बिहार : राख से कोयला बनाकर आत्मनिर्भरता की कहानी गढ़ रहे हैं रामेश्वर
Author : Prabhat Khabar News Desk Published by : Prabhat Khabar Updated At : 09 Jun 2020 10:43 AM
कहते हैं जहां सभावनाएं प्रबल होती है उम्मीदें खुद ब खुद रास्ता बना लेती हैं. लोगों को सुनने व जानने में हैरत होगी कि राख से तैयार कोयले से भला बिजली तैयार हो सकती है? लेकिन ये हकीकत है
गोपालगंज : कहते हैं जहां सभावनाएं प्रबल होती है उम्मीदें खुद ब खुद रास्ता बना लेती हैं. लोगों को सुनने व जानने में हैरत होगी कि राख से तैयार कोयले से भला बिजली तैयार हो सकती है? लेकिन ये हकीकत है और इसे कुंडिलपुर पंचायत के मंझरिया गांव निवासी व पूर्व पैक्स अध्यक्ष रामेश्वर कुशवाहा ने कर दिखाया है.
रामेश्वर के बनाये जा रहे राख से कोयले पर न केवल भारत सरकार ने मुहर लगा दी है बल्कि इसे (चारकोल ब्रिकेट) पेंटेट कर जता दिया है कि लोगों को आत्मनिर्भर बनने से कोई रोक नहीं सकता है. ऐसे में अब उम्मीद जगी है कि चंपारण में बने चारकोल ब्रिकेट से बिजली व लघु उद्योग स्थापित करने में सहायता मिलेगी. रामेश्वर कुशवाहा बताते हैं कि उनकी वर्षों की मेहनत पर सरकार ने मुहर लगा दी है. अब वे भी देश को औद्योगिक दृष्टिकोण से मजबूत बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ेंगे.
2012 से चल रही थी तैयारी
रामेश्वर कुशवाहा राख से कोयला तैयार करने में पिछले आठ वर्षों से लगे थे. उनकी लगन और मेहनत देखकर तत्कालीन पशुपालन राज्य मंत्री गिरिराज सिंह, गन्ना उद्योग विभाग के अधिकारी समेत तंजानिया, युगांडा व देश के विभिन्न राज्यों के शोधकर्ता मंझरिया गांव पहुंच कर इस पर शोध भी कर चुके हैं. उन्होंने रामेश्वर को देश में प्लांट लगाने और हर संभव मदद देने की बात भी कही है.
ऐसे होगा चारकोल ब्रिकेट का निर्माण
चारकोल ब्रिकेट (राख से तैयार कोयला) का निर्माण राइस मिल से निकलने वाले वेस्टेज (धान का भूसा) और पराली के साथ साथ गन्ने के सूखे पत्ते से भी होगा. इसके बनाने में लागत कम आयेगी और यह पूरी तरह प्रदूषणमुक्त होगा. यही नहीं इसको जलाने से किसी प्रकार की गंध भी नहीं आयेगी. कोयले के इस्तेमाल के बाद निकलने वाली राख खेतों में छींट दी जाएगी. इसमें मिलनेवाला फास्फोरस खाद के रूप में इस्तेमाल हो सकेगा. वहीं, राख में 96.6 प्रतिशत कार्बन रहने के कारण यह खेतों व पर्यावरण के लिए नुकसानदेय होता है. ऐसे में चारकोल ब्रिकेट के निर्माण के बाद इसकी मात्रा महज 45 प्रतिशत रह जाने के कारण शेष बचा अवशेष फास्फोरस में तब्दील होकर खेतो की उर्वरा शक्ति बढ़ाने में सहायक साबित होगा.
रामेश्वर कुशवाहा की इस उपल्बधि पर सांसद सतीश चंद्र दुबे ने कहा कि यह हमारे क्षेत्र के लिए गर्व की बात है. रामेश्वर कुशवाहा का यह प्रयास चंपारण में इक नयी औद्योगिक क्रांति का गवाह बनेगा.
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