पौधा लगाहो तऽ बचतो जिनगानी।

शुद्ध हवा मिलतो नीमिया गछिया,

पीपर नीचे बांधहो गैया-बछिया ।

जंगल के काटे के करहो नै नादानी,

पर्यावरण बचाहो तऽ बचतो जिनगानी।

चान, सुरुज, बदरा आऊ तारा,

परकिरती के बड़ी निमन नजारा।

गंगा के बनाहो नै तों कूड़ेदानी,

पर्यावरण बचाहो तऽ बचतो जिनगानी।

नदिया- सागर, ताल- तलैया,

मलयगिरी हवा झोंका पूरबैया।

एकर धारा साथ नै करहो छेड़खानी,

पर्यावरण बचाहो तऽ बचतो जिनगानी।

बंद करऽ ई काला धुआं,

ई तऽ हो मौत के कुआं।

नहर-पोखर सूख रहलो, दुर्दिन के हो निशानी,

पर्यावरण बचाहो तऽ बचतो जिनगानी।

कारखाना के जहर फैल रहलो,

जंगल काट शहर बस रहलो ।

मशीन निगल गेलो बैल आउर बथानी,

पर्यावरण बचाहो तऽ बचतो जिनगानी।

रंगन-रंगन के फैलल परदूषण,

आदमी बन गेल राछस खर-दूषण।

शुद्ध हवा बिन मर जइबा सभे प्राणी,

पर्यावरण बचाहो तऽ बचतो जिनगानी।

किसिम-किसिम के खाद-दबाई,

मुनाफा ले सभे बनल कसाई ।

धरती संग काहे करो हो बेईमानी?

पर्यावरण बचाहो तऽ बचतो जिनगानी।

चेतऽ नै तऽ सभे बन जइबा डायनासोर,

थामऽ आबादी नै तऽ कोरोना फैलतो जोर।

परकिरती मचैतो परलय, खतम होतो कहानी,

पर्यावरण बचाहो तऽ बचतो जिनगानी।

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बड़ी निमन मगही भाषा

बड़ी निमन मगही भाषा,

हम एकरा खूब फैलैबै।

एकरे में लिखबै गीता,

रमायण के दोहा सुनैबै।

मगध के बड़गो इतिहास हय,

जे नय केकरो पास हय ।

सत्य, परेम,करुणा के धरती,

हियां बुद्ध -महावीर के वास हय।

हम भी चलबै उनखे रस्ता,

उनखर कीरति दूहरैबै।

बड़ी निमन मगही भाषा,

हम एकरा खूब फैलैबै।

हियां होला चाणक्य, कूटनीति के ज्ञाता,

उनखर अर्थशास्त्र से सभे जोड़लक नाता।

हियैं होला अशोक,जे दूसर बुद्ध कहैला,

ब्रह्मा जी के खन्नल कूंड में के नै नहैला ?

हम्मर पूर्वज बड़ऽ यशस्वी,

उनखर विरासत के बढ़ैबै।

बड़ी निमन मगही भाषा,

हम एकरा खूब फैलैबै।

चंद्रगुप्त, बिम्बिसार नियन होलथिन हियां राजा,

जिनकर स्वागत में संसार बजैलकै बाजा।

परतापी जरासंध के उड़ो हलै ऊंचगर धाजा,

हमर भंडार भरल, लछमी शोभो हथिन दरबाजा।

कण-कण में पुण्य बसो हय,

हम एकरे महिमा गइबै।

बड़ी निमन मगही भाषा,

हम एकरा खूब फैलैबै।

ज्ञान, मान, पिंडदान के धरती,

किसिम-किसिम के गेहूं -धान के धरती।

मंदिर, अखाड़ा, दरगाह, मजार के धरती,

अहिंसा, दया, त्याग, प्यार के धरती।

हम भी सगरे संसार में,

नेह के रीत निभैबै।

बड़ी निमन मगही भाषा,

हम एकरा खूब फैलैबै।

पता : संपादक, संझाबाती पत्रिका, अचुआरा, बाढ़ (पटना), मो. – 9570754656

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