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ओबीसी: राज्य सरकार को नहीं मिली राहत

Updated at : 06 Aug 2024 1:27 AM (IST)
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ओबीसी: राज्य सरकार को नहीं मिली राहत

पश्चिम बंगाल सरकार को 77 समुदायों को अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) में शामिल करने के मामले में सुप्रीम कोर्ट से फिलहाल राहत नहीं मिली है.

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सुप्रीम कोर्ट का हाइकोर्ट के फैसले पर रोक से इनकार, सभी पक्षों को जारी किया नोटिसएजेंसियां, संवाददाता,कोलकाता/नयी दिल्ली पश्चिम बंगाल सरकार को 77 समुदायों को अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) में शामिल करने के मामले में सुप्रीम कोर्ट से फिलहाल राहत नहीं मिली है. सुप्रीम कोर्ट ने कलकत्ता हाइकोर्ट के फैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है. उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को पश्चिम बंगाल सरकार से सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन तथा सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों में पिछड़ी जातियों के अपर्याप्त प्रतिनिधित्व पर परिमाणात्मक आंकड़े उपलब्ध कराने को कहा है. आरोप है कि पश्चिम बंगाल सरकार ने कई जातियों को आरक्षण का लाभ देने के लिए उन्हें अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की सूची में शामिल किया था. उच्चतम न्यायालय ने उन निजी वादियों को भी नोटिस जारी किया, जिन्होंने 77 जातियों को अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) सूची में शामिल करने के खिलाफ कलकत्ता उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी. बताया गया है कि जिन 77 जातियों को ओबीसी सूची में शामिल किया गया, उनमें ज्यादातर मुस्लिम हैं. क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने: प्रधान न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा कि पश्चिम बंगाल सरकार सहित मामले के सभी पक्षों को नोटिस जारी किया जाये. पश्चिम बंगाल सरकार इस न्यायालय के समक्ष हलफनामा दायर करेगी, जिसमें 77 समुदायों को ओबीसी का दर्जा देने के लिए अपनायी गयी प्रक्रिया की व्याख्या होनी चाहिए. राज्य सरकार को अपनी रिपोर्ट में सर्वेक्षण की प्रकृति के बारे में जवाब देना है. कोर्ट ने साथ ही पूछा है कि क्या 77 समुदायों की सूची में किसी भी समुदाय के संबंध में आयोग (राज्य पिछड़ा समिति) के साथ परामर्श का अभाव था.’ पीठ ने यह भी पूछा कि क्या ओबीसी के उप-वर्गीकरण के लिए राज्य द्वारा कोई परामर्श किया गया था. गौरतलब है कि इससे पहले कलकत्ता हाइकोर्ट ने पश्चिम बंगाल में कई वर्गों को 2010 से दिये गये ओबीसी के दर्जे को 22 मई को खत्म कर दिया था और राज्य में सेवाओं और पदों में रिक्तियों के लिए इस तरह के आरक्षण को अवैध बताया था. उच्च न्यायालय ने अप्रैल और सितंबर 2010 के बीच 77 जातियों को दिये गये आरक्षण को और 2012 के कानून के आधार पर बनाये गये 37 वर्गों को रद्द कर दिया था. हाइकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि सर्टिफिकेट का इस्तेमाल किसी भी नौकरी के आरक्षण या अन्य आरक्षण के लिए नहीं किया जा सकता है. उच्च न्यायालय ने कहा था कि इन समुदायों को ओबीसी का दर्जा देने के लिए ‘वास्तव में धर्म ही एकमात्र आधार रहा है.’ अदालत ने यह भी कहा था कि उसका ‘यह मानना है कि मुसलमानों की 77 जातियों को पिछड़ा घोषित करना समग्र रूप से मुस्लिम समुदाय का अपमान है.’ मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हाइकोर्ट द्वारा दिये गये आदेश पर आपत्ति जतायी थी. इसके बाद राज्य सरकार और राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग ने आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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