फादर कामिल बुल्केः एक साधक कर्मयोगी

Published by : डॉ सुनील Updated At : 01 Sep 2023 10:38 AM

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हिंदी की सरलता का उल्लेख फादर बुल्के ने बार-बार किया है. उनसे प्रश्न होता- ‘आपने हिंदी कब सीखी?’ उनका उत्तर होता- ‘कभी नहीं, मुझे हिंदी यों ही आती है.’

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डॉ सुनील कुमार भाटिया

एसोसिएट प्रोफेसर, हिंदी विभाग

संत जेवियर कॉलेज, रांची

bhatia797sunil@gmail.com

कामिल ‘का अर्थ है: पूरा, कंप्लीट,मुकम्मल. लेकिन इसकी बात बाद में. कामिल बुल्के का जन्म एक सितंबर 1909 को बेल्जियम के रम्सकपैले गांव में हुआ था. 1930 में वे इंजीनियर बन गये. लेकिन, इंजीनियरिंग का पहला इम्तिहान देने के बाद ही, जब एक दिन फुटबॉल खेलने के बाद वह एक पुस्तक पढ़ रहे थे, तब जैसे अचानक उनके सामने स्पष्ट हुआ कि उन्हें तो संन्यास के मार्ग पर चलना है. कामिल बुल्के 1935 में भारत आ गये.

पहले मुंबई, फिर मनरेसा हाउस, रांची. जनवरी 1936 में भौतिकी और रसायन विज्ञान के अध्यापक के रूप में संत जोसेफ कॉलेज, दार्जिलिंग गये. पर बीमार होने के बाद रांची लौट आये. सीतागढ़ (हजारीबाग) में पंडित बदरीदत्त शास्त्री के शिष्यत्व में हिंदी और संस्कृत सीखी. और ऐसी सीखी कि गुरु उन्हें चलता-फिरता शब्दकोश कहने लगे. ब्रदर कामिल बुल्के 1941 में फादर कामिल बुल्के बन गये. इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ धीरेंद्र वर्मा ने परखने के लिए बुल्के को ‘विनयपत्रिका’ के दो पदों के विश्लेषण का कार्य दिया. और जब व्याख्या आयी तो देखते रह गये, बहुत देर तक. संत जेवियर कॉलेज के हिंदी विभागाध्यक्ष के रूप में डॉक्टर कामिल बुल्के की नियुक्ति वर्ष1950 में हुई. मनरेसा हाउस उनका स्थायी आवास बना. अगले 32 वर्षों तक हुए लेखन-कार्य में निरंतर सक्रिय रहे.

हिंदी के प्रति फादर कामिल बुल्के का इतना गहरा प्रेम-भाव क्यों था? उत्तर के लिए उनके जीवन में पीछे लौटना होगा. उनकी जन्मभूमि बेल्जियम में दो भाषाएं थीं. उत्तर में फ्लेमिश, दक्षिण में फ्रेंच. फ्रेंच का अनावश्यक वर्चस्व कामिल बुल्के को अस्वीकार्य था. पहले महायुद्ध के बाद फ्रेंच के विरोध और फ्लेमिश भाषा की प्रयोग-वृद्धि के लिए कामिल बुल्के ने आंदोलन में भाग लिया था. जब वे 1935 में भारत आये तो उन्होंने देखा कि भाषा के संदर्भ में यहां की स्थिति उनकी जन्मभूमि बेल्जियम से अलग नहीं थी.

जिस भाषा का प्रसार सबसे अधिक था, उसकी उपेक्षा स्वीकार नहीं की जा सकती थी. वे लिखते हैं: ‘मैंने दृढ़ संकल्प किया कि जब उत्तर भारत में जीवन बिताना है तो उत्तर भारत की जनता की भाषा पर अधिकार प्राप्त करना मेरा कर्तव्य है.’ हिंदी की सरलता का उल्लेख फादर बुल्के ने बार-बार किया है. उनसे प्रश्न होता- ‘आपने हिंदी कब सीखी?’ उनका उत्तर होता- ‘कभी नहीं, मुझे हिंदी यों ही आती है.’ हिंदी की जिन विशेषताओं का उल्लेख वह अपने निबंधों और साक्षात्कारों में करते हैं,उनमें से कुछ ये हैं- वर्तनी और उच्चारण में सामंजस्य, समृद्ध शब्द-भंडार, क्रिया-रूपों की बहुलता, सहायक क्रियाओं के कारण अर्थ-भेद प्रकटन की क्षमता, सुनिश्चित और वैज्ञानिक व्याकरणिक संरचना.

फादर कामिल बुल्के आजीवन साधना-रत रहे. वे कर्मयोगी थे इसलिए प्रत्येक कड़ी अगली कड़ी से जुड़ती चली गयी. उन्होंने जब ‘टेक्निकल इंग्लिश हिंदी ग्लॉसरी'(1955) प्रस्तुत की तो एक बड़े कोश के निर्माण का विचार मानस में घर कर गया. इसके लिए उन्होंने योजना बनायी. कोश-निर्माण-संबंधी अपने अनुभवों का उल्लेख फादर बुल्के ने किया है. लिखते हैं कि अंग्रेजी के ‘स्ट्रांग’ शब्द के 15-20 पर्याय लिख डालने में कोई कठिनाई नहीं होती, लेकिन कौन-सा अर्थ किस प्रसंग में प्रयुक्त है, इसके निर्देश में बहुत समय लगता है.

कड़क चाय, दृढ़ निश्चय, शक्तिशाली व्यक्तित्व, गहरा प्रेम जैसे प्रयोगों में एक ही अंग्रेजी शब्द ‘स्ट्रांग’ से काम चलता है. ऐसे प्रयोगों को अलग करने, समझने के बावजूद समझाने की कठिनाई का अनुमान ही किया जा सकता है. ‘मुक्तिदाता'(1942) और ‘नया विधान’ (1977) को उनकी अनवरत साधना के फल के रूप में देखा जाता है. आगे चल कर ‘ओल्ड टेस्टामेंट’ के अनुवाद का सिलसिला चल ही रहा था कि जून 1982 उनके दाहिने पैर की उंगली में गैंग्रीन हो गया. मांडर, पटना और फिर अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, दिल्ली में उनका इलाज होता रहा.

जीवन के अंत की निकटता का अनुभव कर 15 अगस्त,1982 को उन्होंने फादर पास्कल तोपनो से कहा कि वे ईश्वर की इच्छा संपूर्ण हृदय से ग्रहण करते हैं. दो दिनों के बाद, 17 अगस्त की सुबह, उनके जीवन की अंतिम सुबह थी. अब वह बात, जो लेख के शुरू में कही गयी थी. कामिल का मतलब- पूरा, कंप्लीट, मुकम्मल. लेकिन काम अधूरे रह जाते हैं और जिंदगी पूरी हो जाती है. फिर यह विचार आता है कि जीवन का जो, जितना और जैसा भरपूर और सार्थक उपयोग उन्होंने किया, वही पूर्णता है. ऐसी प्रेरक पूर्णता, जो अनायास श्रद्धानत करती है.

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By डॉ सुनील

एसोसिएट प्रोफेसर, हिंदी विभाग संत जेवियर कॉलेज, रांची

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