मंत्र-अनुष्ठान से सकारात्मक ऊर्जा का निर्माण संभव : मुनि जिनेश कुमार

मंत्र जप अनुष्ठान के इस अद्भुत कार्यक्रम में स्वस्तिक आकार में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने सपत्नीक जप किया.
कोलकाता. आचार्य श्री महाश्रमण के सुशिष्य मुनि जिनेश कुमार ठाणा-3 के सान्निध्य में मंत्रोत्सव-द्वितीय चरण का भव्य आयोजन जैन श्वेताम्बर तेरापंथी सभा (कलकत्ता-पूर्वांचल) ट्रस्ट द्वारा भिक्षु विहार में आयोजित किया गया. मंत्र जप अनुष्ठान के इस अद्भुत कार्यक्रम में स्वस्तिक आकार में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने सपत्नीक जप किया. इस अवसर पर श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए मुनि जिनेश कुमार ने कहा- जैन धर्म में आठ मंगल बताये गये हैं- स्वस्तिक, श्रीवत्स, नन्द्यावर्त, वर्धमानक, भद्रासन, कलश, मत्स्य, दर्पण. स्वस्तिक का अर्थ है-अच्छा या मंगल. तीर्थंकरों की वाणी सदा मंगलमय होती है इसलिए स्वस्तिक को मंगल का प्रतीक माना जाता है. तीर्थकर अनंत ज्ञान के स्वरूप होते हैं तथा चारों गतियों से मुक्त होने का मार्ग दिखलाते हैं. चौबीस तीर्थंकरों का क्रम और काल का चक्र हमेशा चलायमान रहता है इसीलिए जैनधर्म में स्वस्तिक को चारों गति व अनंतकाल का प्रतीक माना जाता है. स्वस्तिक को ऋगवेद की ऋचा में सूर्य माना गया है. स्वस्तिक में चार बिंदियां ज्ञान, दर्शन, चारित्र और तप का प्रतीक होती हैं. स्वस्तिक से चार शिक्षा ग्रहण कर सकते हैं- समय कीमती है, ज्ञान ऊर्जावान है, सत्यनिष्ठ बनो, चरित्रवान रहो. मुनिश्री ने आगे कहा- मंत्र अनुष्ठान से ऊर्जा का निर्माण होता है. कार्यक्रम का शुभारंभ मुनि कुणाल कुमार के मंगलाचरण से हुआ. आभार ज्ञापन सभा के अध्यक्ष संजय सिंघी ने किया. जयसिंह डागा ने मुनिश्री को अपने क्षेत्र में पदार्पण हेतु निवेदन किया. कार्यक्रम का संचालन मुनिश्री परमानंद ने किया. कार्यक्रम को सफल बनाने में कार्यकर्ताओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा. जप में कुल 120 जोड़े व लगभग 450 श्रद्धालुगण सहभागी बने.
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